मंगलवार, 2 जून 2009

आख़िर क्यूं ये पुरवा आई ---गीत

मन की प्रीति पुरानी को , क्यों हवा दे गयी ये पुरवाई ।
सुख की नींद व्यथा सोयी थी ,आख़िर ये क्यों पुरवा आई?

हम खुश खुश थे जिए जारहे ,जीवन सुख रस पिए जारहे ,
मस्त मगन सुख की नगरी में ,सारा सुख सुंदर गगरी में ;
सुस्त पडी उस प्रीती रीति को,छेड़ गयी क्यों ये पुरवाई ।

प्रीति-वियोगके भ्रमकी बाती,जलती मन में विरह कथा सी ,
गीत छंद रस भाव भिगोये,ढलती बनकर मीत व्यथा सी ;
पुरवा जब संदेशा लाई , मिलने का अंदेशा लाई ।

कैसे उनका करें सामना , कैसे मन को धीर बंधेगी ,
पहलू में जब गैर के उनको,देख जले मन प्रीति छलेगी ;
कैसे फ़िर ये दिल संभलेगा ,मन ही तो है मन मचलेगा।

क्यों ये पुरवा फ़िर से आई, क्यों नूतन संदेशा लाई ॥

3 टिप्‍पणियां:

  1. क्यों ये पुरवा फ़िर से आई, क्यों नूतन संदेशा लाई

    bahut badhiya rachana. dhanyawad.

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  2. श्याम गुप्त जी, आपकी पोस्ट किसलिए रोकी गयी है, इसका मेल आपको भेजा जा चुका है। आपसे निवेदन है कि वह पोस्ट सांइस ब्लागर्स पर प्रकाशित होने से पहले अपने ब्लॉग पर पब्लिश न करें।

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