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रविवार, 24 जुलाई 2011

प्रेम काव्य -षष्ठ -सुमनांजलि ....

                                                                      कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित.......



          प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया जायगा ...जो तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग)..वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है...


            (क)- संयोग श्रृंगार में --पाती, क्या कह दिया ,  मान सको तो,     मैं चाँद तुझे कैसे.....,  प्रिय तुमने किया श्रृंगार ,  पायल,   प्रियतम जब इस द्वारे आये,    सखि ! कैसे   व   मांग सिंदूरी ...आदि ९ रचनाएँ प्रस्तुत की जायगीं |
प्रथम रचना---
पाती .....
जो पवन मेरे तन से लिपट कर बही ,
चंदनी सी महक लेके आती रही |
मैं समझ ही गया ये सुरभि बावरी,
तेरे तन की छुअन लेके आती रही ||

तेरे तन की छुअन प्यार पाती बनी,
मेरे मन की कली जब खिलाने लगी |
मैं समझ ही गया लिख के पाती,मगन-
प्रीति-स्मृति में तू मुस्कुराती रही ||

जब गगन में दमक यूं उठी दामिनी,
मैं समझ ही गया तू है खुल कर हंसी |
मेरे गीतों सजे , वे वासंती ख़त,
ये हवा तुझको गाकर सुनाती रही ||

जब मयूरी ने जंगल में कुंजन किया,
मस्त होके मयूरा लगा नाचने |
मैं समझ ही गया, कोई रचना मेरी,
पढ़ ठुमकने लगी, तू ठुमकती रही ||

मैं समझ ही गया ये सुरभि बावरी,
मेरे गीतों से तुझको रिझाती रही |
जो पवन मेरे तन से लिपट कर बही ,
चंदनी सी महक लेके आती रही ||



द्वितीय रचना........क्या कह दिया...


तुमने आकर के हाथों से क्या छू दिया ,
मेरा आँचल निखर कंचनी होगया |
जाने नयनों ने नयनों से क्या क्या कहा ,
रूप पुलकित धवल चांदनी होगया |
तुमने आकर के हाथों से क्या छूदिया ,
मेरा आंचल निखर कंचनी हो गया ||


तेरी बातों में जाने कहाँ खोये हम,
भूल कर दीन-दुनिया तुम्हारे हुए |
तुमको ख्यालों में पाकर के बेसुध हुए ,
राज सारे ही दिल के बयाँ होगये ||
मृदु स्वरों से न जाने क्या तुमने कहा,
तन खनकती हुई करधनी होगया ||

आँगन आँगन फिरूं मन में होके मगन,
अब सुहाने लगे सब नदी बाग़ वन |
मन की मैना व कोकिल लगीं कूकने ,
एक होने लगे जैसे धरती - गगन ||
नर्म होठों से तुमने ये क्या छू दिया,
मेरा तन मन महक चंदनी होगया ||

मन का हिरना फिरे है इधर से उधर,
मस्त वीणा की झंकार मन में उठी |
मन में मलयज की शीतल लहर बह चली ,
पग की पायल झनन झन झनाने लगी |
तुमने साँसों में बस कर ये क्या कर दिया ,
तन बदन खिल कमल-पांखुरी होगया ||

मन में मनसिज कुसुम-शर से चलने लगे,
रंग बासन्ती आँखों में छाने लगा |
सारे तन में यूं कलियाँ चिटखने लगीं ,
मन तेरे सुर में ही सुर मिलाने लगा |
कितने रंगों से आँचल मेरा भर दिया,
मन तेरे प्यार की बांसुरी होगया ||

जाने नयनों ने नयनों से क्या क्या कहा,
रूप पुलकित धवल चांदनी होगया ||



तृतीय गीत ---


मान सको तो मान लो...

मान सको तो मान लो ,
मैंने तुमसे किया है प्यार |
तुम ही हो मेरे जीवन धन,
तुम ही मेरा प्यार -
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


तुम पर सारा जीवन वारूं ,
वारी सब संसार |
तुम्हीं प्यार की प्रथम किरण हो,
तुम ही अंतिम प्यार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


तुमसे जगीं भावनायें, मन-
उमड़े रंग हज़ार |
तुम दीपक हो मैं बाती हूँ,
तुम जीवन का सार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


जब जब आये मन को भाये,
हम कर बैठे प्यार |
हमने तुमसे प्यार किया है,
तुम मेरा संसार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


मानना चाहो मान लो मेरे,
इस मन का इज़हार |
तुमने हम से प्यार किया है,
अब कैसी मनुहार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


चतुर्थ गीत ...


मैं चाँद तुझे कैसे कहदूं .....

मैं चाँद तुझे कैसे कहदूं ,
वो बदली में छुप जाता है |
तेरा सुन्दर मुखड़ा प्रियवर ,
घूंघट को भी दमका जाता है ||

बदली से निकल कर वो चंदा ,
अपनेपन पर इठलाता है |
तेरा चिलमन जब हटता है,
वह खुद ही शरमा जाता है ||

जो दाग चाँद के माथे पर ,
उसका कोई भी नाम नहीं |
तेरे मुखड़े का सुन्दर तिल,
मुखड़े को भी दमकाता है ||

वो घटता बढ़ता रहता है,
इक रोज कहीं खो जाता है |
यह रूप मगर इस घर भर को ,
तो प्रतिदिन ही महकाता है ||

वो रातों को ही आता है,
हर सुबह कहीं खोजाता है |
यह सुन्दर आनन तेरा प्रिय,
प्रतिपल मुझको हरषाता है ||

वह दूर दूर ही रहता है ,
विरहा में सदा सताता है |
तेरे अंतस का अपनापन ,
तन मन जगमग कर जाता है |

उसकी अपनी भी ज्योति कहाँ ,
है प्रभा सूर्य की बिखराता |
तेरे यौवन की ज्योति निरख ,
है दिनकर भी सहमा जाता ||

मैं चाँद तुझे कैसे कह दूं,
वह बदली से घिर जाता है |
तेरा यह सुघड़ सलोना मुख ,
घूंघट को भी दमकाता है ||





 पंचम गीत..


प्रिय तुमने किया श्रृंगार....


प्रिय, तुमने किया श्रृंगार ||


टूट गए दृढ़ता के बंधन हम कर बैठे प्यार |
तेरे तन की गर्मी से उठ आई बरखा बहार |
बगटुट मनुवा ऐसे दौड़े जैसे मस्त बयार |
प्रिय, तुमने किया श्रृंगार ||


सतरंगे रंग इन्द्रधनुष के आँचल से छलके |
दन्तपंक्ति हो धवल तरंगित ज्यों घन बिजुरी चमके |
पायल बिछुआ रुनझुन, सुरभित गजरा हरसिंगार |
प्रिय, तुमने किया श्रृंगार ||

अंखियों में कजरा, नकबेसर,मोतिन मांग सजाई |
चाल चले कलहंस लजाये,गालों पर अरुणाई |
माथे पर बिंदिया सिंदूरी, चमके ज्यों अंगार |
प्रिय, तुमने किया श्रृंगार ||

दूज का चन्दा बना गले का चन्द्रहार लहराए |
चन्दन लेप सुगन्धित तन ज्यों मलयानिल हर्षाये |
कर्णफूल झूलें ज्यों झूला झूलें सुन्दर नार ||


प्रिय, तुमने किया श्रृंगार |
सखि ! तुमने किया श्रृंगार ||








षष्ठ गीत... पायल ..



सखी ! तेरी पायल की झंकार ||
नाच उठा मन मोर,
सज गया सपनों का संसार |
प्रेम बांसुरी बजी ह्रदय में ,
झूम उठा घर-द्वार |
सखी ! तेरी पायल की झंकार ||


झनक झनक पैजनियाँ बोले ,
सारे भेद जिया के खोले,
जैसे हो कान्हा की वंशी ,
छेड़े मन के तार |
सखी ! तेरी पायल की झंकार ||


जब जब हो पायल की छन छन ,
तड़पे प्रेम विरह घायल मन |
दूर देश से जैसे कोई,
आई प्रेम पुकार ||
सखी ! तेरी पायल की झन्कार ||


छत, बैठक, घर, मंदिर, आँगन,
छलकाए रस पायल छन छन |
आतप में जैसे श्यामल घन,
छेड़े राग मल्हार |,
सखी ! तेरी पायल की झंकार ||

मेरे मन की विरह पीर को ,
तेरी पायल कब समझेगी |
प्रीति भरे इस मन आँगन में ,
बैरिन पायल कब छनकेगी |
मैं तो हार गया हूँ सजनी !
कर कर के मनुहार |

सखी! तेरी पायल की झंकार ||





सप्तम गीत---
प्रियतम जब इस द्वारे आये.....

प्रियतम जब इस द्वारे आये |
दीप जले मन, तन हरषाये ||

भीनी भीनी प्यार की महक,
मन साँसों में भर भर जाए |
अंग अंग में खिली चांदनी,
मन राधा बन् कर मुस्काए | ....प्रियतम जब.......||

नैन चदरिया राह बिछाये,
दीप जलाए द्वार खड़ी थी |
उपालंभ की गठरी बाँधे,
मैं तो कर मनुहार खड़ी थी |

प्रियतम से जब हुआ सामना,
मन पिघला नवनीत होगया |
झूले बाहों के झूले जब,
उपालंभ संगीत होगया |

जो मनुहार किये बैठी थी ,
आँसू बन् प्रिय गीत होगया |
मौन मौन मन बात होगई,
बोल मुखर फिर कब हो पाए | ---प्रियतम जब......||

बाहों में भरकर इठलाये ,
प्रियतम जब इस द्वारे आये |
तन पिघला नवनीत होगया,
मन राधा बनकर मुस्काए |

प्रियतम जब इस द्वारे आये ||






 अष्ठम गीत ..रति-श्रृंगार में ....


सखि कैसे ....?


सखि री ! तेरी कटि छीन,
पयोधर भार भला धरती हो कैसे ?
बोली सखी मुसकाय , हिये-
उर-भार तिहारो धरतीं हैं जैसे ||

भौहें बनाईं कमान भला , हैं-
तीर कहाँ पे, निशाना हो कैसे ?
नैनन के तूरीण में बाण ,
धरे उर पैनी कटार के जैसे ||

कौन यहाँ मृग-बाघ धरे ,
कहौ,बाणन वार शिकार हो कैसे ?
तुम्हरो हियो मृग भांति पिया,
जब मारे कुलांच, शिकार हो जैसे ||

प्रीति तेरी मन मीत, प्रिया -
उलझाए ये मन, उलझी लट जैसे |
लट सुलझाय तो तुम ही गए,
प्रिय, मन उलझाय गए कहो कैसे ?

ओठ तेरे बिम्बाफल भांति,
किये रचि, लाल अंगार के जैसे |
नैन तेरे प्रिय, प्रेमी चकोर ,
रखें मन जोरि अंगार से जैसे ||

अनहद -नाद को गीत बजे,,
संगीत, प्रिया अंगडाई लिए से |
कंचन-काया के ताल-मृदंग पे ,
थाप तिहारी कलाई दिए से ||

प्रीति भरे रस बैन तेरे , कहो -
कोकिल-कंठ भरे रस कैसे ?
प्रीति की वंशी तेरे उर की,पिय -
देती सुनाई मेरे उर में से ||

पंकज नाल सी बाहें प्रिया, उर-
बीच धरे हो, क्यों अँखियाँ मीचे |
मत्त मतंग की नाल सी बाहें ,
भरें उर बीच , रखें मन सींचे ||






4 टिप्‍पणियां:

veerubhai ने कहा…

भाव रस श्रृंगार से संसिक्त नौ बहार से नौ गीत रसलीन कवि की याद ताज़ा कर गए .बिहारी की अतिश्योक्ति और श्लेष यहाँ नहीं है सहज मन की प्रेमिल अनुभूति में प्रेम गीत मनमीत से लगे बधाई डॉ श्याम गुप्ता जी .कृपया यहाँ भी पधारें और टिपियाएँ .
http://veerubhai1947.blogspot.com/
http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

veerubhai ने कहा…

डॉ श्याम गुप्ता जी ,आदमी सिर्फ जीवन खण्डों का ज़मा जोड़ नहीं है परिवेश भी है अर्जित व्यवहार भी है ,हार्ड कोर प्रवृत्ति जैसे कोई अपराधी बनता है जीवन खण्डों में बीज रूप हो सकती है लेकिन उसका पल्लवन तो तदनुरूप माहौल में ही होता है .मदद कर ने की सहज प्रवृत्ति हम सबमे जन्मजात है इसमें कोई संदेह नहीं है .कोई किसी के लफड़े में डर की वजह से न पड़े (दिल्ली जैसी वाहियात जगह में )यह और बात है लेकिन मन में भाव ज़रूर आता है ,मैं कुछ मदद करूँ .

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद वीरूभाई ...श्रृंगार शिरोमणि रसलीन का संदर्भित उल्लेख व याद ताजा कराने के लिए आभार....

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

वीरूभाई,जीवन है ही संस्कारों से प्राप्त (जेनेटिक) व परिवेश से अर्जित भावों व व्यवहारों का कलाप ...मानव की सहज प्रवृत्ति मदद की हो सकती है ...है ..परन्तु उसका क्रियान्वन, पल्लवन तब ही तो होगा जब वह भावों को समझाने के साथ विश्लेषण करने लायक हो जायगा ....अतः शिशु के लिए यह सब कहना व्यर्थ की सिर मारी व धूल में लट्ठ मारना ही है....