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बुधवार, 2 सितंबर 2009

मेरे गीत सुरीले क्यों हैं-----

मेरे गीतों में आकर के तुम क्या बसे ,
गीत का स्वर मधुर माधुरी हो गया
अक्षर-अक्षर सरस आम्र-मन्जरि हुआ,
शब्द मधु की भरी गागरी होगया।

तुम जो ख्यालों में आकर समाने लगे,
गीत मेरे कमल दल से खिलने लगे
मन के भावों में तुमने जो नर्तन किया,
गीत बृज की भगति बाबरी होगया

प्रेम की भक्ति-सरिता में होके मगन,
मेरे मन की गली तुम समाने लगे
पन्ना-पन्ना सजा प्रेम रसधार में,
गीत पावन हो मीरा का पद होगया।

भाव चितवन के मन की पहेली बने,
गीत कबिरा का निर्गुण सबद होगया।
तुमने छंदों में सज के सराहा इन्हें,
मधुपुरी की चतुर नागरी होगया

मस्त मैं तो यूहीं गुनुगुनाता रहा ,
तुम सजाती रहीं,मुस्कुरातीं रहीं
भाव भंवरा बने गुनगुनाने लगे ,
गीत का स्वर नवल पांखुरी होगया।

तुम जो हंस-हंस के मुझको बुलाती रहीं,
दूर से छलना बन के लुभाती रहीं।
गीत इठलाके हमको बुलाने लगे,
मन लजीली कुसुम वल्लरी होगया।

तुमने कलियों से जब लीं चुरा शोखियाँ,
बन के गज़रा कली मुस्कुराती रही |
पुष्प चुनकर जो आँचल में भरने चलीं,
गीत पल्लव-सुमन आंजुरी होगया

तेरे स्वर की मधुर माधुरी मिलगई,
गीत राधा की प्रिय बांसुरी होगया
भक्ति के भाव तुमने जो अर्चन किया,
गीत कान्हा की प्रिय सांवरी होगया॥

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वाह...वाह..।
गीत मे ध्वन्यात्मकता भी है और सरसता भी।
बधाई!

Babli ने कहा…

बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये ख़ूबसूरत रचना काबिले तारीफ है!