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बुधवार, 29 जुलाई 2015

शल्य निसृत शायरी----- डा सुलतान शाकिर हाशमी ......कुछ शायरी की बात होजाए ----

                                           कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित
 
  


                         शल्य निसृत शायरी   
                           (ड़ा सुलतान शाकिर हाशमी )
   
          डा श्यामगुप्त जो कि एक सुप्रसिद्ध शल्य-चिकित्सक एवं सफल साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं, इन्होंने ‘सृष्टि’, शूर्पणखा, प्रेमकाव्य जैसे वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं पौराणिक महाकाव्य, महिला सशक्तीकरण पर ‘इन्द्रधनुष’ जैसे उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण’ जैसे शास्त्रीय छंद-विधान आदि कृतियों तथा उनकी पत्नी श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत कृति ‘ब्रज बांसुरी’ के द्वारा साहित्य जगत को माधुर्य रूप प्रस्तुत करके अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे हैं, जो कि अनंतता का प्रतीक है |
         अब डा श्यामगुप्त जी की एक और कृति, ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ प्रस्तुत है जो कि एक सुन्दर प्रस्तुति है | ये सुन्दर होने के साथ-साथ मनोहर एवं प्रभावी ग़ज़लों का एक ऐसा हसीन गुलदस्ता है जिसमें भाव–वैविध्य की भीनी-भीनी महक पाठक को अपनी और आकर्षित करने में समर्थ है | इनकी ग़ज़लों में प्रेम, त्याग, हालात, इश्क-मोहब्बत, समाज में फ़ैली हुई कुरीतियों का वर्णन बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है | सभी गज़लें अच्छी हैं बल्कि कुछ अशआर तो बहुत सुन्दर हैं जो जनमानस पटल पर छाप छोड़ते नज़र आते हैं | इनकी ग़ज़लों को पढ़ते-पढ़ते भाषा की सरलता और दिल को मोह लेने वाले शब्दों में डूब जाने का मन होता है |
       मैंने जब डा श्यामगुप्त जी के इस ग़ज़ल संग्रह को पढ़ना शुरू किया तो मन के कटु यथार्थ को स्पर्श करती ये गज़लें समकालीन सन्दर्भों को भी बड़ी बारीकी के साथ व्यंजित करतीं हमें नज़र आईं | मुझे इनके इस ग़ज़ल-संग्रह में देश और समाज के लिए पीड़ा का सागर एवं प्रणय संवेदनाओं का सफल चित्रण साफ़-शफ्फाक नज़र आता है और जीवन-जगत की प्रौढ़ अनुभूतियों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति विशेष रूप से नज़र आती है |
       डा श्यामगुप्त जी ने स्वयं लिखा है, “शायरी, अरबी फारसी एवं उर्दू जुबान की काव्य-कला है जिसमें ग़ज़ल की लोकप्रियता सबसे अधिक पायी जाती है...|” मैं समझता हूँ किसी लोकप्रिय विधा में कलम उठाना बहुत कठिन कार्य है, क्योंकि हर लोकप्रिय वस्तु का सीधा सम्बन्ध दिल से होता है, जो किसी अच्छी बात पर जितनी जल्दी खुश होता है तो उतनी ही जल्द उसके टूटने की भी संभावना बनी रहती है, इसलिए ग़ज़ल कहना जितना आसान है उतना ही मुश्किल भी |  डा श्यामगुप्त जी लिखते हैं तो ऐसा महसूस होता है की हर शब्द उनके ज़ज्वात को बयाँ
    कर रहा है जिसमें ज़िंदगी का सुबहाना चित्रण भी दिखाई देता है और हालात की कडुवाहट भी नज़र आती है | जैसे ये शे’र देखिये----
“ये ग़ज़ल कितनी प्यारी है,
गोया ज़िंदगी ने संवारी है |”
        ***
“ज़िंदगी एक ग़ज़ल है, तरन्नुम से जिया जाए,
न हो साकी तो, बिन पैमाना ही पिया जाए | “
       उनकी नज़र में रूह का बोझ इतना अधिक होता है जिसे कमजोर काँधे नहीं उठा सकते, जिसे डा श्याम गुप्त इस तरह से अपने अशआर में पेश करते हैं ---
“जहाँ था दिल वहीं रखदो,
हाथ का जाम यहीं रखदो |
     ***
थक गए हैं अब काँधे,
रूह का बोझ कहीं रख दो |”

       डा श्याम गुप्त जी समाज में फ़ैली हुई अश्लीलता और समाज की बुराइयां पर तमाशबीनों की तरह लोगों की खामोशी को इस तरह बयाँ करते हैं----
“लोग आखिर ये बात कब समझेंगे,
बदले शहर के हालात, कब समझेंगे |

ये है तमाशबीनों का शहर यारो,
कोइ ने देगा साथ, कब समझेंगे |

बढ़ रही अश्लीलता सारे शहर में,
सब सो रहे चुपचाप, कब समझेंगे |

          डा श्याम गुप्त जी अपने हौसले और हिम्मत को इस तरह अपने अशआर में बयाँ करते हैं जैसे हकीकत बयाँ कर रहे हों | वह हर व्यक्ति को आज टूटते हुए आईने की तरह देखते हैं, दुश्मन को दोस्त बनाने का पैगाम देते हुए आतंक की फसल पर ख़ूबसूरत कटाक्ष इस तरह से करते हैं-----



  
“यूं तो खारों से ही अपनी आशनाई है ,
आंधियां भी तो सदा हमको रास आयीं हैं |

आशिकी उससे करो,श्याम हो दुश्मन कोई ,
दोस्त दुश्मन को बनाए वो आशनाई है |
      ******
टूटते आईने सा हर व्यक्ति यहाँ क्यों है,
हैरान सी नज़रों के ये अक्स यहाँ क्यों हैं |

तुलसी सूर गालिव की सरजमीं ये श्याम,
आतंक की फसल सरसब्ज़ यहाँ क्यों है |     
 ****
मिली हवाओं में उड़ने के ये सज़ा यारो,
कि मैं जमीं के रिश्तों से कट गया यारो|

आधुनिक दौर है बोतल का नीर पीते हैं,
नीर नदियों का तो कीचड से पट गया यारो |
       डा श्याम गुप्त जल-जीवन का राग अलापने वालों को और लम्बी-लम्बे बातें करने वालों को इस अशआर के द्वारा ख़ूबसूरत पैगाम इस तरह देते हैं---
“गली सड़क चौराहों के गड्ढे भर नहीं पाए हैं,
चाँद पर घर बसाने के ख़्वाब लाये हैं|
    
ढूँढने चले हैं जल और जीवन मंगल पर,
पृथ्वी के जल को सुधार नहीं पाए हैं |”
            डा श्याम गुप्त जहां इश्क-मोहब्बत को अपनी शायरी का दर्पण बनाते हैं वहीं मय व जाम पर भी जौहर दिखाते हुए नज़र आते हैं ----
“तुम जो कहते हो कि पीने की क्या ज़रुरत है,
गोया कहते हो कि जीने की क्या ज़रुरत है |

इश्के-दरिया के तूफाँ में गर्क होते हैं ,
आप कहते हैं सफीने की क्या ज़रुरत है |






         इसी तरह डा गुप्त उर्दू शायरी की एक और विधा ‘नज़्म’ को अपनाते हुए कहते हैं ----
“किस अदा से मेरी नज़्म को गुनगुनाया ज़नाब,
ओठों पे खिलखिला उठे जैसे कई गुलाब  |”
             
             डा श्याम गुप्त ने ‘आज़ाद नज्में’, रुबाइयां, कतआ, आज़ाद शे’र कहके उर्दू शायरी की हर विधा पर अपनी कलम दौडाने का एक सफल प्रयास किया है | इसलिए मैं कह सकता हूँ कि डा श्याम गुप्त जीवन, समाज एवं उर्दू साहित्य के विभिन्न पक्षों और विधाओं को प्रभावशाली ढंग से रखने में कामयाब रहे हैं और उन्होंने ग़ज़ल, रुबाई, आज़ाद शे’र ,आज़ाद नज्में एवं नज़्म के तेबर के अनुकूल शब्दों का प्रयोग किया है और एक बार फिर वह लोकप्रिय शायरी साहित्य को देने में सफल रहे हैं | मैं उनको इस अद्वितीय कृति के लिए बधाई देता हूँ और ईश्वर से कामना करता हूँ कि उनका कलम इसी प्रकार साहित्य की सेवा में तत्पर रहे |

डा सुलतान शाकिर हाशमी
पूर्व सलाहकार सदस्य,
योजना आयोग, भारत सरकार
१३३/१३.नजीराबाद , लखनऊ
मो. ९२३६०५३१६९—८०९०३०१४७१ ...







 

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