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शुक्रवार, 15 जून 2018

मेरी चारधाम यात्रा-----भाग छः -----बद्रीनाथ धाम---डा श्याम गुप्त

                               कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



मेरी चारधाम यात्रा-----भाग छः -----बद्रीनाथ धाम---
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आठवां दिन – २४-५-१८ प्रातः -- केदारनाथ से सीतापुर-गुप्तकाशी से पीपलकोटी ( चमोली जिला )
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------- रास्ते में –नंदादेवी, माना पर्वत, द्रोणागिरी, कोमेट, नीलकंठ, हाथीपर्वत आदि के मनोहर दृश्य | यहाँ से बद्रीनाथ, औली, हेमकुंड साहिब, फूलों की घाटी, गोपेश्वर, चोप्ता का रास्ता जाता है |
----रात्रि विश्राम----पीपलकोटी—में -२४-५-१८....|
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नवां दिन –२५ -५-१८ प्रातः पीपलकोटी से बद्रीनाथ से रूद्रप्रयाग ---रात्रि विश्राम २५-५-१८ रुद्रप्रयाग होटल में -------रास्ते में पञ्चप्रयाग होते हुए |
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हम लोग नाश्ता करके प्रातः जल्दी ही पीपलकोटी से चल पड़े और रास्ते में हनुमान चट्टी होते हुए बद्रीनाथ पहुंचे |
हनुमान चट्टी --
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             बद्रीनाथ जाने वाले मार्ग में पांडुकेश्वर से सात किलोमीटर की दूरी पर एवं बद्रीनाथ से पांच किलोमीटर पूर्व अलकनंदा के किनारे हनुमान चट्टी नामक सिद्धस्थली है, जो श्री हनुमान जी की तपःस्थली है।
-------- यहां मुख्य मार्ग पर ही उनका एक छोटा सा भव्य मंदिर है। बद्रीनाथ जाने से पूर्व यात्री यहां श्री हनुमान जी के दर्शन अवश्य करते हैं| इस स्थान का विशेष महत्व है, क्योंकि यह हनुमान जी की तपोभूमि मानी जाती है। इस मंदिर में हनुमान जी के वृद्ध रूप का दर्शन होता है |
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---------किवदंति है कि द्वापर युग में वनवास के दौरान बदरीनाथ क्षेत्र में द्रोपदी ने भीम को लक्ष्मी वन से कमल पुष्प ले आने का आग्रह किया तो अलकापुरी जाते समय भीम अलकनंदा नदी के किनारे से होकर लक्ष्मी वन पहुंचे। यहां रास्ते में हनुमान जी आराम कर रहे थे। उनकी पूंछ मार्ग को घेरे हुए थी।
--------भीम ने वानरराज को पहचाने बिना उन्हें पूंछ हटाने के लिए कहा, लेकिन वानरराज ने उन्हें स्वयं पूंछ हटाने के लिए कहा। भीम की लाख कोशिशों के बाद भी वह पूंछ हटाने में नाकाम रहे।
--------तब हनुमान ने अपना विराट रूप दिखाकर भीम का अहम चूर कर दिया था। तभी से यह स्थान हनुमान चट्टी के नाम से विख्यात है।
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हनुमान चट्टी समुद्र तल से 2400 मीटर की ऊंचाई पर हनुमान गंगा नदी और यमुना नदी के संगम बिंदु पर स्थित है।
------ पहले, यह जगह यहाँ से 13 किमी की दूरी पर स्थित लोकप्रिय हिंदू तीर्थ स्थल यमुनोत्री का आरम्भिक बिन्दु था। अब हनुमान चट्टी और जानकी चट्टी के बीच यात्रा योग्य सड़क बन गयी है। भक्त इस जगह से दवाएं और रेनकोट्स जैसी आवश्यक वस्तुएं खरीद सकते हैं। इसके अलावा, वे आवास की सुविधा का लाभ उठा सकते हैं क्योंकि यमुनोत्री की तुलना में यहां अधिक आवास विकल्प मौजूद हैं। यमुनोत्री से हनुमान चट्टी की दूरी 13 किलोमीटर है।
बद्रीनाथ ---
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बदरीनाथ मंदिर , जिसे बदरीनारायण मंदिर भी कहते हैं, नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ठ पर्वत का पार्श्व भाग है , यह अलकनंदा नदी के किनारे में स्थित है।
-------यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बदरीनाथ को समर्पित है। विशाल बद्री के नाम से प्रसिद्घ मुख्य बद्रीनाथ मन्दिर, पंच बद्रियों में से एक है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यही नर नारायण द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतरित हुए
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मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है।यहाँ पर शीत के कारण अलकनन्दा में स्नान करना अत्यन्त ही कठिन है। अलकनन्दा के तो दर्शन ही किये जाते हैं। यात्री तप्तकुण्ड में स्नान करते हैं।
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बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे।
--------जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए।
-------- शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।
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जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बदरीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना।
--------भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बदरीनाथ शिखर कि ऊँचाई 7,138 मीटर है। बदरीनाथ मंदिर में बदरीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।
------- यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप ।बद्रीनाथ जी के मंदिर के अन्दर 15 मुर्तिया स्थापित है | साथ ही साथ मंदिर के अन्दर भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा है |
-------इस मंदिर को “धरती का वैकुण्ठ” भी कहा जाता है | बद्रीनाथ मंदिर में वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है |

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यह स्थान पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित था। भगवान विष्णुजी अपने ध्यानयोग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भा गया। उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के समीप) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप बाल रूप में अवतरण किया और क्रंदन करने लगे। ----------उनका रुदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। फिर माता पार्वती और शिवजी स्वयं उस बालक के समीप उपस्थित हो गए। माता ने पूछा कि बालक तुम्हें क्या चहिये? तो बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया।
---------इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से यह स्थान अपने ध्यानयोग हेतु प्राप्त कर लिया। यही पवित्र स्थान आज बदरीविशाल के नाम से सर्वविदित है।
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जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं।
---------कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बदरी के नाथ-बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बदरीनाथ पड़ा।
--------- जहाँ भगवान बदरीनाथ ने तप किया था, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुण्ड के नाम से विश्व-विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।
------- बद्रीनाथ मंदिर की मान्यता यह भी है कि प्राचीन काल मे यह स्थान बेरो के पेड़ो से भरा हुआ करता था | इसलिए इस जगह का नाम बद्री वन पड़ गया
--------- एक मान्यता यह है कि बद्रीनाथ में भगवान शिव जी को ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली थी |
--------इस जगह के बारे में यह भी कहते है कि इस जगह पर भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी | नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण के रूप में जन्मे थे |
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कहागया कि कलियुग में जब इंसान धर्म-कर्म हीन हो जाएगा और उसके अंदर अभिमान समा जाएगा तब वो इंसानों के सामने साक्षात रुप में नहीं रह पायेंगे. ऐसी स्थिति में नारद शिला के नीचे अलकनंदा में समाई हुए उनकी एक मूर्ति के जरिए वो भक्तों को दर्शन देंगे |
------- उनकी बातें सुनकर देवताओं ने नारदकुंड से मूर्ति निकाल कर विश्वकर्मा से एक मंदिर में मूर्ति की स्थापना करा दी. इस मंदिर का नाम बदरीनाथ पड़ा और नारद को प्रधान अर्चक नियुक्त किया गया |
-------- तब यह भी प्रावधान रखा गया कि बदरीनाथ में नारायण की पूजा का अधिकार 6 महीने के लिए मनुष्यों को होगा और बाकी के छह महीने देवता पूजा अर्चना कर सकेंगे.
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-------ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
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अन्य स्थान –जिन्हें समयाभाव के कारण हम नहीं देख पाए ---
-----बदरीनाथ से नज़र आने वाला बर्फ़ से ढंका ऊँचा शिखर नीलकंठ
-------माणा गाँव- इसे भारत का अंतिम गाँव भी कहा जाता है।
-------वेद व्यास गुफा, गणेश गुफा: यहीं वेदों और उपनिषदों का लेखन कार्य हुआ था।
------भीम पुल :- भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है।
------वसु धारा :- यहाँ अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी। ये जगह माणा से ८ किलोमीटर दूर है। कहते हैं कि जिसके ऊपर इसकी बूंदे पड़ जाती हैं उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वो पापी नहीं होता है।
----लक्ष्मी वन :- यह वन लक्ष्मी माता के वन के नाम से प्रसिद्ध है।
----सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी) :- कहा जाता है कि इसी स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था।
-------अलकापुरी :- अलकनंदा नदी का उद्गम स्थान। इसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है।
------सरस्वती नदी :- पूरे भारत में केवल माणा गाँव में ही यह नदी प्रकट रूप में है।
------उर्वशी मंदिर- भगवान विष्णु के तप से उनकी जंघा से एक अप्सरा उत्पन्न हुई जो उर्वशी नाम से विख्यात हुई। बदरीनाथ कस्बे के समीप ही बामणी गाँव में उनका मंदिर है।
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जब भी आप बदरीनाथ जी के दर्शन करें तो उस पर्वत (नारायण पर्वत) की चोटी की और देखेंगे तो पाएंगे की मंदिर के ऊपर पर्वत की चोटी शेषनाग के रूप में अवस्थित है। शेष नाग के प्राकृतिक फन स्पष्ट देखे जा सकते हैं।
क्रमश----शेष भाग सात ----आगे
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चित्र------
चित्र-३३-अ ब स --हनुमान चट्टी...हनुमान मंदिर
-------नीलकंठ पर्वत से निकलती हुई अलकनंदा के तट पर--
चित्र-३४- बद्रीनाथ दर्शन की पंक्ति में --
चित्र-३५- अ, ब - बद्रीनाथ मंदिर पर ...
चित्र-३६--नीलकंठ पर्वत की पृष्ठभूमि व नर नारायण पर्वतों के मध्य बद्रीनाथ धाम---नीलकन्ठ पर्वत
चित्र- ३७=बद्रीनाथजी –पद्मासन मुद्रा मे –चांदी की प्रतिमा –मंदिर के प्रांगण में
चित्र -३८–बद्रीनाथ मंदिर पर

बुधवार, 13 जून 2018

मेरी चारधाम यात्रा ---भाग पांच --- केदारनाथ ---डा श्याम गुप्त

                               कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

मेरी चारधाम यात्रा ---भाग पांच --- केदारनाथ ---
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--------उत्तरकाशी से सीतापुर-गुप्तकाशी------
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छटा दिन – २२-५-१८—प्रातः उत्तरकाशी से सीतापुर-गुप्तकाशी के लिए चल पड़े जहां होटल में रात्रि निवास किया गया | २२-५-१८ रात्रि----
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-------तीन काशियाँ -----
प्रसिद्ध हैं भागीरथी के किनारे उत्तरकाशी , दूसरी गुप्तकाशी और तीसरी वाराणसी (उत्तरप्रदेश)।
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गुप्तकाशी ----
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प्रसिद्ध तीर्थ धाम केदारनाथ को यातायात से जोड़ने वाले रुद्रप्रयाग –गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक कस्बा है। यह क्षेत्र, केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव भी है, साथ ही यहां कई खूबसूरत पर्यटक स्थल भी हैं| गुप्तकाशी रूद्रप्रयाग ज़िले का एक हिस्सा है और लगभग 1320 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
------- गुप्तकाशी का मार्ग रुद्रप्रयाग से मंदाकिनी नदी के किनारे किनारे है। कुल दूरी लगभग ३५ किमी है। जहाँ चढ़ाई आरंभ होती है वहाँ ==अगस्त्य मुनि ==नाम का स्थान है; वहाँ अगस्त्य का मंदिर है। मार्ग रमणीक है। सामने ही ==वाणासुर की राजधानी शोणितपुर=== के भगनावशेष हैं। चढ़ाई पूरी होने पर गुप्तकाशी पहुँचते हैं ।
-------गुप्तकाशी को ==गुह्यकाशी भी==कहते हैं। गुप्तकाशी में एक कुंड है जिसका नाम है मणिकर्णिका कुंड। लोग इसी में स्नान करते हैं। इसमें दो जलधाराएँ बराबर गिरती रहती हैं जो गंगा और यमुना नाम से अभिहित हैं।
----- कुंड के सामने ==विश्वनाथ का मंदिर== है। इससे मिला हुआ ==अर्धनारीश्वर का मंदिर== है यहाँ भगवान शिव आधे पुरुष और आधे महिला में रूप में है, जो शिव और पार्वती का एक रूप है।
----- इस मंदिर को पंचकेदार का भाग इसलिए माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडवो अपने पाप से मुक्ति चाहते थे इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवो को सलाह दी थी कि वे भगवान शंकर का आर्शीवाद प्राप्त करे।
------इसलिए पांडवो भगवान शंकर का आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए वाराणसी पहुंच गए परन्तु भगवान शंकर वाराणसी से चले गए और गुप्तकाशी में आकर छुप गए क्योकि भगवान शंकर पांडवों से नाराज थे पांडवो अपने कुल का नाश किया था। |
-------एक दिन गुप्तकाशी में भीम ने नंदी को पिछले पैरों और पूँछ से पकड़ लिया। लेकिन नंदी तुरंत अंतरध्यान या गुप्त हो गए। इस जगह का नाम गुप्तकाशी इसलिए पड़ा |
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जब पांडवो गुप्तकाशी पंहुचे तो फिर भगवान शंकर केदारनाथ पहुँच गए जहां भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण कर रखा था।
------- गुप्तकाशी से भगवान शिव की तलाश करते हुए पांडव गौरीकुंड तक गए, नकुल और सहदेव को दूर एक सांड दिखाई दिया, भीम अपनी गदा से उस सांड को मारने दौडे,
------एक जगह सांड बर्फ में अपने सिर को घुसा देता है। भीम पूंछ पकड़कर खींचते हैं। लेकिन सांड अपने सिर का विस्तार करता है। सिर का विस्तार इतना बड़ा होता है कि वह नेपाल के पशुपति नाथ तक पहुंचता है। -------पुराण के अनुसार पशुपतिनाथ भी बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। देखते ही देखते वह सांड एक ज्योतिर्लिंग में बदल जाता है। फिर उससे भगवान शिव प्रकट होते हैं। भगवान शिव का साक्षात दर्शन करने के बाद पांडव अपने पापों से मुक्त होते हैं।
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ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां ==पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर== है। शिव की ==भुजाएं तुंगनाथ में,== ==मुख रुद्रनाथ में,==... ==नाभि मध्यमाहेश्वर=== में और ==जटा कल्पेश्वर में== प्रकट हुए।
---------इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है।
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गुप्तकाशी से बर्फ़ से ढका ==चौखम्बा पर्वत== बड़ा ही सुंदर लगता है। यह चार अलग अलग ऊंचाई की चोटियों वाला चौकोर शिखर वाला पर्वत है | यह हिमालय का वह भाग है जहाँ गंगोत्री ग्लेशियर है और जहाँ से मंदाकिनी का उद्गम होता है। चौखम्बा बद्रीनाथ के पश्चिम में स्थित है।

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सातवाँ दिन---- प्रातः २३-५-१८ – गुप्तकाशी---से केदारनाथ----
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---गुप्तकाशी में सीतापुर बस अड्डे तक अपने वाहन से पहुंचे ----जहां उसे छोड़ना पडा |
-------वहां से पैदल वासुकी गंगा के पुल के उस पार गौरीकुण्ड बस स्टेंड तक, जहां से टैक्सी से गौरीकुण्ड पहुंचे | यहीं से केदारनाथ ऊंचाई के लिए पैदल दुर्गम १४ किमी लम्बे ट्रेक की चढ़ाई होती है जो घोड़े, डांडी ,पिट्ठू या पैदल की जातीहै |
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गौरीकुंड----
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१९८१ मी. ऊँचाई पर है। गौरीकुंड में वासुकी गंगा केदारनाथ से वासुकी ताल होते हुए मंदाकिनी में मिलती है| यहां गौरा माई – गौरी को समर्पित – का सुंदर एवं प्राचीन मंदिर देखने योग्य है। पावन मंदिरगर्भ में शिव और पार्वती की धात्विक प्रतिमाएं विराजमान हैं।
------यहां एक ==पार्वतीशिला==भी विद्यमान है जिसके बारे में माना जाता है कि पार्वती ने यहां बैठकर ध्यान लगाया था। केदारनाथ की पैदल यात्रा के दौरान यह स्थल यात्रियों के लिए आधार शिविर है।
--------यात्री केदारनाथ यात्रा के दौरान इस स्थान पर रूकते है गौरीकुंड में मंदाकिनी के दाहिने तट पर, गर्म पानी के दो सोते हैं| इस कुण्ड में स्नान कर यात्रा के लिए आगे बढ़ते है।
------- माता पार्वती ने भगवान शिव की पहली पत्नी सती का पुनः जन्म लिया था। इसलिए पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए इस स्थान पर तपस्या की थी। माना जाता है कि जब तक भगवान शिव ने उनका प्रेम स्वीकार नहीं किया, तब तक माता पार्वती इसी स्थान पर रहा करती थी। अतः में भगवान शिव ने माता पार्वती के प्रेम को स्वीकार किया।
-------माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह त्रियुगीनारायण स्थान पर हुआ था, जो गौरी कुण्ड से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
------- एक कथा के अनुसार माता पार्वती इस कुण्ड में स्नान करते हुए अपने शरीर के मैल से गणेश को बनाया था और प्रवेश द्वार पर खडा किया। जब भगवान शिव इस स्थान पर पहुंचे तो गणेश ने उन्हें रोक दिया था। इस पर भगवान शिव क्रोधित हो गये और गणेश का सिर काट दिया। माता पार्वती बहुत दुःखी और क्रोधित हो गई। माता पार्वती ने अपने बेटे गणेश का जीवित करने को कहा। भगवान शिव ने हाथी का सिर गणेश के शरीर पर लगा दिया था। इस प्रकार भगवान गणेश के जन्म और हाथी के सिर की कथा इस स्थान से जुड़ी हुई है।
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हमें हेलीकोप्टर से ऊपर केदारनाथ मंदिर तक जाना था एवं तरंत उसी दिन नीचे वापस आना था परन्तु किसी कारणवश हेलीकोप्टर यात्रा रद्द कर दी गयी |
--------अतः हम लोग गौरीकुंड से टट्टुओं द्वारा शाम को केदारनाथ पहुंचे जहाँ लम्बी लाइन में लगकर केदारनाथ जी के दर्शन किये |
--------रात्रि के कारण अत्यंत ठण्ड थी ऊंचाई के कारण हवा में ऑक्सीजन की कमी से सुषमाजी की सांस भी फूलने लगी थी | आगरा धर्मशाला में रात्रि को विश्राम किया, पूरे विश्राम के बाद सभी स्वस्थ हुए और प्रोग्राम में एक दिन की देरी हुई |
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यहाँ मेरी जन्मभूमि ने महत्वपूर्ण कार्य निभाया |
-----------------------------------------------------क्योंकि प्रोग्राम के अनुसार हमें केदारनाथ में रुकना नहीं था अतः कोइ रुकने का स्थान आरक्षित नहीं कराया गया था | दर्शन के पश्चात मंदिर के समीप ही आगरा धर्मशाला थी | वहां के पंडा जी को बताया गया की हम आगरा के हैं तो गाँव व तहसील पूछी गयी| मिढाकुर गाँव तहसील किरावली के नाम से पंडा जी ने तुरंत एक कमरा देदिया जिसमें ६-७ पलंग व पूरा फर्निश्ड था | सबने वहीं रात्रि विश्राम किया| पंडा जी ने गर्म गर्म खाना भी खिलाया | बाद में पंडा जी ने ११०० रु का संकल्प दान करवाया |
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केदारनाथ –
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----- गरुड़चट्टी----- यानि केदारनाथ यात्रा पथ का सबसे अंतिम एवं खूबसूरत पड़ाव है जहां से केदारनाथ धाम महज दो किमी की दूरी पर है। आपदा के बाद इस गरुड़चट्टी ने ही हजारों यात्रियों का जीवन बचाया था । आपदा के बाद नयी व्यवस्था होने से अब यह स्थान महत्वपूर्ण नहीं रहा, आज यहां जाने वाला पूछने वाला कोई नहीं है।
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केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में हिमालय की गोद में स्थित है | यह १२ ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ साथ चारधाम और पञ्चकेदार में से भी एक है |
-------इसका निर्माण परीक्षत पुत्र जन्मेजय ने कराया था | यह अति प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग है, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया उन्होंने ३२ वर्ष की आयु में यहीं श्री केदारनाथ धाम में समाधि ली थी।
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हिमालय के केदार श्रृंग पर विष्णु भगवान के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में यहाँ सदा वास करने का वर प्रदान किया।
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==चौरीबारी हिमनद के कुंड ==से निकलती ==मंदाकिनी नदी के समीप==, केदारनाथ पर्वत शिखर के पाद में निर्मित,यह
==विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर==
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(३,५६२ मीटर) की ऊँचाई पर अवस्थित है। इसे १००० वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं। मंदिर मंदाकिनी के घाट पर बना हुआ हैं भीतर घोर अन्धकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं।
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यहां केदारनाथ धाम में एक झील है जिसमें बर्फ तैरती रहती है इस झील के बारे में प्रचलित है इसी झील से== युधिष्ठिर स्वर्ग गये थे==। श्री केदारनाथ धाम से छह किलोमीटर की दूरी चौखम्बा पर्वत पर== वासुकी ताल== है यहां ==ब्रह्म कमल== काफी होते हैं तथा इस ताल का पानी काफी ठंडा होता है। सोन प्रयाग, त्रिजुगीनारायण, गुप्तकाशी, उखीमठ, अगस्तयमुनि, पंच केदार आदि दर्शनीय स्थल हैं।
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इतनी ऊँचाई पर इस मंदिर को कैसे बनाया गया, इस बारे में आज भी पूर्ण सत्य ज्ञात नहीं हैं।
-------सतयुग में शासन करने वाले राजा केदार के नाम पर इस स्थान का नाम केदार पड़ा।
------राजा केदार ने सात महाद्वीपों पर शासन और वे एक बहुत पुण्यात्मा राजा थे।
------उनकी एक पुत्री थी वृंदा जो देवी लक्ष्मी की एक आंशिक अवतार थी| वृंदा ने ६०,००० वर्षों तक तपस्या की थी उसके नाम पर ही इस स्थान को
==वृंदावन== भी कहा जाता है।

मोदी और केदारनाथ--
=============================  भारत के वर्त्तमान एवं विश्वप्रसिद्ध प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदीजी ने, कहाजाता है कि अपने हिमालय प्रवास के समय यहाँ केदारनाथ धाम में दो वर्ष तपस्या की थी यहीं उन्हें संसार में जाकर कर्म करने कीआज्ञा/ अनुभूति प्राप्त हुई |
-------
क्रमश----शेष भाग छः ..आगे----
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चित्र- २६गुप्तकाशी-एक मनोरम दृश्य चौखम्बा पर्वत व घाटी में बहती हुई मंदाकिनी नदी
चित्र-२७- मंदाकिनी नदी स्नान करतेहुए लोग
चित्र-२८-गौरीकुंड टेक्सी के लिए इन्तजार –
चित्र-२८-Bकेदारनाथ के ट्रेक पर---
चित्र—२९-केदारनाथ मंदिर के लिए पंक्ति व स्वर्णिम केदार शिखर
चित्र-३०-केदारनाथ मंदिर के प्रांगण में--
चित्र-३१-केदार पर्वत की गोद में केदारनाथ मंदिर पर
चित्र-३२-केदारनाथ—वापसी
चित्र-३३,३४,३५ --केदारनाथ पर चढाने के बाद ओक्सीज़न की कमी से बेहाल सुषमाजी ---व अन्य लोग
चित्र-३६ --केदारनाथ में विशिष्ट स्थान की स्मृति में मोदीजी का पोस्टर ---