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गुरुवार, 29 अक्तूबर 2009

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल --

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

       ग़ज़ल- आपने क्या किया 


दिए जलने लगे आपने क्या किया ,
दिल मचलने लगे आपने क्या किया |

अपनी मासूम दुनिया में खोये थे हम,
ख्याल में आगये आपने क्या किया |


अपनी राहों में  थे हम  चले जा रहे ,
आप क्यों मिल गए आपने क्या किया |


खुद की चाहत में दिल अपना आबाद था,
आस बन आ बसे आपने क्या किया |


जब खिलाये थे वे  पुष्प चाहत के तो,
फेर रुख चलदिये आपने क्या किया |


साथ चलते हुए आप क्यों  रुक गए,
क्यों कदम थम  गए आपने क्या किया |


श्याम' अब कौन चाहत का सिजदा करे,
नाखुदा बन गए आपने क्या किया






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