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मंगलवार, 19 जनवरी 2010

डा श्याम गुप्त ---जब आये रितु राज बसन्त --

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित ----

जब आये रितु राज बसन्त ॥

आशा त्रिष्णा प्यार जगाये,
विह्वल मन में उठे तरंग ।
मन में फ़ूले प्यार की सरसों,
अंग अंग भर उठे उमन्ग ॥

अन्ग अन्ग में रस भर जाये ,
तन मन में जादू कर जाये।
भोली-भाली गांव की गोरी,
प्रेम मगन राधा बन जाये ॥

कण कण में रितुराज समाये,
हर प्रेमी कान्हा बन जाये ।
रिषि-मुनि मन भी डोल उठें,जब-
बरसे रंग रस रूप अनन्त ॥

जब आये रितु राज बसन्त ॥

शनिवार, 16 जनवरी 2010

डा श्याम गुप्त के दोहे---

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित------
दोहा सप्तक

जन तो तन्त्रमें फ़ंसगया,तन्त्र हुआ परतन्त्र।
चोर -लुटेरे लूटने , घूम रहे स्वचछंद ॥

राज़नीति में नीति का कैसा अनुपम खेल ।
ऊपर से दल विरोधी, अन्दर अन्दर मेल॥

भांति भांति के रूप धर, खडे मचायें शोर ।
किसको जन अच्छा कहें किसको कहदें चोर ॥

बाढ आय सूखा पडे, हो खूनी संघर्ष ।
इक दोजे को दोष दे, नेताजी मन हर्ष ॥

आरक्षण की आड में, खुद का रक्षण होय ।
नालायक सुत पौत्र सब, यहिविधि लायक होंय॥

अब सब वाणी से करें,परहित पर उपकार ।
निज़ी स्वार्थ में होरहा, जन धन का व्योहार ॥

लोक तन्त्र के बाग में, उगें कागज़ी फ़ूल ।
भिन्न भिन्न रंग रूप पर,गन्धहीन सब फ़ूल॥