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मंगलवार, 20 मार्च 2012

दाम्पत्य ..प्रेम काव्य...अष्टम सुमनान्जलि--..सहोदर व सख्य-प्रेम... गीत--7 (अंतिम )...डा श्याम गुप्त

                                    कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



              प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है  | प्रस्तुत है-- अष्टम सुमनान्जलि--सहोदर व सख्य-प्रेम ...इस खंड में ...अनुज, अग्रज,  भाई-बहन,  मेरा भैया,  सखा ,  दोस्त-दुश्मन एवं दाम्पत्य ...आदि सात  रचनाएँ प्रस्तुत की जायेंगी 
---प्रस्तुत है ...सप्तम रचना ...दाम्पत्य 

ये  दुनिया हमारी,  सुहानी न होती,  
कहानी ये अपनी, कहानी न होती ।
जमीं  चाँद  तारे,   सुहाने  न  होते,
जो प्रिय तुम न होते, अगर तुम न होते ।

सुहानी ये अपनी,  सपनों की दुनिया,
चंचल सी चितवन, इशारों की दुनिया।
सुख-दुःख के बंधन, सहारों की दुनिया,
अंगना ये प्यारा, दुलारी ये दुनिया ।।

तुम्हीं ने सजाया,  संवारा, निखारा,
दिया प्यार का, जो  तुमने सहारा ।
ये दिन-रात न्यारे, ये सुख भोग सारे,
भला कैसे होते, अगर तुम न होते।।

हो सेवा या सत्ता के अधिकार सारे,
निभाता रहा मैं, ये दायित्व सारे ।
ये बच्चों का पढ़ना, गृहकार्य सारे,
सभी कैसे होते,अगर तुम न होते ।

मैं रचता रहा, ग्रन्थ कविता कहानी,
सदा खुश रहीं तुम, बनी घर की रानी ।
ये रस रूप रसना,  भव-सुख न होते ,
जो प्रिय तुम न होते,अगर तुम न होते।

न ये प्यार होता , न  इकरार होता,
न साजन की गलियाँ न सुख-सार होता।
न रस्में, न क़समें, कहानी न होतीं ,
जमाने की सारी, रवानी न होतीं ।

कभी ख़ूबसूरत भटकन जो आई,
तेरे प्यार की मन में खुशबू समाई ।
अगर तुम न होते, तो कैसे सम्हलते,
बलाओं से कैसे, यूं बच के निकलते।।  

सभी रिश्ते-नाते, गुण जो  हैं गाते ,
भला कैसे गाते, जो तुम ना निभाते ।
ये छोटी सी बगिया, परिवार अपना,
सुघड़ कैसे होता, जो तुम ना सजाते ।।

ये ऊंचाइयों के शिखर,  ये  सितारे,
धन-सम्पति, संतति, सभी वारे-न्यारे।
प्रशस्ति या गुण-गान, तेरी ही माया ,
कहाँ सब ये होते, अगर तुम न होते ।।

वो दुर्दिन भी आये,  विपदा घनेरी,
कमर कसके तुमने निभाया सदा ही ।
कभी धैर्य मेरा भी डिगने लगा तो,
अडिग पर्वतों सी थी, तेरी अदा ही ।।

हमारी सफलता की सारी कहानी,
तेरे  प्रेम की नीति की सब निशानी ।
ये  सुन्दर  कथाएं, फ़साने न होते,
सजनि! तुम न होते, यदि तुम न होते ।।

प्रशस्ति तुम्हारी जो जग ने बखानी ,
कि तुम प्यार-ममता की मूरत-निशानी ।
ये अहसान तेरा,  सारे  ही   जग पर,
तथा त्याग, दृड़ता की सारी कहानी ।।

ज़रा  सोचलो, कैसे परवान चढते,
हमीं जो न होते,जो सखि ! हम न होते ।
हमीं  हैं  तो तुम हो,  सारा  जहां है,
जो तुमहो तो हम हैं सारा जहां है ।।

अगर हम न लिखते, हम जो न कहते,
भला गीत कैसे,  तुम्हारे ये बनते ?
किसे रोकते तुम, किसे टोकते तुम,
ये इसरार, इनकार, तुम कैसे करते ।।

न संसार होता, ये  भव-सार होता,
कहीं कुछ न होता, जो हम-तुम न होते।
हमीं  है तभी है ,  ईश्वर और   माया,
खुदा भी न होता, जो हम-तुम न होते ।।

कहानी  हमारी - तुम्हारी न होती,
न ये गीत होते,  न संगीत होता ।
सुमुखि! तुम अगर जो  हमारे न होते,
सजनि! जो अगर हम तुम्हारे न होते ।।

                                         ---- अष्ठम सुमनांजलि समाप्त ....क्रमश नवम सुमनांजलि ...




 





2 टिप्‍पणियां:

India Darpan ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....

इंडिया दर्पण की ओर से नव संवत्सर व नवरात्रि की शुभकामनाएँ।

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद ...इन्डियन दर्पण जी..


आपको भी नव-संवत्सर की शुभ कामनायें.....