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बुधवार, 23 मार्च 2011

प्रेम काव्य....गीति-विधा महाकाव्य -प्रथम सुमनान्जलि--वन्दना....डा श्याम गुप्त...

                     कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


प्रेम काव्य....गीति-विधा महाकाव्य ....डा श्याम गुप्त...

    प्रेम काव्य-महाकाव्य--गीति विधा    
           रचयिता---डा श्याम गुप्त

              .प्रेम जैसे विशद विषय को व उसके विविध रंगों को विस्तार देते हुए ...आज से हम  महाकाव्य "प्रेम काव्य " को क्रमिक रूप में पोस्ट करेंगे । यह गीति विधा महाकाव्य में प्रेम के विभिन्न रूप-भावों -- व्यक्तिगत से लौकिक संसार ...अलौकिक ..दार्शनिक  जगत से होते हुए ...परमात्व-भाव एवं मोक्ष व अमृतत्व तक --का गीतिमय रूप में निरूपण  है | इसमें  विभिन्न प्रकार के शास्त्रीय छंदों, अन्य छंदों-तुकांत व अतुकांत  एवं विविधि प्रकार के गीतों का प्रयोग किया गया है |
          यह महाकाव्य, जिसकी अनुक्रमणिका को काव्य-सुमन वल्लरी का नाम दिया गया है -- वन्दना, सृष्टि, प्रेम-भाव, प्रकृति प्रेम, समष्टि प्रेम, रस श्रृंगार , वात्सल्य, सहोदर व सख्य-प्रेम, भक्ति श्रृंगार, अध्यात्म व अमृतत्व ...नामसे  एकादश सर्गों  , जिन्हें 'सुमनावालियाँ' कहा गया है , में निरूपित है |
            प्रस्तुत है प्रथम सुमनांजलि -वन्दना जिसमें १० वन्दनाएँ हैं --- सर्व प्रथम गणेश व सरस्वती वंदना आदि-महाकवियों , साहित्यकारों का नियम रहा है .....

     १-गजानन वन्दना 
कर्म प्रधान जगत में, जग में,
प्रथम पूज्य हे सिद्दि-विनायक!
कृपा करो हे बुद्धि-विधाता,
रिद्धि-सिद्धि दाता गणनायक ||

श्याम ह्रदय को पुष्पित करदो,
 प्रेम-शक्ति से यह मन भर दो |
आदि लेख ,लेखक हे गणपति !
लेखन प्रेम-पयोनिधि करदो  ||

पंथ प्रेम का महा कठिन, प्रभु,
सिद्धि-सदन तुम सिद्धि प्रदाता |
द्वार पडा  हे गौरी नंदन !
भक्ति-कृपा वर दो  हे दाता || 

   २-सरस्वती वंदना... 
हे मानस की देवि शारदे !
मानस में अवतार धरो माँ |
मन मंदिर  में कविता बनकर ,
जीवन  का उद्धार करो माँ ।
जले प्रेम की ज्योति ह्रदय में,
हे माँ, तेरी कृपा दृष्टि हो |
ऐसी भक्ति भरो इस उर में ,
प्रेम मयी यह सकल सृष्टि हो॥।

तेरी चरण धूलि की मसि से ,
ह्रदय पत्र पर अन्कित हो जो ।
मन की कलम लिखे जो उसमें,
छंद ताल लय सुर संगम हो ॥ 

अपनी स्वच्छ धवल शोभा की,
एक किरन का मुझको वर दो ।
सारे कलुष दोष मिट जायें,
शुभ्र ज्योत्सना मन में भर दो ॥

तेरे दर पर खडा ’श्याम है,
कागज़ कलम दवात लिये मां ।
प्रेम ज्योति जग में बिखराने,
आशिष देदो, आग्या  दो मां ॥  

३-उमा-महेश वंदना....
काम मोह को जीत कर,किया काम को ध्वस्त |
ऐसे   औघड़,  सदाशिव,  राहें   करें   प्रशस्त ।
 राहें करें प्रशस्त ,   प्रेम की  महिमा  न्यारी,
प्रेम बसे  भगवान,  प्रेम पर सब बलिहारी ।
 श्याम जब करें पार्वती संग तान्डव शंकर ,
सृष्टि    प्रेम- लय होय, बजे डमरू प्रलयंकर ॥

तीन लोक सब दिशायें, सृष्टि सभी स्तब्ध ।
शिवशंकर के क्रोध से,हुआ काम जब ध्वस्त।
 हुआ काम जब ध्वस्त,करे रति विलाप भारी ,
पति व प्रेम के बिना,जिये कैसे प्रभु! नारी ।          
हो जग में  संचार,  प्रेम की रीति-भाव का,
विनती है,  हे नाथ!  करें उद्धार नाथ का ॥

भोले भन्डारी किया, कामदेव आश्वस्त ,
पृथ्वी  पर फ़िर प्रेम की, राहें हुईं प्रशस्त ।
राहें हुईं प्रशस्त, स्वस्ति यह बचन उचारा,
बन कर रहो अनंग,भाव-रति मन के द्वारा ।
करें ’श्याम' कर बांध, उमा-शम्भू पद वंदन,
कामदेव उर बसे, सजाये प्रेमिल बंधन ॥

        ४- राधा-कृष्ण वन्दना 
राधे श्री,   मन में बसें , राधा मन घनश्याम |
राधा-श्याम जो मन बसें,हर्षित मन हों श्याम ||

लीला राधा-श्याम की, श्याम' सके क्या जान |
जो लीला को जान ले, श्याम रहे ना श्याम ||

राधा कृष्ण सुप्रेम ही, जग की है पहचान 
कौन भला समझे करे, एसा प्रेम महान ||

मेरे उर में बस  रहो, राधा संग घनश्याम |
प्रेम बांसुरी उर बजे,धन्य धन्य  हों श्याम ||

राधा सखियाँ संग हैं, और सखा संग श्याम |
भक्ति रास लीला रचें, रीति चले अविराम ||

राधाजी का रंग  जो,  पड़े श्याम के  रंग  |
हर्षित अँखियाँ होरहीं, देख हरित दुति अंग ||

ललित त्रिभंगी रूप में, राधा संग गोपाल |
निरखि-निरखि सो भव्यता, होते श्याम निहाल ||

अमर -प्रेम के  रंग का, पाना चाहें  ज्ञान |
राधा-नागरि का करें, नित प्रति उर में ध्यान |

'श्याम, खडा करबद्ध जो, राधाजी के द्वार |
श्याम-कृपा तो मिले ही, राधा कृपा अपार ||

हे राधे !  हे राधिके !, आराधिका ललाम |
श्याम करें आराधना, होय राधिका नाम ||
,
रस स्वरुप घनश्याम हैं , राधा भाव-विभाव |
श्याम भजे रस संचरण, पायं सकल अनुभाव ||

५-माँ भारती वन्दना ...
आर्यमाता, भूमि देवी ,शस्यश्यामल धाम है |
फुल्ल कुसुमित भारती माँ , बार बार प्रणाम है ||


धर्म तुम हो, मर्म तुम हो,आयु यश बल दायिनी |
मन सुमन स्वीकार लो माँ, भारती हे मानिनी !


जो अलंकृत रह चुकी है, विश्व-गुरु सम्मान से |
चलपड़ी उन्नत-शिखर को, आज फिर नव मान से ||

मोह निद्रा त्याग, पुष्पित, नव सृजन की हो कली |
निज शक्ति बैभव ज्ञान को,फिर प्रकट करने चली ||

कर्म के हर क्षेत्र में ही, नित करे नव सर्जना |
प्रेम के बंधुत्व पथ पर,फिर करे नव गर्जना ||

फिर, विश्व गुरु भारत बने, हो प्रेम की स्थापना |
चाहता है यही आशीष, 'श्याम कर, पद वन्दना ||

        ६-ईषत-अहं-वन्दना .....
प्रेम के  ईषत-अहं१  रूप में,
जग कारक सत्ता मुस्काई |
एक से बनूँ अनंत, असीम में,
जब ईषत-इच्छा२  लहराई ||

यह इच्छा बन आदि-प्रेम,जब-
सृष्टि के कण कण में छाया|
जड़ जंगम गति जीव जगत के ,
अंतस में बन प्रेम समाया ||
उसी परम ईषत-इच्छा को -
कर नमन, 'प्रेम' आरम्भ करूँ |
प्रेम-कुसुम वल्लरी फले मन,
श्री चरणों में नित शीश धरूँ ||

[कुंजिका - १= मूल अहं--जिससे समस्त सांसारिक चक्र व मायाजाल की अभिव्यक्ति होती है...वह ब्रह्म का  सृष्टि -जगत के प्रति प्रेम ही है जिससे वह स्वयं को व्यक्त करके माया बंधन में बंधता है....२= मूल अहम् के जाग्रत होने पर 'एकोहं बहुस्याम ' एक से अधिक होने की मूल ब्रह्म इच्छा जिससे समस्त सृष्टि हुई...}
७ - रति-अनंग वन्दना ......
जीत कर महादेव को ,जो-
 स्वयं को लय कर गया |
भस्म होकर काम, जग को-
कामना   से   भर  गया ||
हो अनंग,रस-रंग की जो-
मन  जगाये  कामना |
साथ में रति के जगत की,
बन गया रति-भावना  ||

प्रेम की हे युगल मूरत,
बार  बार   प्रणाम   है |
मिले आशिष काव्य मेरा,
प्रेम   के   ही    नाम है  || 

८-मानस वन्दना ....
प्रेम के आधार हे मन !
मन तुम्हारा करूँ वंदन |
प्रेम के आधार  हे मन !

प्रेम की आराधना के,
तुम हो साधन मेरे मन!
में तुम्हारी वन्दना  में,
कर रहा हूँ पुष्प अर्पण |

प्रेम के आधार हे मन !

जब किसी के प्रति,किसी के-
मन में आकर्षण समाये |
मन के मंदिर में कोई,
निज कल्पना का मीत पाए ||

तुम प्रथम मन-भावना के,
वहन-कर्ता, मीत उन्मन |
प्रेम के आधार हे मन !
वन्दना तेरी करूँ मन ||

प्रेम के आधार हे मन !

हो आत्मस्थ इन्द्रियों में,
ज्ञान बने सज जाते हो |
हो अन्तस्थ ह्रदय तल में,
बने स्वप्न इठलाते हो ||
विह्वल -भाव बसे उर में,
प्यार अमित बन जाते हो |
प्रेम के वाहक मेरे मन ,
प्रेम तुम हो, प्यार हो मन ||

प्रेम के आधार हे मन !
मन तुम्हारा करूँ वंदन ||  


         ९-प्रेम तत्व वंदना ...
प्रेम  तेरी वन्दना, मैं क्या करूँ, कैसे करूँ |
प्रेम तो है स्वयं वंदन, वन्दना मैं क्या करूँ ||

प्रेम की जो अर्चना , कर पाय मानव सत्य ही |
यह जगत आदर्श बनकर, प्रेममय हो स्वयं ही ||

प्रीति की ही रीति को मन में बसाए जो जिए |
कर्म की आराधना से सत्य पथ पर चल लिए ||

प्रेम ही जो हो नहीं तो विश्व का व्यवहार क्या |
ज़िंदगी जो हो नहीं तो मृत्यु का व्यापार क्या ||

धर्म आस्था त्याग माया भोग तप जो कर्म सब |
क्षमा करूणा मोह ममता, प्रेम के ही धर्म सब ||

प्रेम ही ईश्वर अलौकिक, प्रेम लौकिक व्यंजना |
प्रेम ही मन की सुरीली तान, प्रभु अभ्यर्थना ||

जन्म जीवन मृत्यु रचना रचयिता, या ब्रह्म सब |
प्रेम से उत्पन्न सब कुछ , प्रेम-लय हों तत्व सब ||

प्रेम ही जीवन-जगत का मूल है,  आधार है |
प्रेम की ही वन्दना तो 'श्याम, कृति का सार है ||

       १०-प्रेमी युगल वन्दना .....
वन्दों प्रिय नर-नारि१ ,रति-अनंग सम रूप धर |
जासु कृपा संसार, चलै सकल कारन-कारन ||

राधे-मोहन रूप या,  पति-पत्नी के तत्व  |
माया-ब्रह्म स्वरुप, जग में प्रेमी-प्रेमिका ||

अमर प्रेमिका रूप , अमर प्रेम, प्रेमी अमर |
प्रेमी अमर अरूप, कालिका  औ प्रेमी भ्रमर२  ||

प्रेमी युगल प्रतीति,श्याम ह्रदय रस रंग नित |
वीणा-सारंग३  प्रीति, दीपक जरै पतंग४ ,जस  ||

स्वाति-बूँद५ के हेतु,सब दुःख सहे सहेज ,जो |
प्रेम-परीक्षा देख, पपिहा 'श्याम, सराहिये ||

इक दूजे मन माहिँ, अंतरतम तक होयं लय |
अमर-तत्व पाजाहिं, सच्चे प्रेमी-प्रेमिका ||

इक दूजे के अंग, सुख-दुःख खो जो रम रहें |
सो   पावें    रस रंग,  सोई   प्रेमी-प्रेमिका  ||

मन   प्रेमी  होजाय, युगल-रूप६ प्रिय चित धरे |
नलिनी खिल-खिल जाय,ध्यान धरे शशि-चंद्रिका७  ||

जीवन सफल सुहाय, दर्शन प्रेमी युगल के |
मन पंकज खिल जाय, जैसे देखे रवि-प्रभा८ ||           --- क्रमश:---द्वितीय  सुमनांजलि ...सृष्टि ..


 [कुंजिका--  १= स्त्री-पुरुष ही प्रेम का मूल उपादान है ...२=  कली व भंवरे के प्रेम का स्वरुप ...३= वीणा की तान पर हिरण का मुग्ध होकर शिकारी के जाल में फंस जाने की कथा का संकेत ...४= दीपक के ऊपर पतंगे ( शमा-परवाना ) के जल मरने के साहित्यिक तथ्य का संकेत...५ = पपीहा सिर्फ स्वाति-नक्षत्र का ही जल पीता है इस साहित्यिक कथ्य का संकेत....६= प्रेमी-प्रेमिका या राधा-कृष्ण का युगल स्वरुप ...७= कमलिनी या कुमुदिनी का पुष्प सिर्फ चांदनी में ही खिलता है |...८= कमल का पुष्प दिन में सूर्योदय होने पर ही खिलता है रात में सूर्यास्त पर बंद होजाता है | ]


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