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मंगलवार, 31 मई 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य --चतुर्थ सुमनान्जलि--प्रक्रिति .----डा श्याम गुप्त







प्रेम काव्य-महाकाव्य--चतुर्थ सुमनान्जलि--प्रकृति - प्रथम गीत-भ्रमर-गीत...







  प्रेम काव्य-महाकाव्य--गीति विधा  --     रचयिता---डा श्याम गुप्त  

  ------ प्रेम के विभिन्न  भाव होते हैं , प्रेम को किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत  चतुर्थ -सुमनांजलि-प्रकृति - में प्रकृति में उपस्थित प्रेम के विविध उपादानों के बारे में,  नौ विभिन्न अतुकान्त गीतों द्वारा प्रस्तुत किया गया है जो हैं--भ्रमर गीत, दीपक-राग, चन्दा-चकोर, मयूर-न्रित्य, कुमुदिनी, सरिता-संगीत, चातक-विरहा, वीणा-सारंग व शुक-सारिका... । प्रस्तुत है प्रथम गीत--
१ -भ्रमर-गीत.....


भ्रमर !
तुम कली कली का रस चूसते हो,
क्यों ?
मकरंद लोलुप बन,
बगिया की गली गली घूमते हो,
क्यों ?
दुनिया तुम्हें, निर्मोही-
प्रीति की रीति न निबाह्ने वाला ,
कली कली मधु चखने वाला, समझती है;
न जाने क्या क्या उलाहने देती है,
क्यों ?
क्यों न दे !
तुम से अच्छी तो मधुमक्खी है,
रस पीकर,
मकरंद से मधु तो बनाती है;
लेने के प्रतिदान में 
प्रीति की रीति तो निभाती है॥

तितलियां,
रंग-बिरंगी छवि से
जन जन का मन,
हर्षित तो करती हैं।
मन में प्रेम, उल्लास व-
प्रेम-आकांक्षा तो भरती हैं॥

भ्रमर !
तुम कृष्ण वर्ण हो,
प्रेम के प्रतीक, कृष्ण के वर्ण ;
फिर भी- रसास्वादन का ,
प्रतिदान नहीं देते ,
क्यों ?

कलियो !
तुम क्यों मकरंद बनाती हो ?
अपनी सुरभि से ,
भ्रमर जैसे निर्मोही को लुभाती हो;
अपनी प्रेम सुरभि को ,
व्यर्थ लुटाती हो ?

कलियाँ हँसीं,
मुस्कुराईं ;
अपना सौरभ बिखेरकर ,
खिलाखिलायीं |
प्रेम का अर्थ होता है-
देना ही देना ,
देते ही जाना |
निर्विकार भाव से,
बिना प्रतिदान मांगे,
बिना प्रतिदान पाए -
जो देता ही जाए ,
वही सच्चा प्रेमी कहाए ||

मांगे बिना भी -
भ्रमर सबकुछ देता है |
कलियों के  सौरभ-कण रूपी -
प्रेम-पाती को ,
बांटता है, प्रेमी पुष्पों में ;
वाहक बनकर-
सौरभ-कणों का |
पुष्पित होता है तभी तो,
बन बहार,
हर बार ,
सुमनांजलि बनकर ,
प्रेम संसार ,
नव-सृजन श्रृंगार ,
सृष्टि का आधार ||   


२-दीपक राग... 


पतंगा परवाना दीवाना ,
क्या प्रदर्शित करता है, तुम्हारा -
यूं जल जाना ?
दीपक कहाँ -
प्रीति की रीति को पहचानता है !
क्या व्यर्थ नहीं है ,
तुम्हारा यूं छला जाना ?

अर्ध मूर्छित परवाना तडफडाया ,
बेखुदी में यूं बड़बड़ाया ;
अरे दुनिया वालो -
यही तो सच्चा प्यार है,
प्यार के बिना तो जीना बेकार है |
शमा, बुलाये तो सही,
मुस्कुराए तो सही,
परवाना तो एक नज़र पर -
मिटने को तैयार है |
इसीलिये अमर-प्रेम पर,
शमा-परवाना का अधिकार है ||

दीपशिखा झिलमिलाई ,
लहराकर  खिल खिलाई |
दुनिया वाले व्यर्थ शंका करते हैं ,
प्यार करने वाले-
जलने से कहाँ डरते हैं |
पतंगों के प्यार में  ही तो हम -
तिल तिल कर जलते हैं |

वे मर मर कर जीते हैं ,
जल जल कर मरते हैं |
हम तो पिघल पिघल  कर ,
आखिरी सांस तक,
आंसू बहाते हैं |

पतंगे की किस्मत में-
ये पल कहाँ आते हैं ?   
३ --चन्दा-चकोर....

चकोर ! 
तू क्यों निहारता रहता है-
चाँद की ओर ? 
वह दूर है,
अप्राप्य है ;
फिर भी क्यों साधे है-
मन की डोर ?

प्रीति में है बड़ी गहराई,
प्रियतम की आस , जब-
मन में समाई ;
दूर हो या पास ,
मन लेता है अंगडाई |
प्रेमी-प्रेमिका तो-
नयनों से ही बात करते हैं ;
इक दूजे की आहों में ही ,
बस रहते हैं ;
इसी को तो प्यार कहते हैं |

मिलकर तो सभी प्यार कर लेते हैं,
जो दूर से ही रूप-रस पीते हैं,
वही तो अमर-प्रेम जीते हैं ||    
४- मयूर नृत्य 

 हे मयूर !
 तुम किसलिए नृत्य करते हो ? 
मयूरी, 
प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं समझती है;
इसलिए तो तुम्हारे साथ नृत्य नहीं करती है |
तुम नृत्य लय हो जाते हो,
प्रेम आवेश में खो जाते हो ;
विरत मोरनी की याद मन में लाते हो,
इसीलिये तो  आंसू बहाते हो ||

मोरनी !
तुम क्यों नृत्य नहीं करती हो? 
क्यों प्रियतम से विरत रहती हो ?
मोरनी ने अपनी कूक से -
 वन गुंजायमान किया ,
अपना समाधान यूं दिया  ||

प्रेम,
अंतर्मन की गहराई से-
किया जाता है  ;
मेरी कूक गुंजन के बिना,
मोर कहाँ नाच पाता है  |
मयूर की  न्रित्य-छटा--
मोरनी को इतनी भाती है, कि -
सुध-बुध खोकर -
नाचना भूल जाती है |
प्रिया की प्रेम-विह्वलता में -
मोर -इतना अविभूत होजाता है कि -
प्रियतम की आँखों में -
आंसू छलक आता है ||

आँसू, तो-
महज़ एक निशानी है;
यह तो मोर-मोरनी की--
प्रेम-कहानी है  |            


५-कुमुदिनी !
तुम क्यों खिलखिलाती हो ?
हरषाती हो,
मुस्काती हो 
चाँद को दूर से देखकर ही  ,
खिल  जाती हो |
उसकी प्रतिच्छाया से मिलकर ही-
बहल जाती हो  ||

कुमुदिनी  ने 
शर्माते हुए बताया |
यह जग ही परम तत्व की-
छाया है ,माया है |
भाव में ही सत्य समाता है,
भावना से ही प्रेम-गाथा है  |
भाव ही से तो -
प्रेमी, प्रेमिका में समाया है ;
वही भाव मैंने ,
मन में जगाया है |
मैंने मन में चाँद को पाया है,
तभी तो यह ,
मन-कुसुम खिलखिलाया है  ||


६-सरिता-संगीत 

नदिया !

तुम कहाँ जाती हो ?
दिशाहीन , उद्देश्यहीन,
कभी खिलखिलाती हुई-
उच्छ्रंख्ल बालिका की  तरह,
पत्थरों से टकराकर, उछलती हुई |
कभी गहराकर, गंभीर  समतल में -
सोचती सी बहती हुई, 
लहराती हुई |
और अंत में होजाती हो,
सागर में विलीन,
अस्तित्वहीन ||

नदिया मुस्कुराई ,
कल कल कल कल , खिलखिलाई ;
फिर लहर लहर लहराई |
यह जीवन लहरी है,
कहीं उथली ,
कहीं गहरी है |
यह जीवन धारा है,
प्रेम प्रीति का रस न्यारा है  ||

प्रियतम की डोर बांधे,
मन को साधे ,
जीवन की ऊंची-नीची, डगर डगर-
चलते जाना ही तो जीवन है |
प्रेम की साध लिए,
प्रियतम की राह में ;
मिलने की आस लिए,
चलना ही रीति है ;
यही तो प्रीति है |
सर्वस्व  लुटा देना,
अपने को भुला देना ,
अस्तित्व विहीन होकर;
प्रिय में लय कर देना ,
यह प्यार की जीत है;
यही तो प्रीति है ||
 
७-चातक बिरहा
हे चातक !

तुम क्यों बिरहा गाते हो ?
धरती के जल से-
प्यास नहीं बुझाते हो |
हे, उच्चकुल प्रतिमान !
स्वाति- बूँद के हेतु,
प्यासे रह जाते हो ,
सब दुःख सह जाते हो ||

पपीहे ने आसमान में चक्कर लगाया,   
टेर लगाकर बिरहा गाया |
प्रेम, परीक्षा लेता है,
प्रेम परीक्षा देता है ;
सच्चा प्रेम तो-
किसी एक से ही होता है |
प्रेमी तो,
त्याग ताप साधना से ही 
अमर-प्रेम जीता है |
तभी तो चातक,
स्वाति -बूँद रूपी -
सच्चा प्रेम-रस ही पीता है ||

सच्चा प्रेमी तो,
बिरहा गाते हुए भी-
सारा जीवन जी लेता है |
चातक,
सौभाग्यशाली है कि-
स्वाति-बूँद का ,
रूप-रस तो पी लेता है ||

८ ---वीणा-सारंग .....

सारंग !
तुम संगीत में आत्म लय हो जाते हो  ।
वीणा-नाद के स्वर रूपी-
मोह जाल में बंधकर 
जान से जाते हो  ।
क्यों ?
जाल में फंसा घायल मृग  ,
तड़फड़ाया  ;
टूटती हुई साँसों से,
यही कह पाया  ।
श्रीमान !
यह तो है प्रेम की ही माया ,
नाद प्रेम तो है जन जन में समाया  ।
नाद जीवन है, नाद जगत है ,
नाद है प्रभु की छाया  ।
जो आनंद नाद जी लेता है,
नाद रूपी प्रेम रस पी लेता है ,
वह तो एक क्षण में ही -
सारा जीवन जी लेता है  ||

नाद आनंद है,
प्रेमानंद है, परमानंद है,
ब्रह्मानंद है  |
कल कल निनाद है,
अंतर्नाद है  |
सारा जगत ही जीवन का नाद  है ;
नाद ब्रह्म का संवाद  है  |
फिर क्या जीना ,
क्या मरना ;
व्यर्थ का विवाद है ||
                                                                           
९-शुक-सारिका 
हे शुक !                         
हे सारिके !
तुम क्यों व्यर्थ विवाद करते हो ?
नर-नारी द्वंद्व तो सदियों पुराना है,
क्यों कलह-निनाद करते हो ?
किस उपमेय-उपमान को -
सुलझाने का प्रयत्न करते हो ?

शुक मुस्कुराया,
सारिका चहचहाई , लजाई ;
शुक की चौंच से चौंच मिलाकर ,
मुस्कुराई |
जाने से, मानने से,
सदियों पुरातन होने से ,तो-
काम नहीं चलता है |
सत-असत,
कर्म-अकर्म,
सही-गलत, पर-
विवाद करने से ही तो,
परस्पर विचार-विनिमय की कुंजी से ही तो;
समाज के अंतर्द्वार  का,
विश्वव्यापार का,
प्रेमी-प्रेमिका के प्यार-इज़हार का -
ताला खुलता है ||

शुक तो सारिका  को,
सदा ही भाता है |
शुक-सारिका का तो-
सदा ही प्रेम का नाता है |
पर-बार-बार वार्तालाप से ,
परस्पर विचार-विनिमय से -
प्यार और बढ जाता है ||

प्रेमी-प्रेमिका का वाद-विवाद,
प्रेमालाप कहलाता है ;
गुण-दोष दिखाता है,
कमियाँ दूर करने को उकसाता है -
दोनों को और करीब लाता है |
इसीलिये तो यह-
'किस्सा तोता-मैना' कहलाता है ||    --सुमनांजलि -४ समाप्त....क्रमश: सुमनांजलि -५..समष्टि-प्रेम....