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बुधवार, 4 जुलाई 2012

परमानंद ---प्रेम-काव्य ..दशम सुमनांजलि ..अंतिम रचना....डा श्याम गुप्त

                                           कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

               प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है  | प्रस्तुत है-- दशम  सुमनान्जलि- अध्यात्म  ----इस सुमनांजलि में पांच  रचनाएँ....तुच्छ बूँद सा जीवन,  प्रभु ने जो यह जगत बनाया, अहं-ब्रह्मास्मि ,  
ब्रह्म-प्राप्ति  तथा  परमानंद ...प्रस्तुत की जायंगी | प्रस्तुत है ...पंचम व  दशम सुमनांजलि की अंतिम   रचना... परमानंद .....
सब  सुख साधन प्राप्त तुझे हैं ,
सब सुख जग के पाए |
फिर  भी तू अंतर्मन मेरे,                          
शान्ति नहीं क्यों पाए ?
धन  पद वैभव रूप खजाने ,
प्रेम-प्रीति परिवार सुहाने |
रीति-नीति सुख,सुखद सुजाने,
सब तो तूने पाए |

फिर भी तू अंतर्मन मेरे,
 शान्ति नहीं क्यों पाए ||

पढ़ पढ़ कर सब वेद-उपनिषद ,
विविध शास्त्र, विज्ञान-ज्ञान सब |
प्रेम-गीत, जग रीति, मधुर स्वर,
भक्ति-गीत सब गाये |

मन में कितना अहं सजाये,
इच्छाओं की गाँठ बसाए |
चाहे भक्ति-मुक्ति ही चाहे ,
चैन नहीं तू पाए |

फिर भी  तू अंतर्मन मेरे,
शान्ति  नहीं क्यों पाए ||

इच्छाओं की गाँठ कटे जब,
अहं-भाव की फांस मिटे जब |
कर्तापन का दंभ हटे जब,
मुक्ति  तभी होपाये |

परम शान्ति मिल जाए,
मन में परमानंद समाये ||





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