शनिवार, 23 मई 2009

कविता -कामिनी

किस दिल पे कविता-कामिनी का राज नहीं है ।
है बात और काव्य जो दिलसाज़ नहीँ है।

किस कवि को अपनी कविता पे नाज़ नहीं है,
है बात और पुरकश आगाज़ नहीं है।

जो वक्त की आवाज़ उठाते हैं जोर से ,
मत जानिए वो वक्त से नाराज़ नहीं है।

चुप चाप चलाते हैं जो शमशीरे -कलम को,
मत समझिये वो वक्त की आवाज़ नहीं है।

लायें जो कौडी दूर की ,कोई समझ न पाय,
वो कल थे उनका नाम भी तो आज नहीं है।

खवरों की तरह हांकते है लंतरानियां ,
वे हैं विदूषक ,कोई काव्य साज़ नहीं है।

कहते है हम को दिखा करके पूछ के लिखो,
सचमुच क्या तबियत आपकी नासाज़ नहीं है।

कवि बादशाह है सदा अपने कलाम का ,
है बात और उसके सर पे ताज नहीं है ।

सुनकर ग़ज़ल न आपने की वाह वाह श्याम ,
ये शायराना आपका अंदाज़ नहीं है॥

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