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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

प्रेमकाव्य-महाकाव्य. षष्ठ सुमनान्जलि (क्रमश:)-खंड ग-वियोग श्रृंगार ..गीत ८ ...डा श्याम गुप्त

                                         कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

           प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है  | अब तक प्रेम काव्य ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया गया ..तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग).. वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है..... 
                 खंड ग ..वियोग श्रृंगार --ज-पागल मन,  मेरा प्रेमी मन,  कैसा लगता है,  तनहा तनहा रात में,  आई प्रेम बहार,  छेड़ गया कोई,  कौन,  इन्द्रधनुष एवं  बनी रहे ......नौ रचनाएँ प्रस्तुत की जायंगी | प्रस्तुत है.....
  अष्ठम गीत .....
     
     'न्द्नु'
 
तुम प्यार का इन्द्रधनुष,
   नयनों में सजा लेना ।             
      मैं याद तुम्हारी प्रिय,
        इस मन में बसा लूंगा ॥

जब जब दिल चाहेगा,
        तुमसे मिलने आना ।
               यादों की थपकी दे,
                     सपनों में भुला दूंगा॥   

जब पन्छी गायेंगे,
       तेरे सुर मे गाना ।
            मैं तेरी गुन गुन को,
                     ओठों पै सजा लूंगा ॥

जब मेरे गीत, पवन-
      लहरा कर के गाये ।
           उस प्यार सुरभि को तुम,
                 सांसों में बसा लेना  ॥

जब प्यार भरे पल की,
        यादें मन भर लायें ।
             सपनों का ताज महल,
                  यादों में सजा लेना ॥

तुम प्यार का इन्द्रधनुष,
       नयनों में सजा लेना ।
           यादों की महक तेरी,
                मैं दिल में बसा लूंगा ॥




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