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बुधवार, 29 मार्च 2017

प्रतिपदा --नव संवत्सर ---डा श्याम गुप्त...

                        कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



 प्रतिपदा --नव संवत्सर ---

सृष्टि रचयिता ने किया, सृष्टि सृजन प्रारम्भ |
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से, संवत्सर आरम्भ ||

गुड़ी-पडवा, उगादी, चेटीचंड, चित्रेय |
विशु बैसाखी प्रतिपदा, संवत्सर नवरेह |

शुभ शुचि सुन्दर सुखद ऋतु, आता यह शुभ वर्ष |
धूम -धाम से मनाएं , भारतीय नव-वर्ष |

ऋतु बसंत मदमा रही, पीताम्बर को ओढ़ |
हरियाली साड़ी पहन, धरती हुई विभोर |

स्वर्ण थाल सा नव, प्रथम, सूर्योदय मन भाय |
धवल चांदनी चैत की, चांदी सी बिखराय |

फूलै फले नयी फसल, नवल अन्न सरसाय |
सनातनी नव-वर्ष यह, प्रकृति-नटी हरषाय |

पाश्चात्य नववर्ष को, सब त्यागें श्रीमान |
भारतीय नववर्ष हित, अब छेड़ें अभियान ||


चित्र-गूगल ..

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

फिर उठी बात गीतों की --- सुषमा गुप्ता

                                             कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित





                                 -फिर उठी बात गीतों की --- सुषमा गुप्ता.----

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             -डा श्याम गुप्त के  -गीत संग्रह ---"तुम तुम और तुम "में लिखा गया प्राक्कथन ---

                

----------- काव्य में सदैव नवीनता व सत्य के आग्रही डा श्यामगुप्त द्वारा सृजित कृतियों में सर्वदा एक अपनी विशिष्टता होती है | कृति-विषय एक विशिष्ट तारतम्यता लिए हुए होते हैं एवं प्रत्येक बार एक नवीनता लिए हुए |
---------उनके कृति-विषय मूलतः लौकिक तथ्य से होते हुए आध्यात्मिक स्तर पर उठते हुए पारलौकिकता तक पहुँचते हैं| वे मूलतः प्रेम के कवि हैं, साहित्यकार हैं| प्रेम उनके लिए संसार है, जीवन है, स्वांस हैं, उच्छवास है, सामाजिकता है , ईश्वर है, उनका प्रेम-रथ लौकिकता से होते हुए दिव्यता, दर्शन व अध्यात्म तक प्रयाण करता है,
-------------यथा प्रथम कृति ---‘काव्यदूत----‘ बालमन की स्मृतियों से कैशोर्य, युवावस्था, गृहस्थ, प्रौढावस्था की जीवन भंगिमाओं की कविताओं-गीतों से होते हुए दर्शन, अध्यात्म, पारलौकिकता से मुक्ति, मोक्ष तक की ऊंचाई तक जाते है |
------काव्य की विभिन्न विधाओं में रचित महाकाव्य ---प्रेमकाव्य---- में प्रेम के सभी रूपों का सांगोपांग वर्णन करते हुए उनका काव्य, लोक से होकर जीवन, दर्शन, अध्यात्म से मोक्षदा एकादश तक प्रयाण करता हुआ वेदान्त के अनुसार प्रेम के मूल “ मा विदिष्वावहै” तक जाता है |
---सृष्टि-महाकाव्य---- तो दर्शन, आधुनिक विज्ञान, वैदिक ज्ञान-विज्ञान, जीवन मूल्य व आदर्शों की समन्वित गाथा ही है | ----शूर्पणखा काव्य-उपन्यास---- में खलनायिका को चारित्रिक बुराइयों से नारी चरित्र की मानसिक भावभूमि की ऊंचाइयों तक पहुंचाया गया है| -----उपन्यास इन्द्रधनुष में----- नायक-नायिका प्रेम व आदर्श एवं स्त्री-पुरुष मैत्री के आध्यात्मिक व दार्शनिकता एवं निष्कामता के उच्च स्तर तक पहुँचते हैं|
--------हम दोनों द्वारा सम्मिलित रूप से रचित प्रथम कृति, ब्रजभाषा काव्य, ‘-----ब्रजबांसुरी----’ के १८ अध्याय, गीता के १८ अध्याय व ईशोपनिषद के १८ मन्त्रों से तादाम्य करते हैं|
----‘कुछ शायरी की बात होजाये’---- में भी दिल की बात से लेकर शब्द-ब्रह्म होते हुए ग़ज़ल व शायरी के भाव ‘वो कौन है’ व ‘नाद-अनाहत’ तक जाते हैं|
--------------------- नवीनता की बात करें तो सृष्टि-महाकाव्य में दुष्टजनों एवं तमाम अमूर्त भावों, अपरामाया, चिदाकाश, त्रिदेव, शास्त्र आदि की वन्दना करते हुए दिखाई देते हैं| प्रेमकाव्य में अध्यायों को सुमनांजलि एवं ब्रजबांसुरी में भाव-अरपन एवं उप-विषयों को सुमन आदि नए नाम से संबोधित करते हैं| शूर्पणखा खंडकाव्य को काव्य-उपन्यास का नवीन नाम दिया गया है |
-----काव्यजगत में बहुचर्चित, नकारात्मक व सकारात्मक दोनों रूपों में ही बहु-आलोचित अगीत-कविता को स्थिरता प्रदान हेतु आपने अगीत महाकाव्य, खंडकाव्य सृजन के साथ साथ ‘अगीत साहित्य दर्पण’ नाम से अगीत छंद-विधान का शास्त्रीय ग्रन्थ ही लिख डाला जो हिन्दी कविता में एक मील का पत्थर है |
------- ड़ा श्याम गुप्त द्वारा रचित प्रेम व श्रृंगार गीतों का प्रस्तुत संग्रह ----‘तुम तुम और तुम’---- इसी श्रृंखला की अगली कड़ी है | प्रस्तुत कृति में प्रेम व श्रृंगार के संयोग, वियोग भावों के साथ-साथ प्रेम, प्रेमी व प्रेमिका की विभिन्न मनोदशाएँ, स्मृतियां, भावों के संगम, अंतर्मन की संवेदनाओं का गीतों द्वारा सांगोपांग वर्णन किया गया है |
----- मानव वय की विविध अवस्थाओं के विभिन्न सोपानों बालमन, कैशोर्य, युवा व प्रौढ़ मन के, जीवन की विभिन्न परिस्थितियों, स्थितियों, घटनाओं, गार्हस्थ्य भावनाओं आदि के सभी रूमानी, रूहानी भाव, तात्विक प्रेमभाव, मनोभावों की सरस, सरल अभिव्यक्ति है|
-----वस्तुतः यह जीवन का काव्य है जिसमें प्रेम व श्रृंगार गीत होते हुए भी सदैव की भाँति लौकिकता के साथ अध्यात्म, दर्शन व जीवन तत्व-दर्शन की गहनता भी सर्वत्र बिखरी हुई है|
------------- जहां तक गीतों की बात है, आधुनिक युग में पारंपरिक गीतों पर प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहे हैं परन्तु प्रश्न उठाने वाले भूल जाते हैं कि प्रेम, श्रृंगार, भक्ति, पीड़ा आदि भाव मानव की मूलवृत्ति हैं
----प्रकृति में जब तक सौंदर्य है, नदियों में प्रवाह है, पक्षियों, पशु, बादलों, झरनों व जीवन-जगत में संवेदना का प्रवाह है, तब तक पारंपरिक गीतों का अस्तित्व रहेगा। भक्त कवियों ने आम जनता के भावों को वाणी दी।
-----यही कारण है कि कबीर रैदास, सूर, मीरा एवं तुलसी के भक्तिपरक गीत, बुल्लेशाह, बिहारी , रहीम के श्रृंगारपरक काव्य जिनमे प्रेम व आत्मिक श्रृंगार की झलक सर्वत्र विद्यमान है आज भी लोक जनमानस में समादृत हैं।

---------------------------भारतवर्ष में कजरी, होली, चैती, बिरहा आदि हिन्दी भाषी क्षेत्रों के प्रमुख प्रेम व श्रृंगार के लोकगीत हैं। सदियों से ये ग्रामगीत श्रुति परम्परा से एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी को अवदान के रूप में मिलते गए हैं।
-----आज भी न तो इन गीतों के शब्दों एवं भावों में कोई विशेष परिवर्तन हुआ है और न ही इनकी गायन शैली में। ये गीत पारम्परिक धरोहर हैं जो भारतीय समाज व मानव-मन के कण्ठहार हैं।
-----कल भी ये गीत अपने इसी सहज रूप में भी बने रहेंगे। इनकी लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण कारण प्रेम अभिव्यक्ति के साथ साथ इनका गीत-तत्व भी रहा है।
--------------------- मेरे विचार में जहाँ तक प्रेम व श्रृंगार की बात है तो साहित्य मर्यादित श्रृंगार का पोषक होना चाहिए | श्रृंगार केवल मांसलता नहीं है अपितु हृदयाकाश की गहराइयों में उत्पन्न भावनाएं व विहरित सौन्दर्यमय अनुभूतियाँ हैं |
---- श्रृंगारिक रचना में नायिका द्वारा घरेलू वर्णन, लरिका, बिटिया, टूटी छान-छप्पर- मढैया आदि संवेदना का गीत तो हो सकता है परन्तु रसमयता व श्रृंगार नहीं | अत्यधिक खुलापन भी मर्यादाविहीन व असाहित्यिक प्रतीत होता है एवं श्रृंगार का आनंद भी तिरोहित ही रहता है |
-----श्रृंगार में शब्दावली, तथ्य, कथ्य इस प्रकार प्रस्तुत हों कि श्रृंगार का आनंद भी मिले एवं खुलापन भी न हो, न इतनी क्लिष्ट शब्दावली कि श्रृंगार का पता ही न चले | प्रस्तुत कृति में रचनाकार द्वारा इस तथ्य का यथासंभव सर्वत्र ध्यान रखने का प्रयास किया गया है |

----------------------- तकनीकी दुनिया, कम्प्यूटर, इंटरनेट, टेलीफोन, मोबाइल आदि के व्यवहार में आनेवाली शब्दावलियों के प्रयोग से गीत की रागात्मक कोमलता और संगीतात्मक तरलता की काफी क्षति हुई है |
----आज नयी कविता में ग्राम्य-जीवन, मजदूर, किसान, शोषण, दमन, बाजारवाद, भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण, उपभोक्तावाद, सांप्रदायिकता-विरोध, आतंकवाद-विरोध, दलित चेतना, स्त्री-विमर्श, शासन विरोध, दिन-प्रतिदिन के सामायिक घटना-तत्वों-समाचारों के वर्णन, व्यक्तिगत दुखानुभूतियाँ जैसी तमाम समस्याओं की जटिल अनुभूतियों की अत्याधिक अभिव्यक्ति के कारण कविता से आज भावुक मन की अभिव्यक्ति या गाने गुनगुनाने की सौन्दर्यमय भावना की तरलता अंतर्धान होगई है जो पारंपरिक प्रेमगीतों, श्रृंगार-गीतों के रूप में मानव के मानसिक विश्रांति, सामाजिक श्रान्ति का उपाख्यान रूप थीं |
----------मेरा विश्वास है कि प्रस्तुत कृति इस शाश्वत गीत भावों की कमी को पूरा करने हेतु एक सक्षम प्रयास सिद्ध होगी |
                                                                                                              ---सुषमा गुप्ता



सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

इन गीतों को मुखरित करदो ....( डा श्याम गुप्त )

                   कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


इन गीतों को मुखरित करदो ....( डा श्याम गुप्त )


मेरे गीत तुम्हारा वंदन इन गीतों को मुखरित करदो |
निज उष्मित अधरों के स्वर दे इन गीतों में मधु रस भरदो |
ह्रदय-पत्र पर चले लेखनी पायल के स्वर की मसि भरदो |

---इन गीतों को मुखरित करदो ||

मेरे गीत तुम्हारे मन के स्वर की मधुर कल्पनाएँ हैं|
तेरे मृदुल गात की अनुपम सुकृत सुघर अल्पनायें हैं |
इन गीतों में प्रीति रंग भर इन्द्रधनुष प्रिय विम्बित करदो |

----इन गीतों में मधु रस भरदो ||

इन गीतों में प्रियतम तेरी बांकी चितवन मृदु मुस्कानें |
मादक यौवन की झिलमिल है देह-यष्टि की सुरभित तानें |
खिलती कलियों के सौरभ की खिल खिल खिल मुस्कानें भरदो |

----- इन गीतों को मुखरित करदो ||

इन गीतों में विरह-मिलन के विविध रंग रूपक उपमाएं |
पल पल रंग बदलते जीवन-जग की विविध व्यंजनायें |
मधुर रागिनी सुरभित साँसों की दे इनमें जीवन भरदो |

---इन गीतों में जीवन भरदो||

...

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

पुकारा नहीं ....ग़ज़ल---- डा श्याम गुप्त ....

                                           कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


पुकारा नहीं ....ग़ज़ल----

हम भला क्या कहते ,
तुमने ही पुकारा नहीं |

दर्दे-दिल रहे सहते,
तुमने ही पुकारा नहीं |

टूटते रहे पर दिया,
तुमने ही सहारा नहीं |

तेरी वफ़ा का किया,
हमने ही नज़ारा नहीं |

तूफां में कश्ती को मिला,
साहिल का सहारा नहीं |

और भी गम हैं, सिर्फ-
दिल ही बेचारा नहीं |

अब भी निकल लो श्याम ,
मिलेगा फिर किनारा नहीं |

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

पुस्तक मेला में अखिल भारतीय अगीत परिषद् की राष्ट्रीय गोष्ठी एवं डा श्यामगुप्त की सद्य प्रकाशित पुस्तक अगीत-त्रयी का लोकार्पण संपन्न ..डा श्याम गुप्त

                                      कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


****अखिल भारतीय अगीत परिषद् की राष्ट्रीय गोष्ठी एवं डा श्यामगुप्त की सद्य प्रकाशित पुस्तक अगीत-त्रयी का लोकार्पण संपन्न ***

                          २९-९-१६ को १४वे पुस्तक मेला, लखनऊ, मोतीमहल लान में अखिल भारतीय अगीत परिषद् के तत्वावधान में वृहद् राष्ट्रीय एवं नारी शक्ति को समर्पित काव्य गोष्ठी संपन्न हुई | समारोह में डा श्यामगुप्त की सद्य प्रकाशित पुस्तक अगीत-त्रयी का लोकार्पण एवं विवेचना की गयी | समारोह के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रंगनाथ सत्य मुख्य-अतिथि प्रोफ ओमप्रकाश पांडे, पूर्व अध्यक्ष संस्कृत विभाग लविवि एवं विशिष्ट अतिथि श्री सुलतान शाकिर हाशमी पूर्व सदस्य केन्द्रीय लोक सेवा आयोग, सुप्रसिद्ध उर्दू, हिन्दी व ब्रज भाषा के साहित्यकार एवं श्री रामचंद्र शुक्ल पूर्व न्यायाधीश थे |
                              दीप प्रज्वलन के पश्चात श्री कुमार तरल, साहित्यभूषण श्री देवकी नंदन शांत एवं श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा वाणी वन्दना प्रस्तुत की गयी |
                              गोष्ठी का संचालन एवं मंच संचालन डा योगेश गुप्त ने किया | गोष्ठी में लगभग ६० कवियों ने अपनी विविध विषयक रचनाओं का पाठ किया | समारोह में विभिन्न कवियों को सम्मान-पत्र व प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया भी गया |
                            लोकार्पित पुस्तक अगीत-त्रयी पर अपने वक्तव्य में डा श्यामगुप्त ने कृति के लिखे जाने की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अपनी इससे पूर्व प्रकाशित पुस्तक अगीत का छंद विधान ‘अगीत साहित्य दर्पण’ जिसमें अगीत के विश्व भर में फैले कवियों, अगीत पर कृतियों, शोधों, आलेखों एवं अगीत के एतिहासिक वस्तुस्थिति एवं वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य का विस्तृत वर्णन किया गया था, साहित्य जगत को प्रस्तुत करने के पश्चात् डा रंगनाथ मिश्र सत्य एवं साहित्य जगत में यह अनुभव किया जारहा था कि इस अपूर्व कविता विधा अगीत के जो प्रमुख स्तम्भ हैं उनके बारे में भी तार-सप्तक की भांति एक कृति प्रस्तुत की जाय | उसी का प्रतिफल है प्रस्तुत कृति ‘अगीत-त्रयी’ जिसमें अगीत के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र सत्य, उसके प्रगतिकारक पं जगतनारायण पांडे एवं उसके सर्वांगीण उन्नायक डा श्याम गुप्त के विचार, वक्तव्य , व्यक्तित्व व कृतित्व एवं अगीत ३०-३० रचनाओं को संकलित किया गया है |
                   श्रीमती सुषमा गुप्ता ने अगीत-त्रयी पर अपने वक्तव्य में कहा कि ये तीनों कवि जिनका इस कृति में उल्लेख है कविता व साहित्य की प्रत्येक विधा गीत, छंद आदि में संपन्न व समर्पित होते हुए भी इन साहित्यकारों ने हिन्दी जगत को एक नवीन विधा प्रदान की जो आज राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय क्षितिज पर अगीत विधा के नाम से जानी जाती है | इसके लिए साहित्य जगत इनका सदैव आभारी रहेगा |
                        समारोह के मुख्य अतिथि के वक्तव्य में प्रोफ ओम प्रकाश पांडे ने स्पष्ट किया कि नारी सशक्तीकरण की बात सही है परन्तु इस देश में नारी कभी भी निशक्त नहीं रही | नारी के महत्ता व सदा-सशक्तता को रेखांकित करते हुए उन्होंने गार्गी–याज्ञवल्क एवं विद्यमा आदि विदुषी नारियों के व्यक्तित्व व कृतित्व का उल्लेख किया |
                         अध्यक्षीय वक्तव्य में डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने अगीत-त्रयी पर विवेचनात्मक तथ्य प्रस्तुत करते हुए इसे साहित्य की महत्वपूर्ण कृति एवं विश्वविद्यालयों में अध्ययन के योग्य बताया |

                      अंत में डा योगेश ने सभी को धन्यवाद ज्ञापन किया |

 
 माँ का माल्यार्पण

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

चाय पर साहित्यिक परिचर्चा’ एवं काव्य-गोष्ठी---- डा श्याम गुप्त....

                                         कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


 चाय पर साहित्यिक परिचर्चा’ एवं काव्य-गोष्ठी----

--------दिनांक १२-८-१६ शुक्रवार को जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार, छंदकार आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी से व्यक्तिगत साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ | लखनऊ प्रवास के दौरान वे लखनऊ के सुकवि श्री अमरनाथ जी के साथ मेरे आवास पर पधारे | सलिल जी से इंटरनेट व फेसबुक के जरिये तो अच्छी मुलाक़ात थी परन्तु आमने सामने साक्षात्कार का सुअवसर कल प्राप्त हुआ श्री अमरनाथ जी के सौजन्य से |

------ सलिल जी ने मुझे अपनी गीत-नवगीत की पुस्तक ‘काल है संक्रांति का’ भेंट की | सलिल जी ने बताया कि मेरी एक पुस्तक महाकाव्य सृष्टि उनके पास है | मैंने उन्हें अपनी पुस्तकें ‘शूर्पणखा खंडकाव्य, ‘ब्रजबांसुरी’, ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ तथा ‘अगीत साहित्य दर्पण’ भेंट की |

--------मेरे प्रश्न पर कि नवगीत वास्तव में क्या है पर यह अनौपचारिक मुलाक़ात एक संक्षिप्त - ‘चाय पर साहित्यिक परिचर्चा’ एवं काव्य-गोष्ठी में परिवर्तित होगई, जिसमें श्री संजीव वर्मा सलिल, श्री अमरनाथ, श्रीमती सुषमा गुप्ता तथा डा श्यामगुप्त ने अपने अपने विचार प्रस्तुत किये एवं काव्य पाठ किया |

------ विचार-विमर्श के दौरान सलिल जी ने बताया कि वास्तव में जो नवगीत के लिए कहा जाता है उससे वे पूर्ण रूप से सहमत नहीं हैं कि केवल व्यंजनात्मक कथ्य नवगीत का अत्यावश्यक तत्व है क्योंकि व्यंजना या लक्षणा आदि तो काव्य में स्वतः प्रवेश करती हैं आवश्यकतानुसार, उन्हें साप्रयास लाने पर कविता में अप्राकृतिक सा भाव परिलक्षित होने लगेगा | सलिल जी ने यह भी कहा कि युग की असमानताएं, विसंगतियां, द्वंद्व वर्णन ही किसी भी विधा का मूल विषय नहीं होसकता |
                   डा श्यामगुप्त ने सहमत होते हुए कहा कि निश्चय ही किसी भी विधा का एक सुनिश्चित विषय निर्धारित नहीं होसकता | डा श्यामगुप्त के कथन कि नवगीत गीत का सलाद है और एक प्रकार से गीत ही है, पर सलिल जी का कहना था कि सचमुच ही किसी भी गीत को पृथक पृथक मात्रा-खण्डों की पंक्तियों में करके रखा जाय तो नवगीत बन जाता है | छंदों व सनातन छंदों आदि पर एक विशिष्ट रूढिगतता की अनावश्यकता पर भी चर्चा हुई | सलिल जी का कथन था कि हम जो कुछ भी बोलते हैं वह छंद ही होता है |

------ सलिल जी ने हिन्दी गज़ल में उर्दू शब्दों की बहुलता की अनावश्यकता एवं उर्दू बहरों का संस्कृत-हिन्दी गणों पर ही आधारित होने पर भी चर्चा करते हुए उसे गज़ल की अपेक्षा मुक्तिका कहे जाने की बात रखी | डा श्यामगुप्त ने सभी प्रकार के काव्य की भांति शायरी व गज़ल का आदि श्रोत भी ऋग्वेद से होने की चर्चा की |


----- सलिल जी ने सूरज के विशिष्ट प्रतीक पर रचित कई कविताओं का पाठ किया –
आओ भी सूरज!
छंट गए हैं फूट के बादल
पतंगें एकता की मिलकर उडाओ
गाओ भी सूरज -
--- तथा

सूरज बबुआ
चल स्कूल ...| 


-------- श्रीमती सुषमा गुप्ता जी ने वर्षा गीत सुनाया—
आई सावन की बहार
बदरिया घिरि घिरि आवै |


------- डा श्याम गुप्त ने ब्रजभाषा का एक नवगीत सुनाया –

ना उम्मीदी ने हर मन में
अविश्वास पनपायौ |

असली ते हू सुन्दर, नकली
पुष्प होय करिवैं हैं |
लाचारी है बाजारनि में
वही बिकै करिवे हैं
| ---तथा घनाक्षरी छंद में घनाक्षरी की परिभाषा प्रस्तुत की ...

‘घनन घनन घन घन के समान करें
श्रोता को भावें करें घन जैसी गर्जना |’



चित्र में --१.परिचर्चा ---२. सलिल जी का काव्य पाठ, ...३.सुषमा गुप्ता जी का काव्य पाठ...४.डा श्याम गुप्त का नवगीत ...५.सेल्फी----डा श्याम गुप्त, संजीव वर्मा सलिल, श्रीमती सुषमा गुप्ता...श्री अमरनाथ जी ..



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