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शुक्रवार, 3 जून 2011

डा श्याम गुप्त का पद........

                                                                                       कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

 रे मन अब कैसी ये भटकन |
क्यों न रमे तू श्याम भजन  नित,  कैसी मन अटकन |
श्याम कृपा बिन जगत-जुगति नहीं,मिले न भगति सुहानी |
श्याम भगति बिनु क्या जग-जीवन कैसी अकथ कहानी |
श्याम की माया,  श्याम ही जाने,  और न जाने कोय |
माया  मृग-मरीचिका  भटकत  जन्म  वृथा ही  होय |
श्याम भगति रस रंग रूप से  सींचे जो मन उपवन |
श्याम,श्याम की कृपा मिले ते सफल होय नर जीवन ||
                                रे नर ! अब कैसी ये भटकन......||

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