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सोमवार, 24 मई 2010

अखिल भारतीय साहित्य परिषद की प्रान्तीय बैठक , सन्गोष्ठी व काव्य गोष्ठी....



अखिल भारतीय साहित्य परिषद् , उत्तर प्रदेश की प्रांतीय बैठक सम्पन्न --


अखिल भारतीय साहित्य परिषद् , उत्तर प्रदेश की प्रांतीय बैठक , संगोष्ठी एवम काव्य गोष्ठी सम्पन्न----



------दिनांक २३ जून, २०१० रविवार को (शुद्ध बैसाख शुक्ल १० सं २०६७ ) को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् उत्तर प्रदेश की प्रांतीय बैठक ,एवं परिषद् द्वारा आयोजित संत कंवर राम के १२५ वें जयन्ती श्रंखला का समारोह , शिव शक्ति आश्रम , आलमबाग लखनऊ पर आयोजित किया गया । अधिवेशन दो सत्रों में हुआ जिसमें 'समाज सुधार में संतसाहित्य का योगदान' विषय पर चर्चा संगोष्ठी एवं काव्य गोष्टी का भी आयोजन किया गया।
प्रथम उदघाटन सत्र में --श्री ज्वाला प्रसाद कौसिक "साधक' सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी , अ भा सा परिषद् की अध्यक्षता में हुआ , मुख्य अतिथि श्री राम नारायण त्रिपाठी, महामंत्री राष्ट्रीय का कारिणी, विशिष्ट अतिथि डा कौशलेन्द्र पांडे, अध्यक्ष लखनऊ नगर कार्यकारिणी एवं श्री किशनलाल जी व्यवस्थापक शिव शक्ति आश्रम थे। संचालन हरदोई के संस्कृत विद्यालय के विद्वान् श्री पुष्पमित्र शास्त्री जी द्वारा किया गया।
दीप प्रज्वलन के बाद प्रांतीय संयोजक श्री विनय दीक्षित जी ने सरस्वती वन्दना की समस्त उत्तर प्रदेश से आये हुए परिषद् के सदस्यों का परिचय कराया गया।
अपने उद्बोधन में पुष्पमित्र शास्त्रीजी जी ने बताया कि साहित्य का उद्देश्य समाज में सत्य की स्थापना करना होता है , समाज का मार्गदर्शन करना होता है जो सत्य, शिव तत्व द्वारा सौन्दर्य के समन्वय से होना चाहिए। पर्यटक जी ने साहित्य परिषद् न्यास के उद्देश्य व संगठन के बारे में बताया कि न्यास का उद्देश्य देश की माटी से जुड़े साहित्य की रचना है , हिन्दी सहित देश की सभी भाषाओं में परिषद् साहित्य रचना के लिए कृत संकल्प है , परिषद् की पत्रका सभी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होती है विभिन्न भाषाओं के हिन्दी भाषी साहित्यकारों के लिए विशेषांक प्रकाशित किये जाते हैं।
अध्यक्ष कौशिक जी ने अपने वक्तव्य में कहा--साहित्यकार अखवार, पत्रिका, पुस्तक या विश्वविद्यालयों में नहीं बनते , साहित्य रचना आपके अंतस में होती है जो पारिवारिक संस्कारों से परिपक्व होती है। अधिभौतिक, अधिदैविक व अध्यात्मिक ज्ञान ही संस्कृति का आधार होता है और उसके बिना सच्चा साहित्यकार नहीं बन सकता । उन्होंने कहा आज साहित्यकार मंच व अर्थ के पीछे भाग रहे हैं अतः सु साहित्य नहीं रचाजारहा,एसे लोगों का मष्तिस्क साफ़ करना पडेगा, सत्साहित्य रचना से। 'हितेन सहितं स "--शिवम् से इतर साहित्य कहाँ हो सकता है। अमंगल तत्वों का नाश, राष्ट्र समाज के मंगल की कामना ही साहित्य का मूल उद्देश्य है उदघाटन सत्र का अंत विनय जी की भारत माँ वन्दना से हुआ।
परिषद् की प्रांतीय बैठक सत्र की अध्यक्षता परिषद् के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा यतीन्द्र तिवारी जी ने की मुख्य अतिथि सिंधी कवि व सिंधी काव्य परिषद् के प्रदेश अध्यक्ष श्री सच्चिदानंद साधवानी जी थे। श्री विनय दीक्षित ने पिछली प्रांतीय बैठक की कार्यवाही से अवगत कराया । डॉ तिवारी जी ने साहित्य की स्थिति पर बोलते हुए कहा कि देश की आज़ादी से पूर्व एक लक्ष्य था स्वतन्त्रता अतः साहित्य व कविता लेखन ,लक्ष्य पूर्ण, जागृति से परिपूर्ण, सोद्देश्य था । परन्तु स्वाधीनता के उपरांत साहित्य में कुंठा,असंतोष, निराशा, घुटन संत्रास , जिजीविषा क़ा मंडन व वर्णन किया जाने लगा । 'कलम चुक गयी ' ' साहित्य की आवश्यकता नहीं ' आदि वाक्य उछाले गए। भिन्न भिन्न चिंतन विरोधी विचार धाराएं समाज में घर करने लगीं। आज नारी विमर्श, दलित विमर्श , भोगी हुई पीड़ा की ,स्वयं की पीड़ा कथा , अभिव्यक्ति आदि वैशिष्ट्य भावों एवं विचार धाराओं की कविता व साहित्य रचना से कविता समाज की समग्रता व जीवन मूल्यों से कटने लगी एवं जन मानस से दूरी बढ़ने की मुख्य कारण बनी हुई है। अतः समग्र चिंतन , समग्र सामाजिक सरोकार सहित जीवन मूल्यों एवं राष्ट्रीय भावों से सम्पन्न व उचित समाधान पूर्ण साहित्त्य की रचना इस अखिल भारतीय साहित्य परिषद् क़ा उद्देश्य है , और यही साहित्य क़ा वास्तविक उद्देश्य भी है।
द्वितीय संगोष्ठी सत्र में --सरस्वती वन्दना कवयित्री श्रीमती शर्मा के सुमधुर स्वरों में हुई। 'समाज सुधार में संत साहित्य क़ा योगदान व संत कंवर राम' पर विषय प्रवर्तन करते हुए प्रोफ नेत्रपाल सिंह ने कहा कि संत सदा आत्म श्लाघा से दूर रहते हैं , साहित्य में भी सत्साहित्य्कार इस प्रवृत्ति से दूर रहते हैं , वे मंचों , प्रशंसाओं से दूर ही रहते हैं । वेदों से लेकर , महाभारत, रामायण ,मानस -बाल्मीकि, वेदव्यास,शंकराचार्य , तुलसी से होते हुए संत कंवर राम जी तक सभी कालजयी साहित्य संत परम्परा से ही है , समाज को सदैव ही संत साहित्य ने ही उबारा है । गोष्ठी क़ा समापन करते हुए डॉ यतीन्द्र तिवारी जी ने कहा हमारी संस्कृति की सनातनता संतों संत साहित्य के पुनः पुनः प्रादुर्भाव से ही तो हैमन से बड़ा अपराधी कौन है ! मन क़ा निर्मलीकरण ही तो समाज क़ा निर्मलीकरण है और संत साहित्य व सच्चा साहित्य यही तो करता है।
संत कंवर राम मिशन के राष्ट्रीय सचिव साधक जी ने संत कंवर राम के विश्वबंधुत्व भाव, भाई चारा, उनकी अलौकिक आवाज़ में गायन , लीलाएं आदि क़ा विस्तार में वर्णन किया । उन्होंने बताया कि , संतजी पर डाक टिकिट क़ा प्रकाशन जिसका लोकार्पण महामहिम राष्ट्रपतिजी श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने दरवार हाल में किया, जो संतों के सम्मान की अच्छी परम्परा है।
संत आसूदाराम ट्रष्ट व शिव शान्ति आश्रम के पीठाधीश्वर महाराज द्वाराआशीर्वचन के रूप में संत कंवर राम की अध्यात्मक शक्तियों की चर्चा की , एवं सभी उपस्थित विद्वत जनों को अन्गवस्त्र व प्रसाद वितरण किया गया।



काव्य गोष्ठी सत्र में --राष्ट्र वाद , अध्यात्म एवं संत साहित्य परम्परा पर सरस काव्यमय रचनाएँ पढी गईं । जिसकी अध्यक्षता प्रोफ नेत्र पाल सिंह ने की।

----डा श्याम गुप्त

गुरुवार, 20 मई 2010

बुराई की जड़ --कविता ....अनीति शास्त्र ( डा श्याम गुप्त ).....

 बुराई की जड़ --कविता ( डा श्याम गुप्त )

प्रत्येक बुराई की जड़ है,
अति सुखाभिलाषा ;
जो ढूंढ ही लेती है
अर्थशास्त्र की नई परिभाषा;
ढूंढ ही लेती है
अर्थ शास्त्रं के नए आयाम ,
और धन आगम-व्यय के
नए नए व्यायाम |
और प्रारम्भ होता है
एक दुश्चक्र, एक कुचक्र -
एक माया बंधन -क्रम उपक्रम द्वारा
समाज के पतन का पयाम |
समन्वय वादी , तथा-
प्राचीन व अर्वाचीन से
नवीन को जोड़े रखकर ,बुने गए-
नए नए तथ्यों , आविष्कारों विचारों से होता है,
समाज-उन्नंत अग्रसर |
पर, सिर्फ सुख अभिलाषा,अति सुखाभिलाषा-
उत्पन्न करती है , दोहन-भयादोहन,
प्रकृति का,समाज का, व्यक्ति का;
समष्टि होने लगती है , उन्मुख
व्यष्टि की ओर;
समाज की मन रूपी पतंग में बांध जाती है-
माया की डोर |
ऊंची , और ऊंची, और ऊंची
उड़ने को विभोर ;
पर अंत में  कटती है ,
गिरती है, लुटती है वह डोर-
क्योंकि , अभिलाषा का नहीं है , कोई-
ओर व छोर |

नायकों , महानायकों द्वारा-
बगैर सोचे समझे 
सिर्फ पैसे के लिए कार्य करना;
चाहे फिल्म हो या विज्ञापन ;
करदेता है-
जन आचार संहिता का समापन |
क्योंकि इससे उत्पन्न होता है
असत्य का अम्बार,
झूठे सपनों का संसार ;
और उत्पन्न होता है ,
भ्रम,कुतर्क, छल, फरेब, पाखण्ड kaa
विज्ञापन किरदार ,
एक अवास्तविक,असामाजिक संसार |

साहित्य, मनोरंजन व कला-
जब धनाश्रित होजाते हैं;
रोजी रोटी का श्रोत , व-
आजीविका बन जाते हैं ;
यहीं से प्रारम्भ होता है-
लाभ का अर्थ शास्त्र,
लोभ व धन आश्रित अनैतिकता की जड़ का ,
नवीन लोभ-कर्म नीति शास्त्र , या--
अनीति शास्त्र ||




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