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मंगलवार, 23 जनवरी 2018

वैदिक सरस्वती वन्दना--डा श्याम गुप्त----

वसंत पंचमी के अवसर पर ------
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वैदिक सरस्वती वन्दना
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वेद ऋचा उपनिषद् ज्ञान रस ,
का जो नर चिंतन करता है ।
करे अध्ययन मनन कर्म सब,
ऋषि प्रणीत जीवन सूत्रों का |


उस निर्मल मन बुद्धि भाव को,
जग जीवन की सत्व बुद्धि का|
स्वयं सरस्वती वर देतीं हैं,
सारे जीवन सार-तत्त्व का ||

माँ की कृपा भाव के इच्छुक,
जब माँ का आवाहन करते |
श्रेष्ठ कर्म रत,ज्ञान धर्म रत,
भक्तों को इच्छित वर मिलते।।

वाणी की सरगम ऋषियों ने,
सप्त वर्ण स्वर छंद निहित इस,
सत्य मूल ऊर्जा से, स्वयंभू-
अनहदनाद से किया संगठित।।

जग कल्याण हेतु माँ वाणी,
बनी ‘बैखरी’ हुई अवतरित।
माँ सरस्वती कृपा करें , हों-
इस मन में नव भाव अवतरित।।

गूढ़ ज्ञान के तथ्यों को हम,
देख के भी तो समझ न पाते।
ऋषियों द्वारा प्रकट सूत्र को,
सुनकर भी तो समझ न पाते।

गूढ़ ज्ञान का तत्व न केवल ,
बुद्धि की क्षमता से मिलता है ।
करें साधना तप निर्मल मन ,
उस सुपात्र को ही मिलता है।।

मातु वाग्देवी सुपात्र को,
स्वतः ज्ञान से भर देतीं हैं।
देव, गुरू या किसी सूत्र से,
मन ज्योतिर्मय कर देती हैं॥

मेरे अन्धकारमय मन को ,
हे मां वाणी! जगमग करदो।
मां सरस्वती इस जड़मति को,
शुद्ध ज्ञान से निर्मल करदो॥

श्रम, विचार औ कला परक सब,
अर्थ परक और ज्ञान परक सब।
सारी ही विध्याएं आकर,
सरस्वती में हुईं समाहित ॥

सहज सुधा सम अमित रूप है,
वाणी महिमा अपरम्पार ।
तुम अनन्त स्त्रोत अनन्ता,
तुच्छ बुद्धि क्या पाये पार ॥

सर्वज्ञान सम्पन्न व्यक्ति भी,
सभी एक से कब होते हैं ।
अनुभव् तप श्रद्धा व मन तो,
होते सबके अलग अलग हैं ॥

समतल होता भरा जलाशय,
यद्यपि ऊपर के जल तल से ।
किन्तु धरातल गहराई के,
अलग अलग स्तर होते हैं॥

ज्ञान रसातल अन्धकार में,
पडे श्याम को संबल देदो ।
मेरा भी स्तर उठ जाये,
हे मां ! एसा मति बल देदो ॥

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