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मंगलवार, 28 सितंबर 2010

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल.....तटबन्ध होना चाहिये----

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित----------

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल....

साहित्य सत्यम शिवम् सुन्दर भाव होना चाहिए|
साहित्य शुचि शुभ ज्ञान पारावार होना चाहिए।

समाचारों के लिए अखबार छपते तो हैं रोज़ ,
साहित्य तो सरोकार-समाधान होना चाहिए ।

आज हम उतरे हैं इस सागर में यह कहने कि हाँ ,
साहित्य, सागर है तो सागर-भाव होना चाहिए।

डूब कर उतरा सके जन जन व मन मानस जहां ,
भाव सार्थक, अर्थ भी संपुष्ट होना चाहिए।

क्लिष्ट शब्दों से सजी, दूरस्थ भाव न अर्थ हों ,
कूट भाव न हों,सुलभ संप्रेष्य होना चाहिए।

चित्त भी हर्षित रहे, नव प्रगति भाव यथा रहें ,
कला सौन्दर्य भी सुरुचि, शुचि, सुष्ठु होना चाहिए।

ललित भाषा, ललित कथ्य,न सत्य तथ्य परे रहे ,
व्याकरण शुचि शुद्ध सौख्य-समर्थ होना चाहिए।

श्याम, मतलब सिर्फ होना शुद्धतावादी नहीं ,
बहती दरिया रहे पर तटबंध होना चाहिए॥

बुधवार, 22 सितंबर 2010

डा श्याम गुप्त की गज़ल....टूटते आईने सा...

टूटते आईने सा हर व्यक्ति यहां क्यों है।
हैरान सी नज़रों के ये अक्स यहां क्यों है।

दौडता नज़र आये इन्सान यहां हर दम,
इक ज़द्दो ज़हद में इन्सान यहां क्यों है ।

वो हंसते हुए गुलशन चेहरे किधर गये,
हर चेहरे पै खौफ़ का यह नक्श यहां क्यों है।

गुलज़ार रहते थे गली बाग चौराहे,
वीराना सा आज हर वक्त यहां क्यों है ।

तुलसी सूर गालिव की सरज़मीं पै ’श्याम,
आतंक की फ़सल सरसब्ज़ यहां क्यों है॥

बुधवार, 15 सितंबर 2010

डा श्याम गुप्त के पद....राधा अष्टमी पर ....

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

राधाष्टमी पर विशेष ---डा श्याम गुप्त के पद.......

-
जनम लियो वृषभानु लली
आदि -शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली
जलज-चक्र,रवि तनया विलसति,सुलसति लसति भली
पंकज दल सम खिलि-खिलि सोहै, कुसुमित कुञ्ज लली
पलकन पुट-पट मुंदे 'श्याम' लखि मैया नेह छली
विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली
नित-नित चन्द्रकला सम बाढ़े, कोमल अंग ढली
बरसाने की लाड़-लडैती, लाडन -लाड़ पली ।।

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कन्हैया उझकि-उझकि निरखै
स्वर्ण खचित पलना,चित चितवत,केहि विधि प्रिय दरसै
जंह पौढ़ी वृषभानु लली , प्रभु दरसन कौं तरसै
पलक -पाँवरे मुंदे सखी के , नैन -कमल थरकैं
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों ,फर फर फर फरकै
तीन लोक दरसन को तरसे, सो दरसन तरसै
ये तो नैना बंद किये क्यों , कान्हा बैननि परखै
अचरज एक भयो ताही छिन , बरसानौ सरसै
खोली दिए दृग , भानु-लली , मिलि नैन -नैन हरसें
दृष्टि हीन माया ,लखि दृष्टा , दृष्टि खोलि निरखै
बिनु दृष्टा के दर्श ' श्याम' कब जगत दीठि बरसै

--
को तुम कौन कहाँ ते आई
पहली बेरि मिली हो गोरी ,का ब्रज कबहूँ आई
बरसानो है धाम हमारो, खेलत निज अंगनाई
सुनी कथा दधि -माखन चोरी , गोपिन संग ढिठाई
हिलि-मिलि चलि दधि-माखन खैयें, तुमरो कछु चुराई
मन ही मन मुसुकाय किशोरी, कान्हा की चतुराई
चंचल चपल चतुर बतियाँ सुनि राधा मन भरमाई
नैन नैन मिलि सुधि बुधि भूली, भूलि गयी ठकुराई
हरि-हरि प्रिया, मनुज लीला लखि,सुर नर मुनि हरसाई

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राधाजी मैं तो बिनती करूँ
दर्शन दे कर श्याम मिलादो,पैर तिहारे पडूँ
लाख चौरासी योनि में भटका , कैसे धीर धरूँ
जन्म मिला नर , प्रभु वंदन को,सौ सौ जतन करूँ
राधे-गोविन्द, राधे-गोविन्द , नित नित ध्यान धरूँ
जनम जनम के बन्ध कटें जब, मोहन दर्श करूँ
श्याम, श्याम के दर्शन हित नित राधा पद सुमिरूँ
युगल रूप के दर्शन पाऊँ , भव -सागर उतरूँ

सोमवार, 13 सितंबर 2010

हिन्दी या हिन्गलिश ...यानी अन्ग्रेज़ी की चेरी ....

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित----


अजी छोडिये भी ...हिन्दी -हिन्दी ...



हिन्दी की वास्तविकता ...-बेस्ट सेलर -अनुवाद ...हिंगलिश ..

चित्र 1<---हम हिन्दी भी पढेंगे तो अंग्रेज़ी में , तभी हिन्दी आगे बढ़ेगी   (यानी गुलामी में)                                                        देखिये --चित्र -२.--->        
अब देखिये --आज के घोषित बेस्टसेलर (हिन्दी में 'बिकाऊ' नहीं?? असभ्य शब्द लगता है ! )--'लेडीस कूपे' ..थ्री मिस्टेक्स....'फाइव पाइंट..द गोड आफ ...स्टे हंगरी ...अमेजिंग रेसल्ट...अल्केमिस्ट ..यूं केन हील...फिश ...सबाल ही जबाव ...गुनाहों का देवता...राग दरवारी ...आग का दरिया ...आदि आदि ...अब है इस हिन्दी की कोई टक्कर ...!! क्या इस बेस्ट सेलर में कितने प्रतिशत हिन्दी , हिन्दी साहित्य व हिन्दी-हिन्दुस्तानी संस्कृति है? वैशाली ...और वाण भट्ट....आदि तो..कोई सिरफिरा साहित्यकार ही पढ़रहा होगा ।
----ये सब अंग्रेज़ी से अनुवाद हैं या बकवास कथाएँ ----हिन्दी के दुर्भाग्य में अनुवादों का भी महत्त्व पूर्ण हाथ है जो वस्तुतः बाज़ार, कमाऊ लेखक, धंधेबाज़ व्यापारी -प्रकाशक गुट के भाषा -साहित्य -संस्कृति द्रोही कलापों का परिणाम है ।
-----अजी छोडिये भी .....कौन सी हिन्दी ??---आर आर इंस्टी टयूट, आई दी एस , परफेक्ट , कोफ्स-२०१० , एस सी, एस टी, इंटर स्कूल फेस्ट लांच , सेलीब्रिटी , एल डी ए...धड़ल्ले से 'यूज़' होरहे हैं ....क्यों व्यर्थ हिन्दी वाले रो रहे हैं ।
-----इससे तो अच्छी प्रगति आज़ादी से पूर्व ही थी जब हिन्दी साहित्य सम्मलेन, नागरी प्रचारिणी सभाएं .. आदि हिन्दी के उत्तम साहित्य व संस्कृति के निर्माण में लगी थी। साहित्य सृजन की गंभीरता व मानकी करण पर ध्यान दिया जाता था । पढ़ें ---गोविन्द सिंह का यह तथ्यपरक , आँखें खोलने वाला आलेख....चित्र २पर चटका दें ।

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

हिन्दी का एक और दुर्भाग्य.....

हिन्दी दिवस के लिए एक विशेष विचार ---डा श्याम गुप्त .......

हिन्दी का एक दुर्भाग्य यह भी ---लोक वाणियों का प्रश्रय ...
हिन्दी के प्रसार व उन्नति में अन्य तमाम बाधाओं के साथ एक मुख्य बाधा हिन्दी पट्टीके प्रदेशों की आंचलिक बोलियों को साहित्य-सिनेमा -दूरदर्शन-रेडियो आदि में अलग से प्रश्रय देना भी है। भोजपुरी, अवधी, बृज भाषाबिहारी आदि हिन्दी की बोलियों को आजकल साहित्य में अत्यधिक महत्त्व दिया जाने लगा है जैसे कि वे हिन्दी न होकर हिन्दी-से अलग भाषाएँ हों। जो आगे चलकर साहित्य में भी अलगाव वाद की भूमिका बन सकता है।
-----जो कवि, साहित्यकार, सिने-आर्टिस्ट, रेडियो कलाकार व अन्य कलाकार-- मूल हिन्दी धारा के महासागर में अपनी वैशिष्यता , पहचान खोजाने से डरते हैं , क्योंकि वास्तव में वे उतने योग्य नहीं होते एवं स्वस्थ प्रतियोगिता से डरते हैं , वे अपना स्वार्थ लोक-वाणियों को भाषा बनाकर पूरा करने में सन्निहित होजाते हैं। इस प्रकार इन तथाकथित बोलियों( हिन्दी की ) से बनाई गयी भाषाओं की विविध सन्स्थाएं भी अपना अलग से पुरस्कार, सम्मान, आयोजन इत्यादि करने लगती हैं , सिर्फ शीघ्र व्यक्तिगत व संस्थागत पहचान व ख्याति के लिए |
----इस प्रकार छुद्र व तात्कालिक , व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए एक महान कर्तव्य ---हिन्दी को सारे विश्व राष्ट्रभाषा जन-जन की भाषा बनाने के ध्येय को अनदेखा किया जारहा है। ---कुछ मूल प्रश्न ....
१.--क्या सूर, बिहारी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, रत्नाकर को सिर्फ -बृज भाषा का, तुलसी को सिर्फ अवधी का कवि कहलाना भारतीय पसंद करेंगे( हो सकता है इसके चलते यह मांग भी उठ खड़ी हो ) या किसी के द्वारा कभी कहीं कहा गया ? ये सभी महान कवि हिन्दी की महान विभूतियों के व कवियों के रूप में विश्व विख्यात हैं |
२. क्या स्वतन्त्रता से पूर्व या बाद में भी इन सभी आंचलिक भाषाओं को हिन्दी मानकर ही नहीं देखा , समझा , जाना व माना नहीं जाता था?
-----वस्तुतः होना यह चाहिए----
१. -हिन्दी -पट्टी की इन सभी बोलियों के साहित्य को अलग साहित्य न मानकर हिन्दी का ही साहित्य माना जाना चाहिए एवं सभी साहित्यिक/ कला के कार्य कलापों के लिए हिन्दी के साथ ही समाहित किया जाना चाहिए।
२. सभी देशज कवियों/ कलाकारों /सिनेमा को हिन्दी का ही माना जाना चाहिए -न कि इन विशिष्ट भाषाओं के ।
३. सभी हिन्दी-बोलियों को हिन्दी भाषा में ही समाहित किया जाना
-------तभी हिन्दी का महासागर और अधिक उमड़ेगा , लहराएगा