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शनिवार, 19 जून 2010

पितृ दिवस पर डा श्याम गुप्त के दो दोहे...

                 दोहे... 

शत आचार्य समान है, श्याम' पिता का मान |
नित प्रति वंदन कीजिये,  मिले धर्म संज्ञान ||

विद्या दे और जन्म दे , औ संस्कार कराय |
अन्न देय, निर्भर करे, पांच पिता कहालायं ||

मंगलवार, 15 जून 2010


दहन सी दहकै, द्वार देहरी दगर दगर ,
कली कुञ्ज कुञ्ज क्यारी क्यारी कुम्हिलाई है।
पावक प्रतीति पवन , परसि पुष्प पात पात ,
जरै तरु गात , डारी डारी मुरिझाई है ।
जेठ की दुपहरी सखि, तपाय रही अंग अंग ,
मलय बयार मन मार अलसाई है।
तपैं नगर गाँव ,छावं ढूंढ रही शीतल ठावं ,
धरती गगन 'श्याम' आगि सी लगाई है।।

शूर्पणखा काव्य-उपन्यास.आगे...पूर्वा पर......

           पूर्वा पर
१-
विधि वश,सुजन कुसंगति परहीं ,
फनि मणि सम निज गुण अनुसरहीं |
सच  ही है, यह आत्मतत्व  और ,
जीव, सदा   निर्मल  होता  है |
शास्त्र मान्यता ,  यही रही है,
व्यक्ति तो सुजन ही होता है ||
२-
हो विधि बाम विविध कारण से,
सामाजिक, पारिवारिक स्थिति,
राजनीति की जटिल परिस्थिति;
 पूर्व जन्म के संचित कर्म , व -
सुद्रढ़ नैतिक- शक्ति की कमी,
से,  कुकर्म करने लगता  है   ||
३.
तब,   वह बन जाता है,   दुर्जन,
फनि मणि सम निज गुण दिखलाता|
यद्यपि ,  अंतःकरण  में   यही,
सदा जानता, अनुभव करता;
कि वह ही है, असत मार्ग पर ,
सत कामार्ग लुभाता रहता ||
४.
और समय आने पर कहता ,
'तौ में जाय बैर हठी करिहों '
इच्छा अंतर्मन में रहती,
प्रभु के बाणों से तर जाऊं |
सत्य रूप है यही व्यक्ति का,
शिवं सुन्दरं आत्म तत्व यह ||
.......एवं
१०.
नैतिक बल जिसमें होता है,
हर प्रतिकूल परिस्थिति में वह;
सदा सत्य पर अटल रहेगा|
किन्तु भोग-सुख लिप्त सदा जो,
दास परिस्थिति का बन जाता,
निज गुण दुष्ट कर्म दिखलाता ||
.........एवं
१२.
परित्यक्ता, पतिहीना नारी,
अधिक आयु जो रहे कुमारी;
पति, पितु, भ्राता अत्याचारी;
पति विदेश यात्रा रत रहता ,
भोग रीति-नीति में पली हो,
अनुचित राह शीघ्र अपनाती ||
.....कुल १६ छंद.

शूर्पणखा काव्य-उपन्यास..आगे ..विनय...

                      विनय 
कमला के कान्त की शरण, धर पंकज कर,
श्याम की विनय है यही कमलाकांत से  |
भारत विशाल की ध्वजा  फहरे विश्व में,
कीर्ति-कुमुदिनी, नित्य मिले निशाकांत से |


हृदय कमल बसें , शेष शायी नारायण,
कान्हा रूप श्री हरि, मन में विहार करें |
सीतापति राम रूप, मन में बसें नित,
लीलाम्बुधि विष्णु,इन नैनन निवास करें |


लौकिक अलौकिक भाव दिन दिन वृद्धि पांय,
श्री हरि प्रदान सुख-सम्पति, सुसम्मति करें |
प्रीति सुमन खिलें जग,जैसे रवि कृपा नित,
फूलें सर पंकज , वायु, जल, महि गति भरें |


पाप-दोष, भ्रम-शोक, देव सभी मिट जायं ,
उंच-नीच,  भेद -भाव,  इस  देश से मिटें |
भारत औ भारती ,  बने पुनः विश्वगुरु ,
ज्ञान दीप जलें , अज्ञानता के घन छटें |


कृष्ण रूप गीता ज्ञान, मुरली लिए कर,
राम रूप धनु-बान , कर लिए एक बार |
भारत के जन मन में, पुनः निवास करें ,
'श्याम' की विनय यही,कर जोरि बार बार ||

शुक्रवार, 4 जून 2010

शूर्पणखा -काव्य उपन्यास -वन्दना खन्ड ..क्रमश ....

वंदना  --क्रमश |
         ७.
भाव स्वरों के श्रेष्ठ ज्ञान से,
तत्व ज्ञान के स्वर मिलते हैं |
फलित ज्ञान होजाता नर को,
तब होपाता ज्योति-दीप सा |
ज्ञान ज्योति से ज्योति जले जग,
मिटे  तमिस्रा,   नव प्रभात हो |
         ८.
सर्व ज्ञान सम्पन्न विविध नर,
सभी,  एक से  कब होते हैं  |
अनुभव, तप, श्रृद्धा व भावना ,
होते सब के भिन्न भिन्न हैं |
भरे जलाशय , ऊपर समतल,
होते   ऊंचे- नीचे   तल  में |
      ९.
केवल बुद्धि ज्ञान क्षमता से ,
गूढ़ ज्ञान के अर्थ न मिलते;
गूढ़ ज्ञान के तत्व प्राप्तु हित,
निर्मल मन, तप,योग चाहिए |
उसी साधना रत सुपात्र को,
गूढ़ ज्ञान का तत्व मिला है| 
  १०.
ऐसे साधक को सुपात्र को,
मातु वाग्देवी की महिमा;
दैविक, गुरु या अन्य सूत्र से,
मन में ज्योतित भाव जगाती |
श्रृद्धा और स्नेह भाव मिल ,
 ज्ञान तत्व का अमृत मिलता |  
  ११.
माँ की कृपा नहीं होती है,
भक्ति भाव भी उर न उमंगते ;
श्रृद्धा और स्नेह भाव भी,
उस मानस में नही उभरता |
भक्ति भाव उर बसे हे माता!
चरणों का मराल बन पाऊँ |
      
        १२.
श्रम, विचार व कला भाव के,
अर्थपरक और ज्ञान रूप की;
सब विद्याएँ करें प्रवाहित ,
सकल भुवन में माँ कल्याणी |
ज्ञान रसातल पड़े  'श्याम को,
भी कुछ वाणी-स्वर-कण दो माँ ||

गुरुवार, 3 जून 2010

शूर्पणखा काव्य उपन्यास ---आगे वन्दना ---

शूर्पणखा काव्य उपन्यास ---आगे  वन्दना ---(वैदिक सरस्वती वन्दना )
१. 
तेरे भक्ति भाव के इच्छुक ,
श्रेष्ठ कर्म रत ,ज्ञान धर्म युत ;
माँ तेरा आवाहन करते,
इच्छित वर उनको मिलते हैं ;
कृपा दृष्टि दो माँ सरस्वती ,
हों मन में नव भाव अवतरित |
      २.
तेरे बालक को हे माता,
प्रारम्भिक अभिव्यक्ति स्वतः ही,
हो जाती, जब मातु रूप में ,
ह्रदय गुहा में तुझको पाता |
शुद्ध भाव से तुझे भजे तो,
परिमार्जित मेधा होजाती |
     ३.
हे माँ ! तुम जब दिव्य रसों की,
दिव्य -लोक से वर्षा करतीं ;
निर्मल, बुद्धि ,विवेक ,ज्ञान की,
सभी प्रेरणा मिलती जग को|
ज्ञान भाव से सकल विश्व को,
करें पल्लवित मातु शारदे |
     ४.
मानव ही परमार्थ भाव रत,
माँ जब करता तुम्हें स्मरण;
श्रेष्ठ ज्ञान के तत्व मिलें फिर,
गूढ़ ज्ञान के स्वर मिल जाते |
गूढ़ ज्ञान के सभी अर्थ माँ ,
इस मन में ज्योतिर्मय करदो |
            ५.
ऋषियों ने माँ सप्त स्वरों से,
आदि ऊर्जा और स्वयंभू,
अनहद नाद से किया संगठित |
जग कल्याण हेतु माँ वाणी!
बनी बैखरी, हुई अवतरित,
हो जाते मन भाव उत्तरित |
        ६.
भाषा के निहितार्थ समझकर
वाणी होती मंगलकारी;
मंगलमय वाणी-स्वर नर को,
 आत्मीयता भाव सिखाये |
जब परमार्थ भाव मन विकसे,
माँ समृद्धि लक्ष्मी बन जाती |     क्रमश ...