saahityshyamसाहित्य श्याम

VideoBar

यह सामग्री अभी तक एन्क्रिप्ट किए गए कनेक्शन पर उपलब्ध नहीं है.

यह ब्लॉग खोजें

Gadget

यह सामग्री अभी तक एन्क्रिप्ट किए गए कनेक्शन पर उपलब्ध नहीं है.

रविवार, 13 नवंबर 2011

प्रेमकाव्य-महाकाव्य. षष्ठ सुमनान्जलि (क्रमश:)-खंड ग-वियोग श्रृंगार ....अंतिम .गीत .९ ..डा श्याम गुप्त

                               कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



           प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है  | अब तक प्रेम काव्य ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया गया ..तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग).. वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है..... 
                 खंड ग ..वियोग श्रृंगार -- में नौ ९ रचनाएँ हैं  -पागल मन,  मेरा प्रेमी मन,  कैसा लगता है,  तनहा तनहा रात में,  आई प्रेम बहार,  छेड़ गया कोई,  कौन,  इन्द्रधनुष एवं  बनी रहे ......प्रस्तुत है  नवम व अंतिम गीत....बनी रहे ......
 
वह घनीभूत पीडा सी  नित  ,
जो मेरे मन में बनी रहे |
है महक पुरानी  यादों की,
बन कर इक बदली घनी रहे ||

स्वच्छंद गगन में मन मेरा,
बन कर पंछी उड़ना चाहे |
वह पीर, चांदनी का वितान,
बन, मन-अम्बर पर तनी रहे ||

जब बागों में बगरे वसंत,
तन मन चाहे सुरभित होना |
यादें बन कर मधुरिम पराग,
पीड़ा पुष्पित कर जाती हैं ||

स्वप्नों में तुम जब आते हो,
नैनों से नैन मिलाते हो |
उस प्यार भरे स्वप्निल पल में,
पलकों में ही मुस्काते हो ||

अब भी है तेरी आँखों में,
वह प्यार-पगी मीठी भाषा |
जिससे मिलती है जीवन को,
अपनेपन की नव परिभाषा ||
 
अब नहीं सुहाते वन-उपवन,
रोमांश-खुशी, उन्मुक्त गगन |
ये यादें मन की पूंजी हैं ,
चाहे बन पीड़ा घनी रहे ||

यह पीड़ा ही सुरभित होकर,
इस तन मन को महकाती है |
मीठी मीठी यह पीर सदा,
चाहूँ तन मन में बनी रहे ||

है महक पुरानी यादों की,
बनकर नित बदली घनी रहे |
यह घनीभूत पीड़ा सी नित,
इस मन-मंदिर में बनी रहे ||
 

  

2 टिप्‍पणियां:

प्रेम सरोवर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति | मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद प्रेम जी...प्रेम काव्य पर टिप्पणी हेतु...