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गुरुवार, 5 जनवरी 2012

अनुज ----प्रेमकाव्य.. अष्ठम सुमनान्जलि -सहोदर व सख्य-प्रेम..गीत १...डा श्याम गुप्त......

                                        कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


              प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा
सकता; वह एक विहंगम भाव है  | प्रस्तुत है-- अष्टम सुमनान्जलि--सहोदर व सख्य-प्रेम ...इस खंड में ...अनुज, अग्रज,  भाई-बहन,  मेरा भैया,  सखा ,  दोस्त-दुश्मन एवं दाम्पत्य ...आदि सात  रचनाएँ प्रस्तुत की जायेंगी 
 
---प्रस्तुत है प्रथम रचना...अनुज...

अनुज तुम्हारे नटखट बचपन,
     की यादें आती हैं |
घोड़े वाले   पैसे की   वो,
     गाथाएँ गाती हैं ||


दोनों हाथों में बिस्कुट ले,
मचल मचल कर हंसना |
तीन पैर की गाडी लेकर,
खट खट खट खट  चलना |

होली -गूजे, दीप-दिवाली -
    की बातें  भाती हैं |  
अनुज तुम्हारे नटखट बचपन,
     की यादें आती हैं || 


डंडे का जब बैट बनाया,
विकिट बनी दीवार |
वह क्रिकेट, गुल्ली-डंडे का ,
खेल वो सदाबहार |

टेसू के गीतों की यादें ,
   मन इठलाती हैं |
अनुज तुम्हारे नटखट बचपन,
    की यादें आती हैं ||


साथ साथ ही गए विद्यालय,
संग संग खाया खाना  |
शैतानी पर डांट दिया तो,
भूखे  ही सोजाना |

गेंद-तड़ी वह आंख मिचौली ,
     की यादें आती हैं |
अनुज तुम्हारे नटखट बचपन, 
    की यादें आती हैं ||


वो छत की चांदनी सुहानी,
खेल खेल में बेईमानी |
ताल-नहर-बरसात सुहानी,
कविता, भाषण लेख कहानी|

सावन के झूलों की यादें ,
    मन हरषाती हैं |
अनुज तुम्हारे नटखट बचपन ,
   की यादें आती हैं ||




3 टिप्‍पणियां:

India Darpan ने कहा…

अति सुंदर रचना है आपकी।
इंडिया दर्पण की ओर से नववर्ष की शुभकामनाएँ।

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut pyaari rachna.apne bachpan ke din apne bhaai bahno ke saath bitaya vaqt kabhi bhulaya nahi ja sakta.aapke blog par aakar bahut achcha laga.aap mere blog par aaye koti koti dhanyavaad.milte rahenge.

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद इन्डिया दर्पण जी व राजेश कुमारी जी.....