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रविवार, 17 जून 2018

मेरी चारधाम यात्रा ---भाग आठ -----अंतिम क़िस्त ---पंचप्रयाग ------ डा श्याम गुप्त

                                    कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

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मेरी चारधाम यात्रा ---भाग आठ -----अंतिम क़िस्त ---
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पंचप्रयाग ------
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उत्तराखंड में गंगा व अन्य नदियों के संगम पर पांच प्रयाग स्थित हैं जो पौराणिक महत्त्व के हैं एवं हिन्दुओं के तीर्थ हैं| |
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१. विष्णुप्रयाग----
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धौली गंगा ( विष्णु गंगा ) तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर स्थित विष्णुप्रयाग-- प्रथम प्रयाग --है । संगम पर भगवान विष्णु जी प्रतिमा से सुशोभित प्राचीन मंदिर और विष्णु कुण्ड दर्शनीय हैं।
------यह सागर तल से १३७२ मी० की ऊंचाई पर स्थित है। विष्णु प्रयाग जोशीमठ-बद्रीनाथ मोटर मार्ग पर स्थित है। जोशीमठ से आगे मोटर मार्ग से 12 किमी और पैदल मार्ग से 3 किमी की दूरी पर विष्णुप्रयाग नामक संगम स्थान है।
--------यहां पर अलकनंदा तथा विष्णुगंगा (धौली गंगा) का संगम स्थल है। स्कंदपुराण में इस तीर्थ का वर्णन विस्तार से आया है। यहां विष्णुगंगा में 5 तथा अलकनंदा में 5 कुंडों का वर्णन आया है।
-------यहीं से ====सूक्ष्म बदरिकाश्रम ====प्रारंभ होता है। इसी स्थल पर दायें-बायें दो पर्वत हैं, जिन्हें भगवान के द्वारपालों के रूप में जाना जाता है। दायें जय और बायें विजय हैं।
२. नंदप्रयाग --
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नन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर नन्दप्रयाग स्थित है। यह सागर तल से २८०५ फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर गोपाल जी का मंदिर दर्शनीय है।
------पंच प्रयागों में से ==दूसरा ===नंदप्रयाग अलकनंदा नदी पर वह जगह है जहां अलकनंदा एवं नंदाकिनी नदियों का मिलन होता है।
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अलकनंदा एवं नंदाकिनी के संगम पर बसा नंदप्रयाग का मूल नाम ==कंदासु ==था, स्कंदपुराण में नंदप्रयाग को ==कण्व आश्रम ==कहा गया है जहां दुष्यंत एवं शकुंतला की कहानी गढ़ी गयी।
------यह कर्णप्रयाग से उत्तर में बदरीनाथ मार्ग पर 21 किमी आगे नंदाकिनी एवं अलकनंदा का पावन संगम है चंडिका देवी जिन्हें यह मंदिर समर्पित है, वह पास के नंदप्रयाग सहित सात गांवों की ग्राम देवी हैं।
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भगवान कृष्ण के पिता राजा नंद अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में यहां अपना महायज्ञ पूरा करने आये तथा
-------उन्हीं के नाम पर नंदप्रयाग का नाम पड़ा। यहां नंदबाबा ने वर्षों तक तप किया था।
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== दसौली ==- नंदप्रयाग से 10 किलोमटीर दूर। इस छोटे गांव में बैरास कुंड स्थित है जहां, कहा जाता है, कि-
----- रावण ने भगवान शिव की तपस्या की थी। रावण ने अपनी ताकत दिखाने के लिये कैलाश पर्वत को उठा लिया था और इस जगह अपने 10 सिरों की बली देने की तैयारी की थी। इस जगह का नाम तब से दशोली पड़ा जो अब दसौली में परिवर्तित हो गया है।
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३.कर्णप्रयाग,--
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अलकनंदा व पिंडर नदी संगम पर --कर्णप्रयाग के अन्तर्गत गढ़वाल मण्डल के चमोली जिले का एक गाँव है|
------पिण्डर का एक नाम== कर्ण गंगा ==भी है, जिसके कारण ही इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग पडा। यहां पर उमा मंदिर और कर्ण मंदिर दर्शनीय है। पंच प्रयागों में तीसरा है
------- आज जहां कर्ण को समर्पित मंदिर है, वह स्थान कभी जल के अंदर था और मात्र कर्णशिला नामक एक पत्थर की नोक जल के बाहर थी।
------ कुरूक्षेत्र युद्ध के बाद भगवान कृष्ण ने कर्ण का दाह संस्कार कर्णशिला पर अपनी हथेली का संतुलन बनाये रखकर किया था।
------- एक दूसरी कहावतानुसार कर्ण यहां अपने पिता सूर्य की आराधना किया करता था।
-------यह भी कहा जाता है कि यहां देवी गंगा तथा भगवान शिव ने कर्ण को साक्षात दर्शन दिया था। ----यहीं पर महादानी कर्ण द्वारा भगवान सूर्य की आराधना और अभेद्य कवच कुंडलों का प्राप्त किया जाना प्रसिद्ध है।
-------पौराणिक रूप से कर्णप्रयाग की संबद्धता उमा देवी (पार्वती) से भी है। उन्हें समर्पित कर्णप्रयाग के मंदिर की स्थापना 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा पहले हो चुकी थी।
-------कहावत है कि ==उमा का जन्म डिमरी ब्राह्मणों के घर संक्रीसेरा ==के एक खेत में हुआ था, जो बद्रीनाथ के अधिकृत पुजारी थे और इन्हें ही उसका ==मायका ==माना जाता है तथा कपरीपट्टी गांव का शिव मंदिर उनकी ==ससुराल ==होती है।
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४.रुद्रप्रयाग----
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मन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर रुद्रप्रयाग स्थित है। संगम स्थल के समीप चामुंडा देवी व रुद्रनाथ मंदिर दर्शनीय है। रुद्र प्रयाग ऋषिकेश से १३९ किमी० की दूरी पर स्थित है। यह नगर बद्रीनाथ मोटर मार्ग पर स्थित है।
--------यह माना जाता है कि नारद मुनि ने इस पर संगीत के गूढ रहस्यों को जानने के लिये "रुद्रनाथ महादेव" की अराधना की थी।
------ श्रीनगर(गढ़वाल ) से उत्तर में 37 किमी की दूरी पर मंदाकिनी तथा अलकनंदा के पावन संगम पर रुद्रप्रयाग नामक पुण्य तीर्थ है।
-------पुराणों में इस तीर्थ का वर्णन विस्तार से आया है। यहीं पर ब्रह्माजी की आज्ञा से देवर्षि नारद ने हज़ारों वर्षों की तपस्या के पश्चात भगवान शंकर का साक्षात्कार कर ==सांगोपांग गांधर्व शास्त्र ===प्राप्त किया था।
------यहीं पर भगवान रुद्र ने श्री नारदजी को== `महती' नाम की वीणा ==भी प्रदान की।
-------संगम से कुछ ऊपर भगवान शंकर का `रुद्रेश्वर' नामक लिंग है, जिसके दर्शन अतीव पुण्यदायी बताये गये हैं। यहीं से यात्रा मार्ग केदारनाथ के लिए जाता है, जो ऊखीमठ, चोपता, मंडल, गोपेश्वर होकर चमोली में बदरीनाथजी के मुख्य यात्रा मार्ग में मिल जाता है।
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५.देव प्रयाग –
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अलकनंदा तथा भगीरथी नदियों के संगम पर देवप्रयाग नामक स्थान स्थित है।
-------इसी संगम स्थल के बाद ====इस नदी को गंगा के नाम से ====जाना जाता है।
------यह समुद्र सतह से १५०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। देवप्रयाग की ऋषिकेश से सडक मार्ग दूरी ७० किमी० है।
-------गढवाल क्षेत्र में भगीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है।
-------देवप्रयाग में शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर है, जो की यहां के मुख्य आकर्षण हैं। रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली से निर्मित है।
-------देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है। देवप्रयाग में कौवे दिखायी नहीं देते, जो की एक आश्चर्य की बात है।
-------स्कंद पुराण केदारखंड में इस तीर्थ का विस्तार से वर्णन मिलता है कि देव शर्मा नामक ब्राह्मण ने सतयुग में निराहार सूखे पत्ते चबाकर तथा एक पैर पर खड़े रहकर एक हज़ार वर्षों तक तप किया तथा भगवान विष्णु के प्रत्यक्ष दर्शन और वर प्राप्त किया।
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समयाभाव के कारण हम अपने वाहन से केवल इनको दूर से अथवा नामपट्ट को देखते हुए चलते गए |
दसवां दिन--- प्रातः २६-५-१८ को रुद्रप्रयाग से ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार
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प्रातः नाश्ते के पश्चात् हम लोग अपनी यात्रा के अंतिम खंड हरिद्वार के लिए ऋषिकेश होते हुए चल पड़े जो १६५ किमी है |
ऋषिकेश –
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गंगा के किनारे, शिवालिक हिमालय रेंज से तीन ओर से घिरा, ऋषियों-मुनियों की तपोस्थली का धाम है |
-------रैभ्य मुनि ने यहाँ कठोर तपस्या की थी और भगवान विष्णु ने यहाँ हृषीकेश रूप में यहाँ दर्शन दिए थे |
समयाभाव के कारण एवं पहले भी देखा हुआ होने के कारण हम सीधे हरिद्वार चलते गए जहां से शाम को बस द्वारा प्रातः २७-५-१८ को लखनऊ पहुंचे |
-- इति--- --------------------------------------------------
चित्र------
चित्र१-२-३- विष्णुप्रयाग -विष्णुप्रयाग संगम -धुली गंगा व अलकनंदा -विष्णु-गोड बाँध , जल परियोजना
चित्र-४- नन्द प्रयाग -- नंदाकिनी व अलकनन्दा
चित्र ५- कर्णप्रयाग---पिंडर व अलकनंदा
चित्र ६-रूद्र प्रयाग-मंदाकिनी व अलकनंदा
चित्र—७-देवप्रयाग –भागीरथी,अलकनंदा का संगम ..यहाँ से ही इसे गंगा नाम मिलता है --







 
 

 
 

शनिवार, 16 जून 2018

सच्चा सुख---- काव्यपथ-शान्तिपथ---डा श्याम गुप्त

                                    कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


---सच्चा सुख----
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काव्यपथ-शान्तिपथ
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अब तक जगसुख रहा खोजता,
मन में थी इक चाह मचलती |
चाह यही थी प्रभु को खोजूं,
मैंने अपनी राह बदल दी ||

चलें काव्य के दुर्गम पथ पर,
यदि चाहें प्रभु मय जग पाना |
देश समाज राष्ट्र के हित में,
यदि परमार्थ मार्ग अपनाना |

अंतर्मन ब्रह्माण्ड है सारा,
मन मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा |
अंतर्मन की शान्ति मिले तो,
वह ही ईश्वर अल्लाह प्यारा |

अपने अंतर्मन की दुनिया,
जग को भाव समर्पण करदें |
ईर्ष्या द्वंद्व भाव इच्छाएं,
सब कुछ प्रभु को अर्पण करदें |

कलम उठी परमार्थ भाव हित,
मन तो प्रभु को किया समर्पित |
अधम भाव सब मुझसे लिपटें,
उत्तम सारे जग को अर्पित |

अंतर्मन के द्वंद्व-प्रीति सब,
बने भाव जब मन में उभरे |
गीत बने जग के सुख दुःख के,
मसि बन कर कागज़ पर उतरे |

प्रभु के गीत ढले मानस में ,
शान्ति मिली मन सरिता तीरे |
जैसे समतल शांत नदी में,
बहती तरणी धीरे धीरे ||

शुक्रवार, 15 जून 2018

मेरी चारधाम यात्रा-----भाग सात----पंचबद्री --- डा श्याम गुप्त

                                कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


मेरी चारधाम यात्रा-----भाग सात----पंचबद्री ---
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यह भारतीय मनीषा ही की विशेषता है कि उनके यहाँ वृद्ध, आदि व भविष्य के तीर्थों आदि के बारे में पहले ही निश्चित कर दिया जाता है | वास्तव में यह एक सुनिश्चित तथ्य है की मानव---- ( जिसे भूल से विदेशी लोग आर्य कहते हैं जबकि उनके द्वारा कहे-लिखे हुए आर्यों आदि के बारे में समस्त तथ्य वस्तुतः मानव के ही प्रगति व फैलाव हैं |
------आर्य तो कहीं विदेश में कभी थे ही नहीं वे तो केवल भारतवर्ष स्थित प्रबुद्ध मानव की एक स्थिति व कालखंड विशेष में स्थित मानव थे )----
-----मानव जहां जहाँ से आगे बढ़ता जाता है अपने सांस्कृतिक तथ्य, कथ्य व वस्तुओं, स्थानों को अपने साथ लिए चलता है | जैसे -
१---आदि पृथ्वी का दक्षिणी भूभाग गोंडवाना लेंड ---मानव के साथ साथ चलते चलते दक्षिण भारत के गोंडवाना प्रदेश में आगया |
-२.----उत्तर कुरु-कुरुओं का स्थल कभी उत्तरी ध्रुव प्रदेश था जो मानव के साथ चलते चलते भारत में कुरुक्षेत्र तक आगया |
------- इसीलिये आदि-केदार, वृद्ध केदार, आदि-बद्री, वृद्ध बद्री जैसे तमाम स्थान भारत के विभिन्न प्रदेशों स्थानों में उपस्थित हैं | भारतीय मनीषा की एक विशिष्ट बात है की वे भविष्य की बात भी स्पष्ट तौर पर रखते हुए देखे जाते हैं जिसका एक उदाहरण है भविष्य बद्री |
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पंचबद्री/ सप्तबद्री ---
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---बदरीनारायण के अतिरिक्त चार बद्री और हैं---(+२ मंदिर =सप्त बद्री )
बद्रीनाथ धाम में सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ आराध्य देव श्री बदरीनारायण भगवान के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। विष्णु के इन पांच रूपों को ‘पंच बद्री’ के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी यहां स्थापित है। भविष्य बद्री, योगध्यान बद्री, आदि बद्री तथा वृद्ध बद्री
१.-----वृद्ध बद्री मंदिर---
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भगवान विष्णु को समर्पित, वृद्ध मंदिर उत्तराखंड के एनिमथ गांव में स्थित हैं। यह गावं जोशीमठ से 7 किलोमीटर की दूरी पर है। वृद्ध बद्री मंदिर समुद्र तल से 1380 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। वृद्ध बद्री मंदिर का नाम सप्त बद्री यात्रा में आता है।
-------वृद्ध मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति एक बूढे़ व्यक्ति के रूप में स्थापित है। इसलिए इस मंदिर का नाम वृद्ध बद्री है और बद्री भगवान विष्णु का एक नाम है।
------ऐसा माना जाता है कि नारद जी ने भगवान विष्णु को खुश करने के लिए यह तपस्या की थी। नारद की तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु ने एक बूढ़े व्यक्ति के रूप में दिखाई दिये और नारद की तपस्या का उत्तर दिया था।
-------पौराणिक कथा के अनुसार, बद्रीनाथ की मूर्ति को दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई थी और यहां पूजा की थी। कलियुग के आगमन पर, भगवान विष्णु ने खुद को इस जगह से हटाना दिया, बाद में आदि शंकराचार्य जी ने नारद-कुंड तालाब में आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त मूर्ति मिली और इसे केंद्रीय बद्रीनाथ मंदिर में स्थापित किया था।
------- पौराणिक कथा के अनुसार, बद्रीनाथ मंदिर में उनकी स्थापना से पहले, बद्रीनाथ की पूजा आदि शंकराचार्य ने की थी। मंदिर पूरे साल खुला रहता है।
२--भविष्य बद्री मंदिर----
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हिन्दूओं का एक प्रसिद्ध एव प्राचीन मंदिर है। भविष्य बद्री मंदिर उत्तराखंड राज्य के जोशीमठ से 17 किलोमीटर की दूरी पर गांव सुभाई में स्थित है। यह मंदिर समुद्र तल से 2,744 मीटर से ऊंचाई पर स्थित है।
------- भविष्य बद्री मंदिर घने जंगल के बीच स्थित है तथ यह तक केवल ट्रेगिंग द्वारा की जाया जा सकता है। यह धौली गंगा नदी के किनारे कैलाश और मानसरोवर पर्वत के एक प्राचीन तीर्थ मार्ग पर स्थित है।
------ भविष्य मंदिर पंच बद्री (बद्रीनाथ, योगध्यान बद्री, आदि बद्री तथा वृद्ध बद्री) एवं सप्त बद्री तीर्थ में से एक है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिरों को निर्माण आदि शंकराचार्य ने किया था। उत्तराखंड क्षेत्र में कई मंदिरों के निर्माण के लिए आदि शंकराचार्य को श्रेय दिया जाता है। आदि शंकराचार्य द्वारा इन मंदिरों के निर्माण उद्देश्य देश के हर दूरदराज हिस्से में हिन्दू धर्म का प्रचार करना था।
------यहां मंदिर के पास एक शिला है, इस शिला को ध्यान से देखने पर भगवान की आधी आकृति नजर आती है। यहां भगवान बद्री विशाल शालिग्राम मूर्ति के रूप में विराजमान हैं।
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पौराणिक कथा के अनुसार जब कलयुग के अन्त में नर और नारायण पर्वत के आपस में मिलने पर बद्रीनाथ धाम का रास्ता अवरुद्ध व दुर्गम हो जायेगा। तब भगवान बद्री इस भविष्य बद्री मंदिर में भी दर्शन देगें। बद्रीनाथ मंदिर के बजाय यहां पूजा की जाएगी। इस मंदिर में भगवान विष्णु के एक अवतार नरसिंह की मूर्ति के पूजा की जाती है।
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भविष्य बद्री जोशीमठ से लगभग 11 किलोमीटर दूर सलधर तक मोटर वाहन से जाया जाता है। इसके बाद मंदिर तक पहुंचने के लिए 6 किलोमीटर पैदल रास्ता है।
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३-आदि बद्री ----
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उत्तराखंड, चमेली जिला में स्थित है। यह मंदिर कर्णप्रयाग से 17 किलोमीटर एव चमेली जिले के पिंडर नदी और अलकनंदा नदी के संगम पर स्थित है।
-------आदि बद्ररी मंदिर पंच बद्री और सप्त बद्री में पहला मंदिर है। आदि बद्ररी 16 मंदिरों का समूह है। माना जाता है कि यह मंदिर गुप्तकाल एवं 5वीं शताब्दी से 8वीं शताब्दी के दौरान बनाये गये थे।
------इस मंदिरों के समूह में 16 मंदिर में जिनमें से 2 मंदिर का जीर्णशीर्ण हो चुके है।
------- इन मंदिरों के समूह में मुख्य मंदिर भगवान विष्णु का है और इस मंदिर के विशेषता यह है कि मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा यहां खड़े रूप में है जो 3.3 फुट ऊचीं काले रंग के पत्थर से बनी हुई है। प्रतिमा में विष्णु के हाथों में एक गदा, कमल और चक्र का चित्रण किया गया है।
------ आदि बद्ररी चांदपुर किले से 3 किलोमीटर (1.9 मील) या गढ़ी पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जिसे गढ़वाल के परमार राजाओं द्वारा बनाया गया था। आदि बद्ररी कर्णप्रयाग से एक घंटे की ड्राइव और रानीखेत के रास्ते चूलकोट के करीब है।
४--योगध्यान बद्री -
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यह मंदिर भारत के राज्य उत्तराखंड के पांडुकेश्वर में स्थित है। यह मंदिर अलकनंदा नदी के गोविंद घाट के किनारे पर तथा समुद्र तल से लगभग 1,920 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
------- इस मंदिर का नाम पवित्र ‘सप्त बद्री’ में आता है। यह मंदिर बद्रीनाथ मंदिर की यात्रा के दौरान आता है, जोशीमठ से 18 किलोमीटर की दूरी पर और हनुमान चट्टी से 9 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
------पाण्डुकेश्वर में 1500 वर्षो से भी प्राचीन योगध्यान बद्री का मन्दिर जोशीमठ तथा पीपलकोठी पर स्थित है। महाभारत काल के अंत में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के, कलियुग के प्रभाव से बचने हेतु पाण्डव हिमालय की ओर आए और यही पर उन्होंने स्वर्गारोहण के पूर्व घोर तपस्या की थी।
------ ऐसा माना जाता है कि महाभारत के नायक पांच पांडवों के पिता राजा पांडु ने इस स्थान पर भगवान विष्णु की कांस्य की मूिर्त स्थापित करी थी। यही वह स्थान है जहां पर पांडव पैदा हुए थे। राजा पांडु ने इस स्थान पर मोक्ष प्राप्त किया था।
--------इस मंदिर भगवान विष्णु की मूर्ति एक ध्यान मुद्रा में स्थापित है इसलिए इस स्थान को ‘योग-ध्यान बद्री’ कहा जाता है।
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बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने पर भगवान बद्रीनाथ की उत्सव-मूर्ति के लिए योगध्यान बद्री को शीतकालीन निवास माना जाता है। उधव, कुबेर और भगवान विष्णु की उत्सव मूर्ति की पूजा इस मंदिर में की जाती है। इसलिए, यह धार्मिक रूप से नियुक्त किया गया है कि इस स्थान पर प्रार्थनाओं के बिना तीर्थयात्रा पूरी नहीं होगी। दक्षिण भारत के भट्ट (पुजारी) मंदिर में मुख्य पुजारी के रूप में कार्य करते हैं।
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५..त्रियुगीनारायण मंदिर --
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यह प्राचीन मंदिर भगवान श्री नारायण को समर्पित है। यह मंदिर भारत के राज्य उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में स्थित है।
------- ऐसा माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान शिव और पार्वती की शादी हुई थी। इसलिए यह एक लोकप्रिय तीर्थस्थल है। इस स्थान पर चार कुंड है रुद्र कुंड, विष्णु कुंड, ब्रह्मा कुंड और सरस्वती कुंड।
----- इस मंदिर की विशेषता यह कि मंदिर के सामने एक सतत आग हमेशा जलती रहती है। माना जाता है कि यह लौ भगवान शिव व पार्वती के विवाह के समय से जलती रही है। इस लिए यह मंदिर अखंड धूनी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ‘अखण्ड’ का अर्थ शाश्वत है और ‘धूनी’ का अर्थ दिव्य लौ है।
------ त्रियुगिनारायण मंदिर की वास्तुकला शैली केदारनाथ मंदिर जैसी है। यह मंदिर बिल्कुल केदारनाथ मंदिर जैसा ही दिखता है और इसलिए बहुत से भक्तों को आकर्षित करता है। वर्तमान मंदिर को अखण्ड धूनी मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की चांदी की 2 फुट की मूर्ति है।
------ भगवान विष्णु ने शादी को औपचारिक रूप दिया था और समारोहों में पार्वती के भाई के रूप में कार्य किया, भगवान ब्रह्मा जी ने शादी में एक पुजारी के रूप में कार्य किया था।
-------सभी ऋषियों की उपस्थिति में विवाह सम्पन्न किया गया था। शादी के सही स्थान को मंदिर के सामने ब्रह्मा शिला नामक पत्थर द्वारा चिह्नित किया जाता है। इस स्थान की महानता को स्थल-पुराण में देखा गया है। पवित्रशास्त्र के मुताबिक, इस मंदिर में जाने वाले तीर्थयात्रियों को अग्नि कुण्ड की राख को पवित्र मानते हैं और इसे अपने साथ ले जाते हैं। यह भी माना जाता है कि यह राख वैवाहिक जीवन को आनंद से भरता है।
६.--नरसिंह बद्री मंदिर
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एक हिन्दू मंदिर है जो भगवान विष्णु के चैथे अवतार नरसिंह को समर्पित है। यह मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में स्थित है। नरसिंह मंदिर जोशीमठ के सबसे लोकप्रिय मंदिरों में से एक है।
-------इस मंदिर को नरसिंह बद्री या नरसिम्हा बद्री भी कहा जाता है। नरसिंह मंदिर को जोशीमठ में नरसिंह देवता मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर को सप्त मंदिर की यात्रा में से एक है। भगवान नरसिंह को अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए एवं राक्षस हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए जाना जाता है ।
------- नरसिंह मंदिर में मुख्य मूर्ति जो आधा शेर और आधा आदमी के रूप में स्थिपित है, जो भगवान विष्णु के चैथे अवतार है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर के स्थापना आदि गुरू शंकरचार्य ने की थी। मंदिर में स्थापित भगवान नरसिंह की मूर्ति शालिग्राम के पत्थर से बनी है। इस मूर्ति का निमार्ण आठवी शताब्दी में कश्मीर के राजा ललितादत्य युक्का पीडा के शासनकाल के दौरान किया गया था।
------- ऐसा भी माना जाता है कि नरसिंह देवता की यह मूर्ति स्वंय भू है। छवि 10 इंच (25 सेमी) ऊंची है और कमल की स्थिति में बैठे भगवान को दर्शाती है।
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नरसिंह ब्रदी मंदिर की कथा भविष्य बद्री मंदिर की पौराणिक कथा से निकटता से जुड़ा हुआ है।
--------ऐसा माना जाता है कि मूर्ति की बायीं भुजा समय के साथ कम होती जा रही है और अंत में जब गायब हो जाएगी। बद्रीनाथ का मुख्य मंदिर व बद्रीनाथ धाम का रास्ता अवरुद्ध व दुर्गम हो जायेगा। तब भगवान बद्री, भविष्य बद्री मंदिर में भी दर्शन देगें। बद्रीनाथ मंदिर के बजाय भविष्य बद्री मंदिर पूजा की जाएगी।
--------जब सर्दियों में मुख्य बद्रीनाथ मंदिर बंद हो जाता है, तो बद्रीनाथ के पुजारी इस मंदिर में चले जाते हैं और यहां बद्रीनाथ की पूजा जारी रखते हैं। केंद्रीय नरसिम्हा मूर्ति के साथ, मंदिर में बद्रीनाथ की एक मूर्ति भी है।
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----क्रमश --शेष भाग आठ-----
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१. बद्री विशाल --बद्रीनाथ
२.आदि बद्री
३.भविष्य बद्री
४. वृद्ध बद्री
.५.ध्यान बद्री
६.योगध्यान बद्री
७. त्रियुगी नाथ मंदिर जहाँ शिव-पार्वती विवाह हुआ

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मेरी चारधाम यात्रा-----भाग छः -----बद्रीनाथ धाम---डा श्याम गुप्त

                               कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



मेरी चारधाम यात्रा-----भाग छः -----बद्रीनाथ धाम---
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आठवां दिन – २४-५-१८ प्रातः -- केदारनाथ से सीतापुर-गुप्तकाशी से पीपलकोटी ( चमोली जिला )
                                             ----------------------------------------------------------------
------- रास्ते में –नंदादेवी, माना पर्वत, द्रोणागिरी, कोमेट, नीलकंठ, हाथीपर्वत आदि के मनोहर दृश्य | यहाँ से बद्रीनाथ, औली, हेमकुंड साहिब, फूलों की घाटी, गोपेश्वर, चोप्ता का रास्ता जाता है |
----रात्रि विश्राम----पीपलकोटी—में -२४-५-१८....|
--------------
नवां दिन –२५ -५-१८ प्रातः पीपलकोटी से बद्रीनाथ से रूद्रप्रयाग ---रात्रि विश्राम २५-५-१८ रुद्रप्रयाग होटल में -------रास्ते में पञ्चप्रयाग होते हुए |
---------------------
हम लोग नाश्ता करके प्रातः जल्दी ही पीपलकोटी से चल पड़े और रास्ते में हनुमान चट्टी होते हुए बद्रीनाथ पहुंचे |
हनुमान चट्टी --
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             बद्रीनाथ जाने वाले मार्ग में पांडुकेश्वर से सात किलोमीटर की दूरी पर एवं बद्रीनाथ से पांच किलोमीटर पूर्व अलकनंदा के किनारे हनुमान चट्टी नामक सिद्धस्थली है, जो श्री हनुमान जी की तपःस्थली है।
-------- यहां मुख्य मार्ग पर ही उनका एक छोटा सा भव्य मंदिर है। बद्रीनाथ जाने से पूर्व यात्री यहां श्री हनुमान जी के दर्शन अवश्य करते हैं| इस स्थान का विशेष महत्व है, क्योंकि यह हनुमान जी की तपोभूमि मानी जाती है। इस मंदिर में हनुमान जी के वृद्ध रूप का दर्शन होता है |
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---------किवदंति है कि द्वापर युग में वनवास के दौरान बदरीनाथ क्षेत्र में द्रोपदी ने भीम को लक्ष्मी वन से कमल पुष्प ले आने का आग्रह किया तो अलकापुरी जाते समय भीम अलकनंदा नदी के किनारे से होकर लक्ष्मी वन पहुंचे। यहां रास्ते में हनुमान जी आराम कर रहे थे। उनकी पूंछ मार्ग को घेरे हुए थी।
--------भीम ने वानरराज को पहचाने बिना उन्हें पूंछ हटाने के लिए कहा, लेकिन वानरराज ने उन्हें स्वयं पूंछ हटाने के लिए कहा। भीम की लाख कोशिशों के बाद भी वह पूंछ हटाने में नाकाम रहे।
--------तब हनुमान ने अपना विराट रूप दिखाकर भीम का अहम चूर कर दिया था। तभी से यह स्थान हनुमान चट्टी के नाम से विख्यात है।
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हनुमान चट्टी समुद्र तल से 2400 मीटर की ऊंचाई पर हनुमान गंगा नदी और यमुना नदी के संगम बिंदु पर स्थित है।
------ पहले, यह जगह यहाँ से 13 किमी की दूरी पर स्थित लोकप्रिय हिंदू तीर्थ स्थल यमुनोत्री का आरम्भिक बिन्दु था। अब हनुमान चट्टी और जानकी चट्टी के बीच यात्रा योग्य सड़क बन गयी है। भक्त इस जगह से दवाएं और रेनकोट्स जैसी आवश्यक वस्तुएं खरीद सकते हैं। इसके अलावा, वे आवास की सुविधा का लाभ उठा सकते हैं क्योंकि यमुनोत्री की तुलना में यहां अधिक आवास विकल्प मौजूद हैं। यमुनोत्री से हनुमान चट्टी की दूरी 13 किलोमीटर है।
बद्रीनाथ ---
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बदरीनाथ मंदिर , जिसे बदरीनारायण मंदिर भी कहते हैं, नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ठ पर्वत का पार्श्व भाग है , यह अलकनंदा नदी के किनारे में स्थित है।
-------यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बदरीनाथ को समर्पित है। विशाल बद्री के नाम से प्रसिद्घ मुख्य बद्रीनाथ मन्दिर, पंच बद्रियों में से एक है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यही नर नारायण द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतरित हुए
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मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है।यहाँ पर शीत के कारण अलकनन्दा में स्नान करना अत्यन्त ही कठिन है। अलकनन्दा के तो दर्शन ही किये जाते हैं। यात्री तप्तकुण्ड में स्नान करते हैं।
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बदरीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे।
--------जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार-यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए।
-------- शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्तकुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।
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जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बदरीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना।
--------भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बदरीनाथ शिखर कि ऊँचाई 7,138 मीटर है। बदरीनाथ मंदिर में बदरीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।
------- यह मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप ।बद्रीनाथ जी के मंदिर के अन्दर 15 मुर्तिया स्थापित है | साथ ही साथ मंदिर के अन्दर भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा है |
-------इस मंदिर को “धरती का वैकुण्ठ” भी कहा जाता है | बद्रीनाथ मंदिर में वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है |

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यह स्थान पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित था। भगवान विष्णुजी अपने ध्यानयोग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भा गया। उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के समीप) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप बाल रूप में अवतरण किया और क्रंदन करने लगे। ----------उनका रुदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। फिर माता पार्वती और शिवजी स्वयं उस बालक के समीप उपस्थित हो गए। माता ने पूछा कि बालक तुम्हें क्या चहिये? तो बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया।
---------इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से यह स्थान अपने ध्यानयोग हेतु प्राप्त कर लिया। यही पवित्र स्थान आज बदरीविशाल के नाम से सर्वविदित है।
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जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं।
---------कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बदरी के नाथ-बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बदरीनाथ पड़ा।
--------- जहाँ भगवान बदरीनाथ ने तप किया था, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुण्ड के नाम से विश्व-विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।
------- बद्रीनाथ मंदिर की मान्यता यह भी है कि प्राचीन काल मे यह स्थान बेरो के पेड़ो से भरा हुआ करता था | इसलिए इस जगह का नाम बद्री वन पड़ गया
--------- एक मान्यता यह है कि बद्रीनाथ में भगवान शिव जी को ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली थी |
--------इस जगह के बारे में यह भी कहते है कि इस जगह पर भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी | नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण के रूप में जन्मे थे |
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कहागया कि कलियुग में जब इंसान धर्म-कर्म हीन हो जाएगा और उसके अंदर अभिमान समा जाएगा तब वो इंसानों के सामने साक्षात रुप में नहीं रह पायेंगे. ऐसी स्थिति में नारद शिला के नीचे अलकनंदा में समाई हुए उनकी एक मूर्ति के जरिए वो भक्तों को दर्शन देंगे |
------- उनकी बातें सुनकर देवताओं ने नारदकुंड से मूर्ति निकाल कर विश्वकर्मा से एक मंदिर में मूर्ति की स्थापना करा दी. इस मंदिर का नाम बदरीनाथ पड़ा और नारद को प्रधान अर्चक नियुक्त किया गया |
-------- तब यह भी प्रावधान रखा गया कि बदरीनाथ में नारायण की पूजा का अधिकार 6 महीने के लिए मनुष्यों को होगा और बाकी के छह महीने देवता पूजा अर्चना कर सकेंगे.
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-------ये पंच-बदरी में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
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अन्य स्थान –जिन्हें समयाभाव के कारण हम नहीं देख पाए ---
-----बदरीनाथ से नज़र आने वाला बर्फ़ से ढंका ऊँचा शिखर नीलकंठ
-------माणा गाँव- इसे भारत का अंतिम गाँव भी कहा जाता है।
-------वेद व्यास गुफा, गणेश गुफा: यहीं वेदों और उपनिषदों का लेखन कार्य हुआ था।
------भीम पुल :- भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है।
------वसु धारा :- यहाँ अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी। ये जगह माणा से ८ किलोमीटर दूर है। कहते हैं कि जिसके ऊपर इसकी बूंदे पड़ जाती हैं उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वो पापी नहीं होता है।
----लक्ष्मी वन :- यह वन लक्ष्मी माता के वन के नाम से प्रसिद्ध है।
----सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी) :- कहा जाता है कि इसी स्थान से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया था।
-------अलकापुरी :- अलकनंदा नदी का उद्गम स्थान। इसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है।
------सरस्वती नदी :- पूरे भारत में केवल माणा गाँव में ही यह नदी प्रकट रूप में है।
------उर्वशी मंदिर- भगवान विष्णु के तप से उनकी जंघा से एक अप्सरा उत्पन्न हुई जो उर्वशी नाम से विख्यात हुई। बदरीनाथ कस्बे के समीप ही बामणी गाँव में उनका मंदिर है।
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जब भी आप बदरीनाथ जी के दर्शन करें तो उस पर्वत (नारायण पर्वत) की चोटी की और देखेंगे तो पाएंगे की मंदिर के ऊपर पर्वत की चोटी शेषनाग के रूप में अवस्थित है। शेष नाग के प्राकृतिक फन स्पष्ट देखे जा सकते हैं।
क्रमश----शेष भाग सात ----आगे
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चित्र------
चित्र-३३-अ ब स --हनुमान चट्टी...हनुमान मंदिर
-------नीलकंठ पर्वत से निकलती हुई अलकनंदा के तट पर--
चित्र-३४- बद्रीनाथ दर्शन की पंक्ति में --
चित्र-३५- अ, ब - बद्रीनाथ मंदिर पर ...
चित्र-३६--नीलकंठ पर्वत की पृष्ठभूमि व नर नारायण पर्वतों के मध्य बद्रीनाथ धाम---नीलकन्ठ पर्वत
चित्र- ३७=बद्रीनाथजी –पद्मासन मुद्रा मे –चांदी की प्रतिमा –मंदिर के प्रांगण में
चित्र -३८–बद्रीनाथ मंदिर पर

बुधवार, 13 जून 2018

मेरी चारधाम यात्रा ---भाग पांच --- केदारनाथ ---डा श्याम गुप्त

                               कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

मेरी चारधाम यात्रा ---भाग पांच --- केदारनाथ ---
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--------उत्तरकाशी से सीतापुर-गुप्तकाशी------
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छटा दिन – २२-५-१८—प्रातः उत्तरकाशी से सीतापुर-गुप्तकाशी के लिए चल पड़े जहां होटल में रात्रि निवास किया गया | २२-५-१८ रात्रि----
\
-------तीन काशियाँ -----
प्रसिद्ध हैं भागीरथी के किनारे उत्तरकाशी , दूसरी गुप्तकाशी और तीसरी वाराणसी (उत्तरप्रदेश)।
-------------
गुप्तकाशी ----
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प्रसिद्ध तीर्थ धाम केदारनाथ को यातायात से जोड़ने वाले रुद्रप्रयाग –गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित एक कस्बा है। यह क्षेत्र, केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव भी है, साथ ही यहां कई खूबसूरत पर्यटक स्थल भी हैं| गुप्तकाशी रूद्रप्रयाग ज़िले का एक हिस्सा है और लगभग 1320 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
------- गुप्तकाशी का मार्ग रुद्रप्रयाग से मंदाकिनी नदी के किनारे किनारे है। कुल दूरी लगभग ३५ किमी है। जहाँ चढ़ाई आरंभ होती है वहाँ ==अगस्त्य मुनि ==नाम का स्थान है; वहाँ अगस्त्य का मंदिर है। मार्ग रमणीक है। सामने ही ==वाणासुर की राजधानी शोणितपुर=== के भगनावशेष हैं। चढ़ाई पूरी होने पर गुप्तकाशी पहुँचते हैं ।
-------गुप्तकाशी को ==गुह्यकाशी भी==कहते हैं। गुप्तकाशी में एक कुंड है जिसका नाम है मणिकर्णिका कुंड। लोग इसी में स्नान करते हैं। इसमें दो जलधाराएँ बराबर गिरती रहती हैं जो गंगा और यमुना नाम से अभिहित हैं।
----- कुंड के सामने ==विश्वनाथ का मंदिर== है। इससे मिला हुआ ==अर्धनारीश्वर का मंदिर== है यहाँ भगवान शिव आधे पुरुष और आधे महिला में रूप में है, जो शिव और पार्वती का एक रूप है।
----- इस मंदिर को पंचकेदार का भाग इसलिए माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडवो अपने पाप से मुक्ति चाहते थे इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवो को सलाह दी थी कि वे भगवान शंकर का आर्शीवाद प्राप्त करे।
------इसलिए पांडवो भगवान शंकर का आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए वाराणसी पहुंच गए परन्तु भगवान शंकर वाराणसी से चले गए और गुप्तकाशी में आकर छुप गए क्योकि भगवान शंकर पांडवों से नाराज थे पांडवो अपने कुल का नाश किया था। |
-------एक दिन गुप्तकाशी में भीम ने नंदी को पिछले पैरों और पूँछ से पकड़ लिया। लेकिन नंदी तुरंत अंतरध्यान या गुप्त हो गए। इस जगह का नाम गुप्तकाशी इसलिए पड़ा |
\
जब पांडवो गुप्तकाशी पंहुचे तो फिर भगवान शंकर केदारनाथ पहुँच गए जहां भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण कर रखा था।
------- गुप्तकाशी से भगवान शिव की तलाश करते हुए पांडव गौरीकुंड तक गए, नकुल और सहदेव को दूर एक सांड दिखाई दिया, भीम अपनी गदा से उस सांड को मारने दौडे,
------एक जगह सांड बर्फ में अपने सिर को घुसा देता है। भीम पूंछ पकड़कर खींचते हैं। लेकिन सांड अपने सिर का विस्तार करता है। सिर का विस्तार इतना बड़ा होता है कि वह नेपाल के पशुपति नाथ तक पहुंचता है। -------पुराण के अनुसार पशुपतिनाथ भी बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। देखते ही देखते वह सांड एक ज्योतिर्लिंग में बदल जाता है। फिर उससे भगवान शिव प्रकट होते हैं। भगवान शिव का साक्षात दर्शन करने के बाद पांडव अपने पापों से मुक्त होते हैं।
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ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां ==पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर== है। शिव की ==भुजाएं तुंगनाथ में,== ==मुख रुद्रनाथ में,==... ==नाभि मध्यमाहेश्वर=== में और ==जटा कल्पेश्वर में== प्रकट हुए।
---------इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है।
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गुप्तकाशी से बर्फ़ से ढका ==चौखम्बा पर्वत== बड़ा ही सुंदर लगता है। यह चार अलग अलग ऊंचाई की चोटियों वाला चौकोर शिखर वाला पर्वत है | यह हिमालय का वह भाग है जहाँ गंगोत्री ग्लेशियर है और जहाँ से मंदाकिनी का उद्गम होता है। चौखम्बा बद्रीनाथ के पश्चिम में स्थित है।

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सातवाँ दिन---- प्रातः २३-५-१८ – गुप्तकाशी---से केदारनाथ----
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---गुप्तकाशी में सीतापुर बस अड्डे तक अपने वाहन से पहुंचे ----जहां उसे छोड़ना पडा |
-------वहां से पैदल वासुकी गंगा के पुल के उस पार गौरीकुण्ड बस स्टेंड तक, जहां से टैक्सी से गौरीकुण्ड पहुंचे | यहीं से केदारनाथ ऊंचाई के लिए पैदल दुर्गम १४ किमी लम्बे ट्रेक की चढ़ाई होती है जो घोड़े, डांडी ,पिट्ठू या पैदल की जातीहै |
\
गौरीकुंड----
******************
१९८१ मी. ऊँचाई पर है। गौरीकुंड में वासुकी गंगा केदारनाथ से वासुकी ताल होते हुए मंदाकिनी में मिलती है| यहां गौरा माई – गौरी को समर्पित – का सुंदर एवं प्राचीन मंदिर देखने योग्य है। पावन मंदिरगर्भ में शिव और पार्वती की धात्विक प्रतिमाएं विराजमान हैं।
------यहां एक ==पार्वतीशिला==भी विद्यमान है जिसके बारे में माना जाता है कि पार्वती ने यहां बैठकर ध्यान लगाया था। केदारनाथ की पैदल यात्रा के दौरान यह स्थल यात्रियों के लिए आधार शिविर है।
--------यात्री केदारनाथ यात्रा के दौरान इस स्थान पर रूकते है गौरीकुंड में मंदाकिनी के दाहिने तट पर, गर्म पानी के दो सोते हैं| इस कुण्ड में स्नान कर यात्रा के लिए आगे बढ़ते है।
------- माता पार्वती ने भगवान शिव की पहली पत्नी सती का पुनः जन्म लिया था। इसलिए पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए इस स्थान पर तपस्या की थी। माना जाता है कि जब तक भगवान शिव ने उनका प्रेम स्वीकार नहीं किया, तब तक माता पार्वती इसी स्थान पर रहा करती थी। अतः में भगवान शिव ने माता पार्वती के प्रेम को स्वीकार किया।
-------माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह त्रियुगीनारायण स्थान पर हुआ था, जो गौरी कुण्ड से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
------- एक कथा के अनुसार माता पार्वती इस कुण्ड में स्नान करते हुए अपने शरीर के मैल से गणेश को बनाया था और प्रवेश द्वार पर खडा किया। जब भगवान शिव इस स्थान पर पहुंचे तो गणेश ने उन्हें रोक दिया था। इस पर भगवान शिव क्रोधित हो गये और गणेश का सिर काट दिया। माता पार्वती बहुत दुःखी और क्रोधित हो गई। माता पार्वती ने अपने बेटे गणेश का जीवित करने को कहा। भगवान शिव ने हाथी का सिर गणेश के शरीर पर लगा दिया था। इस प्रकार भगवान गणेश के जन्म और हाथी के सिर की कथा इस स्थान से जुड़ी हुई है।
\
हमें हेलीकोप्टर से ऊपर केदारनाथ मंदिर तक जाना था एवं तरंत उसी दिन नीचे वापस आना था परन्तु किसी कारणवश हेलीकोप्टर यात्रा रद्द कर दी गयी |
--------अतः हम लोग गौरीकुंड से टट्टुओं द्वारा शाम को केदारनाथ पहुंचे जहाँ लम्बी लाइन में लगकर केदारनाथ जी के दर्शन किये |
--------रात्रि के कारण अत्यंत ठण्ड थी ऊंचाई के कारण हवा में ऑक्सीजन की कमी से सुषमाजी की सांस भी फूलने लगी थी | आगरा धर्मशाला में रात्रि को विश्राम किया, पूरे विश्राम के बाद सभी स्वस्थ हुए और प्रोग्राम में एक दिन की देरी हुई |
\
यहाँ मेरी जन्मभूमि ने महत्वपूर्ण कार्य निभाया |
-----------------------------------------------------क्योंकि प्रोग्राम के अनुसार हमें केदारनाथ में रुकना नहीं था अतः कोइ रुकने का स्थान आरक्षित नहीं कराया गया था | दर्शन के पश्चात मंदिर के समीप ही आगरा धर्मशाला थी | वहां के पंडा जी को बताया गया की हम आगरा के हैं तो गाँव व तहसील पूछी गयी| मिढाकुर गाँव तहसील किरावली के नाम से पंडा जी ने तुरंत एक कमरा देदिया जिसमें ६-७ पलंग व पूरा फर्निश्ड था | सबने वहीं रात्रि विश्राम किया| पंडा जी ने गर्म गर्म खाना भी खिलाया | बाद में पंडा जी ने ११०० रु का संकल्प दान करवाया |
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केदारनाथ –
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----- गरुड़चट्टी----- यानि केदारनाथ यात्रा पथ का सबसे अंतिम एवं खूबसूरत पड़ाव है जहां से केदारनाथ धाम महज दो किमी की दूरी पर है। आपदा के बाद इस गरुड़चट्टी ने ही हजारों यात्रियों का जीवन बचाया था । आपदा के बाद नयी व्यवस्था होने से अब यह स्थान महत्वपूर्ण नहीं रहा, आज यहां जाने वाला पूछने वाला कोई नहीं है।
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केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में हिमालय की गोद में स्थित है | यह १२ ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ साथ चारधाम और पञ्चकेदार में से भी एक है |
-------इसका निर्माण परीक्षत पुत्र जन्मेजय ने कराया था | यह अति प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग है, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया उन्होंने ३२ वर्ष की आयु में यहीं श्री केदारनाथ धाम में समाधि ली थी।
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हिमालय के केदार श्रृंग पर विष्णु भगवान के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में यहाँ सदा वास करने का वर प्रदान किया।
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==चौरीबारी हिमनद के कुंड ==से निकलती ==मंदाकिनी नदी के समीप==, केदारनाथ पर्वत शिखर के पाद में निर्मित,यह
==विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर==
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(३,५६२ मीटर) की ऊँचाई पर अवस्थित है। इसे १००० वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं। मंदिर मंदाकिनी के घाट पर बना हुआ हैं भीतर घोर अन्धकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं।
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यहां केदारनाथ धाम में एक झील है जिसमें बर्फ तैरती रहती है इस झील के बारे में प्रचलित है इसी झील से== युधिष्ठिर स्वर्ग गये थे==। श्री केदारनाथ धाम से छह किलोमीटर की दूरी चौखम्बा पर्वत पर== वासुकी ताल== है यहां ==ब्रह्म कमल== काफी होते हैं तथा इस ताल का पानी काफी ठंडा होता है। सोन प्रयाग, त्रिजुगीनारायण, गुप्तकाशी, उखीमठ, अगस्तयमुनि, पंच केदार आदि दर्शनीय स्थल हैं।
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इतनी ऊँचाई पर इस मंदिर को कैसे बनाया गया, इस बारे में आज भी पूर्ण सत्य ज्ञात नहीं हैं।
-------सतयुग में शासन करने वाले राजा केदार के नाम प इस स्थान का नाम केदार पड़ा।
------राजा केदार ने सात महाद्वीपों पर शासन और वे एक बहुत पुण्यात्मा राजा थे।
------उनकी एक पुत्री थी वृंदा जो देवी लक्ष्मी की एक आंशिक अवतार थी| वृंदा ने ६०,००० वर्षों तक तपस्या की थी उसके नाम पर ही इस स्थान को
==वृंदावन== भी कहा जाता है।

मोदी और केदारनाथ--
=============================  भारत के वर्त्तमान एवं विश्वप्रसिद्ध प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदीजी ने, कहाजाता है कि अपने हिमालय प्रवास के समय यहाँ केदारनाथ धाम में दो वर्ष तपस्या की थी यहीं उन्हें संसार में जाकर कर्म करने कीआज्ञा/ अनुभूति प्राप्त हुई |
-------
क्रमश----शेष भाग छः ..आगे----
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चित्र- २६गुप्तकाशी-एक मनोरम दृश्य चौखम्बा पर्वत व घाटी में बहती हुई मंदाकिनी नदी
चित्र-२७- मंदाकिनी नदी स्नान करतेहुए लोग
चित्र-२८-गौरीकुंड टेक्सी के लिए इन्तजार –
चित्र-२८-Bकेदारनाथ के ट्रेक पर---
चित्र—२९-केदारनाथ मंदिर के लिए पंक्ति व स्वर्णिम केदार शिखर
चित्र-३०-केदारनाथ मंदिर के प्रांगण में--
चित्र-३१-केदार पर्वत की गोद में केदारनाथ मंदिर पर
चित्र-३२-केदारनाथ—वापसी
चित्र-३३,३४,३५ --केदारनाथ पर चढाने के बाद ओक्सीज़न की कमी से बेहाल सुषमाजी ---व अन्य लोग
चित्र-३६ --केदारनाथ में विशिष्ट स्थान की स्मृति में मोदीजी का पोस्टर ---















मंगलवार, 12 जून 2018

मेरी चारधाम यात्रा ---भाग चार----- डा श्याम गुप्त---

                             कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



मेरी चारधाम यात्रा ---भाग चार-----
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पांचवां दिन --- २१-५-१८ उत्तरकाशी से गंगोत्री से उत्तरकाशी--
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(१०० किमी, ऊन्चाई ३०४८ M-)-
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---२१-५-१८--- प्रातः तड़के ही होटल से पैक नाश्ता लेकर हम लोग गंगोत्री के लिए निकल लिए | रास्ते में गंगनानी में गरम पानी के कुंड हैं | हम सुन्दर मनोहारी हर्षिल घाटी होते हुए सीधे गंगोत्री की और बढ़ गए |
हरसिल घाटी ----
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------गंगोत्री मार्ग पर स्थित हरसिल घाटी आर्श्ययजनक व सम्मोहक है समुद्र तल से 7860 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। पूरी घाटी में नदी-नालों और जल प्रपातों की भरमार है। हर कहीं दूधिया जल धाराएं इस घाटी का मौन तोडने में डटी हैं। नदी झरनों के सौंदर्य के साथ-साथ इस घाटी के सघन देवदार के वन मनमोहक हैं। इसे हरिप्रयाग भी कहा जाता है|
\
******ऋग्वेद में प्रकृति के मनोरम दृश्यों एवं प्रार्थनाओं के मन्त्र रूप में जो सार्वकालीन सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ हैं वे शायद यहीं रचे गए होंगे ********
-----------ऋग्वेद में वैदिक कालीन एक प्रातः का वर्णन कितना सुन्दर व सजीव है ---
“विचेदुच्छंत्यश्विना उपासः प्र वां ब्रह्माणि कारवो भरन्ते |
उर्ध्व भानुं सविता देवो अश्रेद वृहदग्नयः समिधा जरन्ते ||”
----हे अश्वनी द्वय ! उषा द्वारा अन्धकार हटाने पर स्तोता आपकी प्रार्थना करते हैं (स्वाध्याय, व्यायाम, योग आदि स्वास्थ्य वर्धक कृत्य की दैनिक चर्या )| सूर्या देवता ऊर्ध गामी होते हुए तेजस्विता धारण कर रहे हैं | यज्ञ में समिधाओं द्वारा अग्नि प्रज्वलित हो रही है | ...
तथा –
“एषा शुभ्रा न तन्वो विदार्नोहर्वेयस्नातो दृश्ये नो अस्थातु
अथ द्वेषो बाधमाना तमो स्युषा दिवो दुहिता ज्योतिषागात |
एषा प्रतीचि दुहिता दिवोन्हन पोषेव प्रदानिणते अणतः
व्युणतन्तो दाशुषे वार्याणि पुनः ज्योतिर्युवति पूर्वः पाक: ||”
----प्राची दिशा में उषा इस प्रकार आकर खड़ी होगई है जैसे सद्यस्नाता हो | वह अपने आंगिक सौन्दर्य से अनभिज्ञ है तथा उस सौन्दर्य के दर्शन हमें कराना चाहती है | संसार के समस्त द्वेष-अहंकार को दूर करती हुई दिवस-पुत्री यह उषा प्रकाश साथ लाई है, नतमस्तक होकर कल्याणी रमणी के सदृश्य पूर्व दिशि-पुत्री उषा मनुष्यों के सम्मुख खडी है | धार्मिक प्रवृत्ति के पुरुषों को ऐश्वर्य देती है | दिन का प्रकाश इसने पुनः सम्पूर्ण विश्व में फैला दिया है |
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-------यह भागीरथी नदी के किनारे, जलनधारी गढ़ के संगम पर एक घाटी में अवस्थित है।
-------मातृ एवं कैलाश पर्वत के अलावा उसकी दाहिनी तरफ श्रीकंठ चोटी है, जिसके पीछे केदारनाथ तथा सबसे पीछे बदंरपूंछ आता है।
-------यह वन्य बस्ती अपने प्राकृतिक सौंदर्य एवं मीठे सेब के लिये मशहूर है। हर्षिल के आकर्षण में हवादार एवं छाया युक्त सड़क, लंबे कगार, ऊंचे पर्वत, कोलाहली भागीरथी, सेबों के बागान, झरनें, सुनहले तथा हरे चारागाह आदि शामिल हैं।
--------हरसिल की सुन्दरता को राम तेरी गंगा मैली फिल्म में भी दिखाया जा चुका है। यहीं के एक झरने में फिल्म की नायिका मंदाकिनी को नहाते हुए दिखाया गया है।

गंगोत्री ----
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----गंगा नदी ( भागीरथी ) का उद्गम स्थान है। यह स्थान उत्तरकाशी से 100 किमी की दूरी पर स्थित है।
------भगवान श्री रामचंद्र के पूर्वज रघुकुल के चक्रवर्ती राजा भगीरथ ने यहां एक पवित्र शिलाखंड पर बैठकर भगवान शंकर की प्रचंड तपस्या की थी।
------देवी भागीरथी ने इसी स्थान पर धरती का स्पर्श किया। पांडवो ने भी महाभारत के युद्ध में मारे गये अपने परिजनो की आत्मिक शांति के निमित इसी स्थान पर आकर एक महान देव यज्ञ का अनुष्ठान
किया था।
------ शिवलिंग के रूप में एक नैसर्गिक चट्टान भागीरथी नदी में जलमग्न है। पौराणिक आख्यानो के अनुसार, भगवान शिव इस स्थान पर अपनी जटाओं को फैला कर बैठ गए और उन्होने गंगा माता को अपनी घुंघराली जटाओ में लपेट लिया। शीतकाल के आरंभ में जब गंगा का स्तर काफी अधिक नीचे चला जाता है तब उस अवसर पर ही उक्त पवित्र शिवलिंग के दर्शन होते है।
--------भागीरथी, घाटी के बाहर निकलकर केदारगंगा तथा भागीरथी के कोलाहल को छोड़कर जड़ गंगा से मिल जाती है, इस सुंदर घाटी के अंत में गंगा जी का मंदिर है।
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गंगाजी का मंदिर, ----
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समुद्र तल से 3042 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। भागीरथी के दाहिने ओर का परिवेश अत्यंत आकर्षक एवं मनोहारी है। पवित्र एवं उत्कृष्ठ मंदिर सफेद ग्रेनाइट के चमकदार 20 फीट ऊंचे पत्थरों से निर्मित है। दर्शक मंदिर की भव्यता एवं शुचिता देखकर सम्मोहित हुए बिना नही रहते।
--------मंदिर में लम्बी लाइन को पार करके गंगा माँ के दर्शन किये व प्रसाद लेकर फोटो आदि खींचे एवं एक वर्तन में गंगाजल लेकर तथा कुछ बाज़ार करने के बाद हम लोग वापस उत्तरकाशी के होटल में रात्रि २१-५-१८ विश्राम हेतु लौट गए |
गौमुख----
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गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर 3,892 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गौमुख गंगोत्री ग्लेशियर का मुहाना तथा भागीरथी नदी का उद्गम स्थल है। गंगोत्री से यहां तक की दूरी पैदल या फिर ट्ट्टुओं पर सवार होकर पूरी की जाती है।
भैरों घाटी -----
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--- गंगोत्री से 9 किलोमीटर पर स्थित भैरों घाटी जड़ गंगा, जाह्नवी गंगा तथा भागीरथी के संगम पर स्थित है।
-------1985 से पहले जब जड़ गंगा पर संसार के सर्वोच्च झूला पुल सहित गंगोत्री तक मोटर गाड़ियों के लिये सड़क का निर्माण नहीं हुआ था, तीर्थयात्री लंका से भैरों घाटी तक घने देवदारों के बीच पैदल आते थे और फिर गंगोत्री जाते थे।
-------भैरों घाटी हिमालय का एक मनोरम दर्शन कराता है, जहां से आप भृगु पर्वत श्रृंखला, सुदर्शन, मातृ तथा चीड़वासा चोटियों के दर्शन कर सकते हैं।
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(----इस जड़गंगा के झूलापुल पर एक बार मेरी पोस्टिंग हुई थी, रेलवे ने यह पुल बनवाया था और हिमपात होने के कारण इंजी.सामान छूट गया था | गर्मियों में हिम पिघलने पर किसी ने शैतानी पूर्ण कृत्य द्वारा मेरी पोस्टिंग वहां करादी | परन्तु हमने एक फार्मासिस्ट को फर्स्ट एड की पोस्ट सहित वहां पोस्ट करा दिया था स्टाफ के लिए जो बचा हुआ सामान वापस लाने हेतु भेजा गया था | )
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नंदनवन तपोवन---
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गंगोत्री से 25 किलोमीटर दूर गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपर एक कठिन ट्रेक नंदनवन ले जाती है । यहां से शिवलिंग चोटी का मनोरम दृश्य दिखता है। गंगोत्री नदी के मुहाने के पार तपोवन है जो अपने सुंदर यहां चारगाह के लिये मशहूर है तथा शिवलिंग चोटी के चारों तरफ फैला है।
भोजबासा----
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गंगोत्री से 14 किलोमीटर दूर है। यह जड़ गंगा तथा भागीरथी नदी के संगम पर है।
------ भोजपत्र पेड़ों की अधिकता के कारण इसे भोजबासा का नाम मिला | गौमुख जाते हुए इसका उपयोग पड़ाव की तरह होता है। रास्ते में आप किंवदन्त धार्मिक फूल ===ब्रह्मकमल देख सकते है जो ब्रह्मा का आसन है।====
केदारताल----
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गंगोत्री से 14 किलोमीटर दूर यह मनोरम झील समुद्र तल से 15,000 फीट ऊंचाई पर है | केदार ग्लेशियर के पिघलते बर्फ से बनी यह झील भागीरथी की सहायक केदारगंगा का उद्गम स्थल है, जिसे भगवान शिव द्वारा भागीदारी को दान मानते हैं।
-------समीप ही केदार खंड से सटा है मार्कण्डेयपुरी जहां मार्कण्डेय मुनि के तप किया तथा उन्हें भगवान विष्णु द्वारा सृष्टि के विनाश का दर्शन कराया गया। इसी प्रकार से मातंग ऋषि ने वर्षों तक बिना कुछ खाये-पीये यहां तप किया।
गंगा---
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---गंगोत्री में भागीरथी-गौमुख ग्लेशियर से...---केदारनाथ में मंदाकिनी -शतपथ ग्लेशियर व बद्रीनाथ में अलकनंदा भागीरथ खड़क ग्लेशियर से --- उत्तरकाशी स्थित पंचप्रयागों में अंतिम प्रयाग देवप्रयाग में अलकनंदा व भागीरथी के संगम के उपरांत ही इसे गंगा का नाम मिलता है |
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ऋगवेद में गंगा का वर्णन कहीं-कहीं ही मिलता है पर पुराणों में गंगा से संबंधित कहानियां वर्णित हैं| कहा जाता है कि एक प्रफुल्लित सुंदरी युवती का जन्म ब्रह्मदेव के कमंडल से हुआ। इस खास जन्म के बारे में दो विचार हैं।
----- एक की मान्यता है कि वामन रूप में राक्षस बलि से संसार को मुक्त कराने के बाद ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु का चरण धोया और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया।
------ दूसरे का संबंध भगवान शिव से है जिन्होंने संगीत के दुरूपयोग से पीड़ित राग-रागिनी का उद्धार किया। जब भगवान शिव ने नारद मुनि ब्रह्मदेव तथा भगवान विष्णु के समक्ष गाना गाया तो इस संगीत के प्रभाव से भगवान विष्णु का पसीना बहकर निकलने लगा जो ब्रह्मा ने उसे अपने कमंडल में भर लिया। इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ और वह ब्रह्मा के संरक्षण में स्वर्ग में रहने लगी।

क्रमश-----शेष भाग पांच----आगे ------
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चित्र-हर्षिल घाटी----५ ..भागीरथी , झरने , हर्षिल घाटी ,पर्वतीय नदी, उषा व सूर्योदय बाराकोट ...
चित्र-१९-गंगोत्री की राह पर दूर से गौमुख
चित्र-२०-गंगोत्री मंदिर की राह पर
चित्र- २१-भागीरथ शिला व गंगा निकालने का स्थान ---
चित्र- २२-भागीरथी के किनारे –गंगोत्री पर
चित्र- २३-गंगोत्री मंदिर से गंगा का उद्गम गौमुख ग्लेशियर ..
चित्र—२४-गंगा जी का मुख्य-मंदिर प्रांगण में ...गंगोत्री
चित्र- २५-गौमुख ग्लेशियर गंगा का उद्गम ---













क्रमश ----भाग पांच ..आगे----