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गुरुवार, 4 नवंबर 2010

शुभ दीपावली ...डा श्याम गुप्त....

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


शुभ दीपावली......डा श्याम गुप्त ....












मुस्कुराओ जलाकर दीये ।
सामने हम खड़े हों जैसे।

डा श्याम गुप्त की गज़ल......दीप खुशियों के....

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल.....

दीप खुशियों के जलें एसे ।
पुष्प दामन में खिलें जैसे।

खूब रोशनी हो जीवन में,
सफलताएं सब मिलें जैसे।

आशा और उत्साह से पूरित ,
जीवन राह में चलें जैसे।

उमंगें व उल्लास के पौधे,
उर्वरा भूमि में फलें जैसे।

मुस्कुराइए जला कर दीये,
हम सामने हों खड़े जैसे।

खुश होलेना कि तरन्नुम में,
श्याम की ग़ज़ल सुनलें जैसे ॥

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

करवा चौथ -- अर्थशास्त्र और बाज़ार----डा श्याम गुप्त...

करवा चौथ --हमारे पर्व , अर्थशास्त्र और बाज़ार---

उत्सव प्रियः मानवाः --वास्तव में तो सभी भारतीय पर्व, उत्सव , आदि प्राचीन भारतीय समाज के -मनोरंजन केसाथ अर्थशास्त्र - के सैद्दांतिक -व्यवहारिक कृतित्व हैं जो बाज़ार व अर्थशास्त्र की आवश्यकताओं के अनुसार विस्तार भी पाते रहते हैं। । अब करवाचौथ को लीजिये । वास्तव में तो कर्म कांडी व्रतों का वैदिक साहित्य में वर्णन नहीं है , ब्रतों का अर्थ संकल्प होता है और करवा चौथ पर पति-पत्नी दोनों को ही संकल्प लेना होता है कि हम सदा तादाम्य सेरहेंगे, एक दूसरे के प्रति सम्पूर्ण भाव से समर्पित रहेंगे , पाणि ग्रहण के समय लिए हुए बचनों का पालन करेंगे।
------कालान्तर में अर्थशास्त्र बाज़ार की आवश्यकतानुसार( समय परवर्तन ,युग के अनुसार निष्ठा ज्ञान ,कर्तव्य मानवीय विश्वास की कमी से भी ) उसमें करवा, चन्द्रमा, पति की आयु वृद्धि, अर्ध्य , उपवास आदि के भाव जोड़ दिए गए। सामाजिक -पारिवारिक सौहार्द के पहलू हित -सरगी , सास के लिए बायना, बधू से मायके से बधू के घर उपहार आदि भेजना प्रारम्भ किया गया ; जो बाद में कठोर कुप्रथाओं में परिवर्तित होता गया । पहले मिट्टी का करवा अनिवार्य होता था ताकि कुम्भ्कारों का भी काम चलता रहे , और प्रगति होने पर शक्कर - चीनी के, धातु के , चांदी के करवे व अन्य ताम-झाम भी चलने लगे ताकि बाज़ार का अर्थशास्त्र चलता रहे ,हाँ, पीछे दिखावा, अधिक प्राप्ति आदि की मानसिकता भी बढ़ती गयी।
आजकलके वैज्ञानिक युग में भी - समाचार पत्रों, टीवी, आदि में करवा चौथ पर सोना -चांदी के व अन्य सभी के विज्ञापनों , छूट, कैसे करें , क्या पहने, कैसे पूजा करें , किसको किस किस बस्तु से पूजा रानी चाहिए , अपने उन को खुश रखिये आदि की भरमार रहती है क्यों -जबकि वैज्ञानिक युग के नव-युवा,पढेलिखे पुरुष/ महिलाएं इसे आवश्यक/अपरिहार्य नहीं मानते समझते अपितु व्यर्थ की खानापूरी भी मानते हैं |---यह अर्थशास्त्र बाज़ार के ही लिए तो -चाहे स्त्रियों पर कठोरता होती हो या सामाजिक -मानसिक प्रतारणा मानवीय शोषण |
-----हाँ इसके साथ साथ चाहे बाज़ार -भाव के कारण ही सही --पुरुषों के लिए भी विज्ञापन आरहे हैं ----
पत्नी करवा चौथ व्रत रख रही है आपकी लम्बी आयु के लिए अब आपकी बारी है --उपहार देने की ---और यह एक अच्छी बात है।

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

डा श्याम गुप्त की गज़ल.....

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल....

होशियार रहना....

इस शहर् में आगये होशियार रहना।
यह शहर है यार कुछ होशियार रहना।

इस शहर में घूमते हैं हर तरफ ही,
मौत के साए ज़रा होशियार रहना।

घूमते हैं खट-खटाते अर्गलायें,
खोलना मत द्वार बस होशियार रहना ।

एक दर्ज़न श्वान थे और चार चौकीदार,
होगया है क़त्ल यूं होशियार रहना।

अब न बागों में चहल कदमी को जाना,
होरहा व्यभिचार सब होशियार रहना।

सज-संवर के अब न जाना साथ उनके,
खींच लेते हार , तुम होशियार रहना।

चोर की करने शिकायत आप थाने जारहे,
पीचुके सब चाय अब होशियार रहना।

क्षत-विक्षत जो लाश चौराहे पर मिली,
काम आदमखोर सा ,होशियार रहना।

वह नहीं था बाघ आदमखोर यारो,
आदमी था 'श्याम ,सब होशियार रहना॥

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

कुछ कतए ---डा श्याम गुप्त

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित-----


             कुछ कतऐ
पहले खुद को तो, खुदी में निहारो यारो।
सूरते दिल को, आईने में उतारो यारो।
फिर ये कहना मेरे अशआर नहीं हैं काबिल -
अपनी ग़ज़लों के तो पुर अक्स संवारो यारो।

मैं जो कहता हूँ सरे आम कहा करता हूँ।
मैं तो हर आम को भी ख़ास कहा करता हूँ।
हिन्दी औ हिंद पै न आये आंच कोई--
खुद से ये वादा सरे शाम किया करता हूँ।

इंकलाबी हूँ ,इन्कलाब है कलाम मेरा।
ये कलम कहती है सबको ही सलाम मेरा।
मेरे नगमे रहें देश पै भाषा पै कुर्बां --
खुद से ये वादा करता है कलाम मेरा।

हिन्दी साहित्य हो नित नित उन्नत यारो।
दिली इच्छा है यही मेरी तो सदा यारो।
नित नए प्रयोग इसीलिये किया करता हूँ--
समाज के सरोकारों से पर नहीं हटता यारो॥ 

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

डा श्याम गुप्त की कविता.....गांव की गोरी

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


 


डा श्याम गुप्त की कविता....गांव की गोरी.... .

गाँव की गोरी,
लम्बी लम्बी छोरी ।
इमली के तले
काली न गोरी।

'पतिया की जात' में
झूमते गुब्बारे।
मिट्टी की गाड़ी
गड़ गड़ गड़ पुकारे।

इमली के कतारे
और आँख मिचोली।
सरसों के खेत की
वो अठखेली ।

नील कंठ की दांई
और श्यामा की बाँई -
लेने को दौड़ना
खंदक हो या खाई।

गूंजती अमराइयां
नहर के किनारे।
सावन के गीत और
वर्षा की फुहारें ।

झमाझम बरसात में
जी भर नहाती।
खेतों की मेड़ों पर
झूम झूम गाती ।

सावन में जब कभी
कोकिल कहीं बोली।
बहुत याद आती हो
प्यारी हमजोली

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

श्यामांगिनि ! तेरा मुखर लास--डा श्याम गुप्त का गीत----

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित---


श्यामांगिनि ! तेरा मुखर लास--डा श्याम गुप्त का गीत----

कामिनि! तेरा वह मृदुल हास |
श्यामांगिनि ! तेरा मुखर लास |

जाने कितने उपमा रूपक ,
सज जाते बनकर सृष्टि-साज |
हृद तंत्री में अगणित असंख्य ,
बस जाते मधुमय मदिर राग |
मन के उपवन में छाजाता,
सुरभित अनुपम मधुरिम पराग |

वह मुकुलित कुसुमित सा सुहास ,
कामिनी तेरा वह मृदुल हास ||

वह शुभ्र चपल स्मिति तरंग ,
नयनों में घोले विविध रंग |
तन मन को रंग जाते बनकर,
अगणित बसंत रस रंग फाग |
आँखों में सजते इन्द्र-धनुष ,
बनकर चाहत के प्रिय-प्रवास |

रूपसि ! वह मुखरित विमल लास |
कामिनि ! तेरा वह मृदुल हास ||

मद्दम -मद्दम वह मधुरिम स्वर ,
वह मौन मुखरता की प्रतिध्वनि |
आता ऋतुराज स्वयं लेकर ,
कलियों का आमंत्रण सहास |
अणु अणु में छाजाती असीम,
नव तन्मयता उल्लास-लास |

श्यामांगिनि ! तेरा मृदुल हास |
कामिनि ! तेरा वह मुखर लास ||

----महिलाएं-वर्चस्व की सन्स्क्रति व महिलाएं-

’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '......

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति के सेमीनार -'वर्चस्व की संस्कृति और महिलायें ' में मैत्रेयी पुष्पा , मधु गर्ग आदि स्वघोषित तथाकथित महान महिलाओं द्वारा कुछ अविचारशील बातें कही गयी |
.’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '. हर साल नवीनीकरण कराना पड़ता है |---
-----क्या मैत्रेयी समझती हैं कि करवा चौथ व्रत वफादारी के लिए रखा जाता है ? वह तो सिर्फ पति की लम्बी आयु के लिए होता है, ताकि पत्नी सदा सुहागिन रहे और पति की पहले मृत्यु होजाने पर वे तमाम सुखों से बंचित न हों । जिन्हें उस व्रत के उद्देश्य का ही ज्ञान नहीं उसके बारे में उनके कथन का क्या महत्त्व ? फिर क्या मैत्रेयी बताएंगी कि करवा चौथ व्रत रखने से वफादारी कैसे सिद्ध होगी, क्या करवा चौथ व्रत रखकर भी स्त्री / पत्नी वेवफा रहे तो किसी को क्या पता चलेगा , कोई क्या कर लेगा, होता भी है एसा ।

. लड़कियां घरों से बाहर निकलकर भी पुरुषों के बीच बंधी हुई हैं , चिड़िया की तरह आज़ाद नहीं । ----
--------क्या ये महान महिलायें चाहती हैं कि महिलायें सिर्फ महिलाओं से बंधकर , उनके साथ ही कार्य करें , कार्य स्थलों से पुरुषों को हटा दिया जाय , सिर्फ महिलाएं ही रहें ; या घरों से भी पुरुषों को हटा दिया जाय , महिला-राज्य, महिला देश स्थापित किया जाय ?----क्या ये देख कर आयी हैं कि चिड़ियाँ -चिरौटों के बिना रहतीं हैं , आकाश में अकेली उड़ती हैं | कैसे कैसे मूर्खतापूर्ण विचार -कथन एसे लोगों के दिमाग में आते हैं । भाई --अगर गाडी चलानी है तो एक पहिये से कैसे चलेगी , सोचें -विचारें , तब कहें । " अति सर्वत्र वर्ज्ययेत । "
----इतिहास में स्त्री देश का भी ज़िक्र है जहां के अत्याचार एक राजकुमार ने ही जाकर बंद कराये थे | गुरु मत्स्येन्द्र नाथ को भी स्त्री देश से गुरु गोरखनाथ ने आज़ाद कराया था ।
----यदि स्त्री को अपना अलग संसार ही रखना है जहां सब कुछ स्त्रियों का ही हो तो फिर वही भारतीय परम्परा क्या बुरी है जहां महिलायें --महिलाओं में ही उठती बैठती हैं , महिलाओं से ही दोस्ती , नाच-गान , अपना अलग संसार होता है जहां पुरुषों , पुरुष-मित्रों-दोस्तों आदि का कोई दखल-मतलब नहीं होता ।
३- वर्चस्व की संस्कृति-----आखिर वर्चस्व की बात ही क्यों हो , किसी का भी वर्चस्व क्यों हो , युक्ति-युक्त पूर्ण तथ्यों की बात क्यों न हो , नकिसी का वर्चस्व न, किसी का अधिकार हनन अन्यथा फिर पुरुषों द्वारा वर्चस्व हनन की बात उठेगी |
------- एसे व्यर्थ के अतिवादी , अविचारशील, अवैज्ञानिक कथनों व कृत्यों से ही कोई भी अच्छा भाव/ विचार / कार्य आकार लेने से पहले ही विनष्ट होजाता है | इनसे महिलाओं व समाज की हानि हो रही है ।
-----बस्तुतः यह कोई स्त्री-पुरुष का झगड़ा नहीं है अपितु अच्छे -बुरे मानव , मानवीयता , आचरण -शुचिता , चरित्र के अवनति की बात है जिसकी हर जगह बात होनी चाहिए ।
कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '......

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित----

’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '......

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति के सेमीनार -'वर्चस्व की संस्कृति और महिलायें ' में मैत्रेयी पुष्पा , मधु गर्ग आदि स्वघोषित तथाकथित महान महिलाओं द्वारा कुछ अविचारशील बातें कही गयी |
.’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '. हर साल नवीनीकरण कराना पड़ता है |---
-----क्या मैत्रेयी समझती हैं कि करवा चौथ व्रत वफादारी के लिए रखा जाता है ? वह तो सिर्फ पति की लम्बी आयु के लिए होता है, ताकि पत्नी सदा सुहागिन रहे और पति की पहले मृत्यु होजाने पर वे तमाम सुखों से बंचित न हों । जिन्हें उस व्रत के उद्देश्य का ही ज्ञान नहीं उसके बारे में उनके कथन का क्या महत्त्व ? फिर क्या मैत्रेयी बताएंगी कि करवा चौथ व्रत रखने से वफादारी कैसे सिद्ध होगी, क्या करवा चौथ व्रत रखकर भी स्त्री / पत्नी वेवफा रहे तो किसी को क्या पता चलेगा , कोई क्या कर लेगा, होता भी है एसा ।

. लड़कियां घरों से बाहर निकलकर भी पुरुषों के बीच बंधी हुई हैं , चिड़िया की तरह आज़ाद नहीं । ----
--------क्या ये महान महिलायें चाहती हैं कि महिलायें सिर्फ महिलाओं से बंधकर , उनके साथ ही कार्य करें , कार्य स्थलों से पुरुषों को हटा दिया जाय , सिर्फ महिलाएं ही रहें ; या घरों से भी पुरुषों को हटा दिया जाय , महिला-राज्य, महिला देश स्थापित किया जाय ?----क्या ये देख कर आयी हैं कि चिड़ियाँ -चिरौटों के बिना रहतीं हैं , आकाश में अकेली उड़ती हैं | कैसे कैसे मूर्खतापूर्ण विचार -कथन एसे लोगों के दिमाग में आते हैं । भाई --अगर गाडी चलानी है तो एक पहिये से कैसे चलेगी , सोचें -विचारें , तब कहें । " अति सर्वत्र वर्ज्ययेत । "
----इतिहास में स्त्री देश का भी ज़िक्र है जहां के अत्याचार एक राजकुमार ने ही जाकर बंद कराये थे | गुरु मत्स्येन्द्र नाथ को भी स्त्री देश से गुरु गोरखनाथ ने आज़ाद कराया था ।
----यदि स्त्री को अपना अलग संसार ही रखना है जहां सब कुछ स्त्रियों का ही हो तो फिर वही भारतीय परम्परा क्या बुरी है जहां महिलायें --महिलाओं में ही उठती बैठती हैं , महिलाओं से ही दोस्ती , नाच-गान , अपना अलग संसार होता है जहां पुरुषों , पुरुष-मित्रों-दोस्तों आदि का कोई दखल-मतलब नहीं होता ।
३- वर्चस्व की संस्कृति-----आखिर वर्चस्व की बात ही क्यों हो , किसी का भी वर्चस्व क्यों हो , युक्ति-युक्त पूर्ण तथ्यों की बात क्यों न हो , नकिसी का वर्चस्व न, किसी का अधिकार हनन अन्यथा फिर पुरुषों द्वारा वर्चस्व हनन की बात उठेगी |
------- एसे व्यर्थ के अतिवादी , अविचारशील, अवैज्ञानिक कथनों व कृत्यों से ही कोई भी अच्छा भाव/ विचार / कार्य आकार लेने से पहले ही विनष्ट होजाता है | इनसे महिलाओं व समाज की हानि हो रही है ।
-----बस्तुतः यह कोई स्त्री-पुरुष का झगड़ा नहीं है अपितु अच्छे -बुरे मानव , मानवीयता , आचरण -शुचिता , चरित्र के अवनति की बात है जिसकी हर जगह बात होनी चाहिए ।

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

खेल के खेल ... डा श्याम गुप्त



सभी राष्ट्रीय,राष्ट्रमंडल ,अन्तर्राष्ट्रीय व व्यवसायिक संस्थानों में खेल आयोजन बंद होने चाहिए.....डा श्याम गुप्त---
----- वस्तुतः खेल हम क्यों खेलते हैं , मूलतः शारीरिक क्षमता वाले ---व्यायाम, स्वास्थ्य के लिए ; व मानसिक खेल मानसिक क्षमता के लिए , न कि प्रतियोगिता के लिए , कमाई के लिए, देश का नाम ऊंचा करने के लिए ( खेल से देश का क्या नाम ऊंचा होता है? अधिकतर तो बदनाम ही होता है; नाम ऊंचा तो प्रगति कारक कृतियों , वैज्ञानिक, सामाजिक उपलब्धियों से होता है |) खेल आदि सिर्फ स्कूल- कालेज स्तर पर होकर वहीं समाप्त होजाने चाहिए |आगे जीवन में खेलों का क्या काम ? सभी व्यवसायिक संस्थानों आदि में खेल कोटा - नौकरी , भव्य खेल आयोजनों को बंद करा देना चाहिए |
---- इतिहास गवाह है जब भी खेल, मनोरंजन आदि को व्यवसायिक-भाव, प्रतियोगिता-भाव, कमाई, धंधा से देखा गया , राष्ट्र व समाज-संस्कृति का विनाश ही हुआ है |हमारे शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि मनोरंजन व्यवसाय नहीं बनना चाहिए |( खेल गाँव में दिन में ६००० कंडोम समाप्त होगये ....क्यों , खेलने आते हैं या कंडोम प्रयोग करने , कौन करता है , क्यों ,किस पर, किस प्रयोजन के लिए , खिलाड़ियों व अधिकारियों के एस्कोर्ट के लिए लड़कियां ही क्यों ...पुरुष क्यों नहीं ????)|
रोम के विनाश में ओलम्पिक आदि खेलों का महत्वपूर्ण योगदान था, अति-खेल प्रियता, प्रतियोगिता -व्यर्थ की अप-संस्कृति, भ्रष्टाचार, भ्रष्ट -आचरण ,राजनीतीकरण , राजनैतिक अपराधीकरण व व्यक्तिगत -सामाजिक कुटिलता को जन्म देती है | 'जब रोम जलरहा था तो नीरो बांसुरी बजारहा था '- -कूट वाक्य का अर्थ यही है कि स्वयम शासक व जनता, अधिकारी सभी मनो-विनोद , आमोद-प्रमोद में , खेल-कूद आदि में मगन थे; शासकीय , सामाजिक , नैतिक कार्यों से विमुख होगये थे | कितने आपराधिक -कार्य , कहानियां , कथाएं व जघन्य क्रिया -कलाप जुड़े हैं रोमन-खेलों से किसी से छिपा नहीं है | और आज भी |
-----हमारे यहाँ गाँवों , कस्बों में सदा से ही ये खेल -कूद आदि होते रहे हैं परन्तु सिर्फ मेलों -सामाजिक उत्सवों आदि में जब सभी इनमें सहज रूप से भाग लेते हैं , कहीं कोई धंधे -पैसे की बात नहीं | अलग से व्यवसाय बनाकर कमाई का जरिया नहीं | सभी वर्ष भर अपने सामान्य दैनिक कार्य में व्यस्त रहते हैं न कि झूठे विज्ञापन आदि की भ्रष्ट कमाई में , जो देश की अर्थ व्यवस्था के समान्तर एक अर्थ व्यवस्था पैदा करती है, और सामाजिक असंतुलन |
 

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल.....तटबन्ध होना चाहिये----

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित----------

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल....

साहित्य सत्यम शिवम् सुन्दर भाव होना चाहिए|
साहित्य शुचि शुभ ज्ञान पारावार होना चाहिए।

समाचारों के लिए अखबार छपते तो हैं रोज़ ,
साहित्य तो सरोकार-समाधान होना चाहिए ।

आज हम उतरे हैं इस सागर में यह कहने कि हाँ ,
साहित्य, सागर है तो सागर-भाव होना चाहिए।

डूब कर उतरा सके जन जन व मन मानस जहां ,
भाव सार्थक, अर्थ भी संपुष्ट होना चाहिए।

क्लिष्ट शब्दों से सजी, दूरस्थ भाव न अर्थ हों ,
कूट भाव न हों,सुलभ संप्रेष्य होना चाहिए।

चित्त भी हर्षित रहे, नव प्रगति भाव यथा रहें ,
कला सौन्दर्य भी सुरुचि, शुचि, सुष्ठु होना चाहिए।

ललित भाषा, ललित कथ्य,न सत्य तथ्य परे रहे ,
व्याकरण शुचि शुद्ध सौख्य-समर्थ होना चाहिए।

श्याम, मतलब सिर्फ होना शुद्धतावादी नहीं ,
बहती दरिया रहे पर तटबंध होना चाहिए॥

बुधवार, 22 सितंबर 2010

डा श्याम गुप्त की गज़ल....टूटते आईने सा...

टूटते आईने सा हर व्यक्ति यहां क्यों है।
हैरान सी नज़रों के ये अक्स यहां क्यों है।

दौडता नज़र आये इन्सान यहां हर दम,
इक ज़द्दो ज़हद में इन्सान यहां क्यों है ।

वो हंसते हुए गुलशन चेहरे किधर गये,
हर चेहरे पै खौफ़ का यह नक्श यहां क्यों है।

गुलज़ार रहते थे गली बाग चौराहे,
वीराना सा आज हर वक्त यहां क्यों है ।

तुलसी सूर गालिव की सरज़मीं पै ’श्याम,
आतंक की फ़सल सरसब्ज़ यहां क्यों है॥

बुधवार, 15 सितंबर 2010

डा श्याम गुप्त के पद....राधा अष्टमी पर ....

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

राधाष्टमी पर विशेष ---डा श्याम गुप्त के पद.......

-
जनम लियो वृषभानु लली
आदि -शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली
जलज-चक्र,रवि तनया विलसति,सुलसति लसति भली
पंकज दल सम खिलि-खिलि सोहै, कुसुमित कुञ्ज लली
पलकन पुट-पट मुंदे 'श्याम' लखि मैया नेह छली
विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली
नित-नित चन्द्रकला सम बाढ़े, कोमल अंग ढली
बरसाने की लाड़-लडैती, लाडन -लाड़ पली ।।

--
कन्हैया उझकि-उझकि निरखै
स्वर्ण खचित पलना,चित चितवत,केहि विधि प्रिय दरसै
जंह पौढ़ी वृषभानु लली , प्रभु दरसन कौं तरसै
पलक -पाँवरे मुंदे सखी के , नैन -कमल थरकैं
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों ,फर फर फर फरकै
तीन लोक दरसन को तरसे, सो दरसन तरसै
ये तो नैना बंद किये क्यों , कान्हा बैननि परखै
अचरज एक भयो ताही छिन , बरसानौ सरसै
खोली दिए दृग , भानु-लली , मिलि नैन -नैन हरसें
दृष्टि हीन माया ,लखि दृष्टा , दृष्टि खोलि निरखै
बिनु दृष्टा के दर्श ' श्याम' कब जगत दीठि बरसै

--
को तुम कौन कहाँ ते आई
पहली बेरि मिली हो गोरी ,का ब्रज कबहूँ आई
बरसानो है धाम हमारो, खेलत निज अंगनाई
सुनी कथा दधि -माखन चोरी , गोपिन संग ढिठाई
हिलि-मिलि चलि दधि-माखन खैयें, तुमरो कछु चुराई
मन ही मन मुसुकाय किशोरी, कान्हा की चतुराई
चंचल चपल चतुर बतियाँ सुनि राधा मन भरमाई
नैन नैन मिलि सुधि बुधि भूली, भूलि गयी ठकुराई
हरि-हरि प्रिया, मनुज लीला लखि,सुर नर मुनि हरसाई

--
राधाजी मैं तो बिनती करूँ
दर्शन दे कर श्याम मिलादो,पैर तिहारे पडूँ
लाख चौरासी योनि में भटका , कैसे धीर धरूँ
जन्म मिला नर , प्रभु वंदन को,सौ सौ जतन करूँ
राधे-गोविन्द, राधे-गोविन्द , नित नित ध्यान धरूँ
जनम जनम के बन्ध कटें जब, मोहन दर्श करूँ
श्याम, श्याम के दर्शन हित नित राधा पद सुमिरूँ
युगल रूप के दर्शन पाऊँ , भव -सागर उतरूँ