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सोमवार, 26 सितंबर 2011

प्रेमकाव्य-महाकाव्य. षष्ठ सुमनान्जलि (क्रमश:)-खंड ग-वियोग श्रृंगार ....डा श्याम गुप्त

                                                    कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



                    प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया जायगा ...जो तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग)..वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है.....          प्रस्तुत है   खंड ग ..वियोग श्रृंगार -जिसमें -पागल मन, मेरा प्रेमी मन, कैसा लगता है, तनहा तनहा रात में, आई प्रेम बहार, छेड़ गया कोई, कौन, इन्द्रधनुष एवं बनी रहे ...नौ रचनाएँ प्रस्तुत की जायंगी | प्रस्तुत है ..प्रथम रचना ...पागल मन .......    
वह सुरभित मस्त पवन झोंका ,

मन को छूकर जो चला गया |
वह तेरी प्रीति-महक थी प्रिय, 

पागल मन समझ नहीं पाया ||


वह छूकर मेरे तन मन को,

यूं प्यार जता कर चला गया |

था तेरे मन की छुअन लिए,

वैरी मन समझ नहीं पाया ||

 
कानों में गुनगुन करके वह,

चुपके कुछ कहकर चलागया |

तेरे  गीतों की  गुन-गुन को,

पागल मन समझ नहीं पाया ||



वह मेघ गरज कर बरसगया,

धरती  का आँचल हरषाया |

वह तेरा प्यार संदेशा था,

भूला मन समझ नहीं पाया ||


बागों में कोयल कूक रही,

मैं समझ गया सावन आया |

वह तेरी प्रीति-कुहुक थी प्रिय,

भोला मन समझनहीं पाया ||



उपवन -उपवन नाचे मयूर,

नटखट मन हर्षित हुआ, मगर |

वह   था  तेरा  ही  प्रेम-नृत्य,

पागल मन समझ नहीं पाया ||


खुश  होता था मैं लहर लहर ,

नदिया की थिरकन देख देख |

तेरे तन-मन की थिरकन को ,

चंचल मन समझ नहीं पाया ||



जब  बागों में  छाया बसंत,

डाली पर  कलियाँ इठलाईं |

तुमने  ही  ली थी  अंगडाई,

नटखट मन समझ नहीं पाया ||



आतप में श्यामल घन ने जब,

मेरे तन  पर  करदी  छाया |

थी  तेरी प्रीति-झलक वह प्रिय,

वेसुध मन समझ नहीं पाया |



मैं   अश्रु    बहाता  रहा  सदा ,

मन को समझाता रहा सदा |

थी तेरी याद-सुरभि वह प्रिय,

पगला मन समझ नहीं पाया ||



मैं याद तुम्हारी सदा करूँ,

सुधियों के अर्पण सुमन करूँ |

वह  तेरे  मन की  गहराई,

पापी मन समझ नहीं पाया |



यहं   मेरा  मन  अज्ञानी  है ,

प्रियतम अब तो तुम आजाओ |

तुम  प्यार की  सभी परिभाषा,

आकर मुझको समझा जाओ ||



चुपके से मगर नहीं आना,

अपनी पहचान बता जाना |

पहचानूं तुमको, कह न सकूं ,

मेरा मन समझ नहीं पाया |



जब तेरी शोख अदा प्रियतम,

बस जाय किसी के तन मन में |

वह  हो जाता है  आत्मलीन,

हो जाता है  अस्तित्वहीन ||



तुम सम्मुख अगर न आओगे,

लव छूकर यदि न जगाओगे |

जब तन मन से वेसुध प्रेमी,

जागेगा यही कहेगा ,फिर ||



क्या सचमुच ही तुम आये थे,

बेवश  था  देख  नहीं पाया |

वह तेरा  गुपचुप  आना था,

पागल मन समझ नहीं पाया ||





द्वितीय गीत
 
....प्रेमी मन .....
जाने क्यों मेरा प्रेमी मन ,
अकुलाता रहता है ?
यादों में तेरी, मन पंछी,
चहचाता रहता है |
तेरी ही स्वर लहरी में प्रिय,
यह गाता रहता है ||

तेरे गीतों की सरगम ही,
इस मन  को भाती है |
तेरे सुर्ख लवों की थिरकन,
मन को महकाती है |
यादें बिसरा देना चाहे,
पर न भुला पाता है |    ------जाने क्यों.....||

क्या जाने निज नीड़ से कहाँ,
यह उड़ उड़ जाता है ? 
तेरी पाती की आशा में ,
लौट लौट आता है |
प्रेम संदेशा ही मिल जाए,
बरबस मुस्काता है |
तनहाई में यादों के ही ,
स्वप्न सजाता है |
प्रेम-मिलन की यादों को,
दोहराता रहता है |     -----जाने क्यों ......||

जब जब दूर चले जाते हो ,
तुम मन की नगरी से |
छलक छलक उठता है निर्झर ,
इस मन की गगरी से |
घायल मन तो सहरा सहरा,
भटक भटक गाता है |
सागर हो या नदी किनारा,
प्यासा ही रहता है |
प्यासे तन मन को यादों से,
सहलाता रहता है |
फिर भी यह मन मेरा ,हे प्रिय!
आँखें भर लाता है |
तेरे गीतों की सरगम को ,
यह गाता रहता है |    -----जाने क्यों ....||


5 टिप्‍पणियां:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…




डॉक्टर साहब
नमस्कार !

बहुत सुंदर रचना है … बधाई और आभार !

इस शृंखला की हर कड़ी पढ़ना अपने आप में अनुभव रहेगा …
शृंगार के तीनों रूपों की प्रस्तुति निश्चय ही छंद-साधना में संलग्न मुझ जैसे विद्यार्थियों के लिए एक सुनहरा अवसर होगा …:)

आते रहेंगे …


आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद स्वर्णकार जी...आपको भी बधाई .....आते रहिये...स्वागत है श्रीमान ...

बेनामी ने कहा…

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