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गुरुवार, 30 जुलाई 2015

कुछ शायरी की बात होजाए ---डा श्याम गुप्त ...

                                            कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

Drshyam Gupta's photo.
                     










                     
                                मेरी सद्य प्रकाशित कृति--कुछ शायरी की बात होजाए

बात मेरी न सुने सारा ज़माना चाहे
चंद जाहिद तो सुनेंगे औ सुधर जायेंगे | ---ड़ा श्याम गुप्त

  ----आभार---
                            उन सभी नामचीन्ह, गुमनाम, अनाम, बेनाम शायरों-शायराओं, उस्तादों, ग़ज़लगो, गज़लनवीसों, ग़ज़लकारों का जिनकी शायरी व गज़लें सुनते-पढ़ते शायरी व ग़ज़ल में रूचि, समझ व कहने-लिखने की इच्छा जागृत हुई |                                          ----- ड़ा श्याम गुप्त ..
 
------मूल कथ्य -----

-------जब मैंने विभिन्न शायरों की शायरी—गज़लें व नज्में आदि सुनी-पढीं व देखीं विशेषतया गज़ल...जो विविध प्रकार की थीं..बिना काफिया, बिना रदीफ, वज्न आदि का उठना गिरना आदि ...तो मुझे ख्याल आया बस लय व गति से गाते चलिए, गुनगुनाते चलिए गज़ल बनती चली जायगी | कुछ फिसलती गज़लें होंगी कुछ भटकती ग़ज़ल| हाँ लय गति यति युक्त गेयता व भाव-सम्प्रेषणयुक्तता तथा सामाजिक-सरोकार युक्त होना चाहिए और आपके पास भाषा, भाव, विषय-ज्ञान व कथ्य-शक्ति होना चाहिए|
बस गाते-गुनगुनाते जो गज़ले-नज्में आदि बनतीं गयीं... जिनमें ‘त्रिपदा-अगीत गज़ल’, अति-लघु नज़्म आदि कुछ नए प्रयोग भी किये गए है.. यहाँ पेश हैं...मुलाहिजा फरमाइए ........
                                                                                                         ------डा श्याम गुप्त
--------परम सत्ता नमन ---- ( वंदना )

बड़े बड़ों के ढीले सुर - तेवर होजाते हैं |
क्या तिनका क्या गर्वोन्नत गिरि नत होजाते हैं |

कुछ भी तेरे हाथ नहीं रे नर तू फिर क्यों ऐंठा,
उस असीम के आगे अबके सिर झुक जाते हैं |

हमने बड़े बड़े बलशाली पर्वत-गिरि देखे ,
बरसे पानी कड़के बिजली सब ढह जाते हैं|

आंधी बिजली तूफानों ने तेवर खूब दिखाए
मन की दृढ़ता के आगे वे क्या कर पाते हैं |

चाहे जितना राग-द्वेष , छल-छंद करे कोई
सत्य राह के आगे सब नत सिर होजाते हैं |

तूफानों के बीच भंवर में नैया डगमग डोले
मांझी के मज़बूत इरादे खेकर ले जाते हैं|

सत पौरुष बल मन की दृढ़ता, अपने निज पे भरोसा
हो ईश्वर पर श्रृद्धा तब ये गुण मिल पाते हैं |

वही भरोसा बल है सत है वही आत्मविश्वास
उसे भूलते अहं-भाव रत, कष्ट उठाते हैं|

जिसके आगे बड़े बड़ों की अकड नहीं चल पाए ,
श्याम' परमसत्ता के आगे शीश झुकाते हैं||

बुधवार, 29 जुलाई 2015

शल्य निसृत शायरी----- डा सुलतान शाकिर हाशमी ......कुछ शायरी की बात होजाए ----

                                           कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित
 
  


                         शल्य निसृत शायरी   
                           (ड़ा सुलतान शाकिर हाशमी )
   
          डा श्यामगुप्त जो कि एक सुप्रसिद्ध शल्य-चिकित्सक एवं सफल साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं, इन्होंने ‘सृष्टि’, शूर्पणखा, प्रेमकाव्य जैसे वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं पौराणिक महाकाव्य, महिला सशक्तीकरण पर ‘इन्द्रधनुष’ जैसे उपन्यास एवं ‘अगीत साहित्य दर्पण’ जैसे शास्त्रीय छंद-विधान आदि कृतियों तथा उनकी पत्नी श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत कृति ‘ब्रज बांसुरी’ के द्वारा साहित्य जगत को माधुर्य रूप प्रस्तुत करके अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे हैं, जो कि अनंतता का प्रतीक है |
         अब डा श्यामगुप्त जी की एक और कृति, ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ प्रस्तुत है जो कि एक सुन्दर प्रस्तुति है | ये सुन्दर होने के साथ-साथ मनोहर एवं प्रभावी ग़ज़लों का एक ऐसा हसीन गुलदस्ता है जिसमें भाव–वैविध्य की भीनी-भीनी महक पाठक को अपनी और आकर्षित करने में समर्थ है | इनकी ग़ज़लों में प्रेम, त्याग, हालात, इश्क-मोहब्बत, समाज में फ़ैली हुई कुरीतियों का वर्णन बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है | सभी गज़लें अच्छी हैं बल्कि कुछ अशआर तो बहुत सुन्दर हैं जो जनमानस पटल पर छाप छोड़ते नज़र आते हैं | इनकी ग़ज़लों को पढ़ते-पढ़ते भाषा की सरलता और दिल को मोह लेने वाले शब्दों में डूब जाने का मन होता है |
       मैंने जब डा श्यामगुप्त जी के इस ग़ज़ल संग्रह को पढ़ना शुरू किया तो मन के कटु यथार्थ को स्पर्श करती ये गज़लें समकालीन सन्दर्भों को भी बड़ी बारीकी के साथ व्यंजित करतीं हमें नज़र आईं | मुझे इनके इस ग़ज़ल-संग्रह में देश और समाज के लिए पीड़ा का सागर एवं प्रणय संवेदनाओं का सफल चित्रण साफ़-शफ्फाक नज़र आता है और जीवन-जगत की प्रौढ़ अनुभूतियों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति विशेष रूप से नज़र आती है |
       डा श्यामगुप्त जी ने स्वयं लिखा है, “शायरी, अरबी फारसी एवं उर्दू जुबान की काव्य-कला है जिसमें ग़ज़ल की लोकप्रियता सबसे अधिक पायी जाती है...|” मैं समझता हूँ किसी लोकप्रिय विधा में कलम उठाना बहुत कठिन कार्य है, क्योंकि हर लोकप्रिय वस्तु का सीधा सम्बन्ध दिल से होता है, जो किसी अच्छी बात पर जितनी जल्दी खुश होता है तो उतनी ही जल्द उसके टूटने की भी संभावना बनी रहती है, इसलिए ग़ज़ल कहना जितना आसान है उतना ही मुश्किल भी |  डा श्यामगुप्त जी लिखते हैं तो ऐसा महसूस होता है की हर शब्द उनके ज़ज्वात को बयाँ
    कर रहा है जिसमें ज़िंदगी का सुबहाना चित्रण भी दिखाई देता है और हालात की कडुवाहट भी नज़र आती है | जैसे ये शे’र देखिये----
“ये ग़ज़ल कितनी प्यारी है,
गोया ज़िंदगी ने संवारी है |”
        ***
“ज़िंदगी एक ग़ज़ल है, तरन्नुम से जिया जाए,
न हो साकी तो, बिन पैमाना ही पिया जाए | “
       उनकी नज़र में रूह का बोझ इतना अधिक होता है जिसे कमजोर काँधे नहीं उठा सकते, जिसे डा श्याम गुप्त इस तरह से अपने अशआर में पेश करते हैं ---
“जहाँ था दिल वहीं रखदो,
हाथ का जाम यहीं रखदो |
     ***
थक गए हैं अब काँधे,
रूह का बोझ कहीं रख दो |”

       डा श्याम गुप्त जी समाज में फ़ैली हुई अश्लीलता और समाज की बुराइयां पर तमाशबीनों की तरह लोगों की खामोशी को इस तरह बयाँ करते हैं----
“लोग आखिर ये बात कब समझेंगे,
बदले शहर के हालात, कब समझेंगे |

ये है तमाशबीनों का शहर यारो,
कोइ ने देगा साथ, कब समझेंगे |

बढ़ रही अश्लीलता सारे शहर में,
सब सो रहे चुपचाप, कब समझेंगे |

          डा श्याम गुप्त जी अपने हौसले और हिम्मत को इस तरह अपने अशआर में बयाँ करते हैं जैसे हकीकत बयाँ कर रहे हों | वह हर व्यक्ति को आज टूटते हुए आईने की तरह देखते हैं, दुश्मन को दोस्त बनाने का पैगाम देते हुए आतंक की फसल पर ख़ूबसूरत कटाक्ष इस तरह से करते हैं-----



  
“यूं तो खारों से ही अपनी आशनाई है ,
आंधियां भी तो सदा हमको रास आयीं हैं |

आशिकी उससे करो,श्याम हो दुश्मन कोई ,
दोस्त दुश्मन को बनाए वो आशनाई है |
      ******
टूटते आईने सा हर व्यक्ति यहाँ क्यों है,
हैरान सी नज़रों के ये अक्स यहाँ क्यों हैं |

तुलसी सूर गालिव की सरजमीं ये श्याम,
आतंक की फसल सरसब्ज़ यहाँ क्यों है |     
 ****
मिली हवाओं में उड़ने के ये सज़ा यारो,
कि मैं जमीं के रिश्तों से कट गया यारो|

आधुनिक दौर है बोतल का नीर पीते हैं,
नीर नदियों का तो कीचड से पट गया यारो |
       डा श्याम गुप्त जल-जीवन का राग अलापने वालों को और लम्बी-लम्बे बातें करने वालों को इस अशआर के द्वारा ख़ूबसूरत पैगाम इस तरह देते हैं---
“गली सड़क चौराहों के गड्ढे भर नहीं पाए हैं,
चाँद पर घर बसाने के ख़्वाब लाये हैं|
    
ढूँढने चले हैं जल और जीवन मंगल पर,
पृथ्वी के जल को सुधार नहीं पाए हैं |”
            डा श्याम गुप्त जहां इश्क-मोहब्बत को अपनी शायरी का दर्पण बनाते हैं वहीं मय व जाम पर भी जौहर दिखाते हुए नज़र आते हैं ----
“तुम जो कहते हो कि पीने की क्या ज़रुरत है,
गोया कहते हो कि जीने की क्या ज़रुरत है |

इश्के-दरिया के तूफाँ में गर्क होते हैं ,
आप कहते हैं सफीने की क्या ज़रुरत है |






         इसी तरह डा गुप्त उर्दू शायरी की एक और विधा ‘नज़्म’ को अपनाते हुए कहते हैं ----
“किस अदा से मेरी नज़्म को गुनगुनाया ज़नाब,
ओठों पे खिलखिला उठे जैसे कई गुलाब  |”
             
             डा श्याम गुप्त ने ‘आज़ाद नज्में’, रुबाइयां, कतआ, आज़ाद शे’र कहके उर्दू शायरी की हर विधा पर अपनी कलम दौडाने का एक सफल प्रयास किया है | इसलिए मैं कह सकता हूँ कि डा श्याम गुप्त जीवन, समाज एवं उर्दू साहित्य के विभिन्न पक्षों और विधाओं को प्रभावशाली ढंग से रखने में कामयाब रहे हैं और उन्होंने ग़ज़ल, रुबाई, आज़ाद शे’र ,आज़ाद नज्में एवं नज़्म के तेबर के अनुकूल शब्दों का प्रयोग किया है और एक बार फिर वह लोकप्रिय शायरी साहित्य को देने में सफल रहे हैं | मैं उनको इस अद्वितीय कृति के लिए बधाई देता हूँ और ईश्वर से कामना करता हूँ कि उनका कलम इसी प्रकार साहित्य की सेवा में तत्पर रहे |

डा सुलतान शाकिर हाशमी
पूर्व सलाहकार सदस्य,
योजना आयोग, भारत सरकार
१३३/१३.नजीराबाद , लखनऊ
मो. ९२३६०५३१६९—८०९०३०१४७१ ...







 

'कुछ शायरी की बात होजाए ' १.अपनी ही चाल ढालते हम शायरी रहे -सुषमा गुप्ता ...

                                             कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

मेरी सद्य प्रकाशित पुस्तक' ---कुछ शायरी की बात होजाए '----





 

अपनी ही चाल ढालते हम शायरी रहे ---- श्रीमती सुषमा गुप्ता..                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     
                  सदैव की भांति प्रस्तुत कृति में भी डा श्यामगुप्त की साहित्य व कविता में रूढ़िवादिता के प्रति विद्रोही प्रवृत्ति, नवीनता के प्रति ललक एवं नए-नए प्रयोगों की भावभूमि परिलब्ध है | साहित्य, दर्शन, धर्म, अद्यात्म की अभिरुचि संपन्न एवं स्वतन्त्रता-संग्राम के क्रांतिकारियों के साथी-सद्भावी रहे पिता के पुत्र होने के नाते उनमें अव्यवस्था, असामाजिकता, रूढ़िवादिता आदि के विरुद्ध विद्रोह के स्वर सहज स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं और विज्ञान के छात्र होने के नाते नवीनता व प्रगतिशीलता के विचारों व स्थापनाओं के | वे साहित्य के मूल भाव… भाव-प्रवणता, सामाजिक-सरोकार, जन-आचरण संवर्धन एवं प्रत्येक प्रकार की प्रगतिशीलता, नवीनता के संचरण, गति-प्रगति के हामी हैं | कविता के मूल गुण – गेयता, लयबद्धता, प्रवाह, सहज़-सम्प्रेषणीयता के समर्थन के साथ-साथ डा श्यामगुप्त सिर्फ छंदीय कविता, सिर्फ सनातनी छंद, गूढ़ शास्त्रीयता एवं शायरी–ग़ज़लों में भी पुरानी रूढ़िवादिता व लीक पर ही चलते रहने के हामी नहीं हैं अपितु नवीन प्रयोगों व स्थापनाओं को काव्य, साहित्य व समाज की उन्नति-प्रगति हेतु आवश्यक मानते हैं जो विभिन्न समारोहों में उनके वक्तव्यों, कथनों, रचनाओं, आलेखों, कहानियों, समीक्षाओं व अंतरजाल पर ब्लोगों पर यथातथ्य टिप्पणियों से प्रदर्शित होता है | परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि साहित्य व काव्य को मूल उद्देश्यों व गुणों से विरत कर दिया जाए, नवीनता के नाम पर मात्राओं-पंक्तियों को जोड़-तोड़ कर, विचित्र-विचित्र शब्दाडंबर, तथ्यविहीन कथ्य, विरोधाभासी कथ्य आदि को प्रश्रय दिया जाय| 

    उनका कथन है कि ---
                     ‘साहित्य सत्यम शिवम् सुन्दर भाव होना चाहिए,
                      साहित्य शुभ शुचि ज्ञान पारावार होना चाहिए |’

                    ‘ श्याम’ मतलब सिर्फ होना शुद्धतावादी नहीं ,
                      बहती दरिया रहे पर तटबंध होना चाहिए |’

       
उनके अनुसार साहित्य की प्रत्येक विधा पर अधिकार होना एवं नए-नए  प्रयोग व स्थापनाओं से सम्बद्ध होना एक संपूर्ण साहित्यकार का गुण है| आपने स्वयं कई नवीन तुकांत व अतुकांत छंदों की सर्जना की है एवं वे अतुकांत कविता की एक विशिष्ट शाखा, अगीत-विधा, के भी पूर्ण समर्थक हैं जिसे अधिकांश सामान्य रूढ़िवादी साहित्यकार अछूत समझते रहे हैं| जिसका छंद–विधान ‘अगीत साहित्य दर्पण’ भी आपने लिखा है|
         प्रस्तुत कृति में भी उनका ये स्वर मुखरित है | मूलतः शायरी व ग़ज़ल के कठोर नियमों व कलेवर आदि की लीक पर ही चलते रहना उन्हें अभीष्ट नहीं | काव्य के मूल गुण- गेयता, लय. प्रवाह, भाव व अर्थ-स्पष्टता को वे यथेष्ट मानते हैं, जब वे कहते हैं...
         ‘यदि चाहते हैं दिल से निकले गीत-ग़ज़ल,
         तो उसे नियमों की अति से न लादा जाए |’     एवं.....

         ‘मतला बगैर हो ग़ज़ल हो रदीफ़ भी नहीं,
         यह तो ग़ज़ल नहीं ये कोई  वाकया नहीं |’

अपनी नवीनताओं, स्थापनाओं को वे स्पष्ट करते भी हैं....

        ‘अपनी ही चाल ढालते ग़ज़लों को हम रहे,
         पैमाना  कोई नहीं, कोई  साकिया  नहीं |’ 

      हमें स्वयं शायरी-ग़ज़लों के शिल्प आदि का विशिष्ट ज्ञान नहीं है, हाँ गा लेते हैं अतः हमारे द्वारा ये विविध विषयक रचनाएँ समारोहों, गोष्ठियों, मंचों पर गाई जाती रही हैं | इस प्रकार गेयता ही इन रचनाओं का मूल भाव है जैसा लेखक ने स्वयं कहा है ...

       ‘लय गति हो ताल सुर सुगम, आनंदरस बहे,
        वह भी ग़ज़ल है, चाहे कोइ काफिया नहीं |’

मुझे आशा है इन्हें पढ़कर विज्ञजनों एवं पाठकों को अवश्य आनंदरस की अनुभूति मिलेगी |

सुषमा गुप्ता
सुश्यानिदी, के-३४८. आशियाना, लखनऊ .
 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

कुछ शायरी की बात होजाए ..ग़ज़ल...सरस्वती वन्दना ...डा श्याम गुप्त .....

                                      

                                     कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


             मेरी शीघ्र प्रकाश्य शायरी संग्रह....." कुछ शायरी की बात होजाए ".... से  ग़ज़ल, नज्में  इस ब्लॉग पर प्रकाशित की जायंगी ......प्रस्तुत है..द्वितीय रचना ....सरस्वती वन्दना ..ग़ज़ल में ...    सरस्वती वन्दना  ....
 
वन्दना  के स्वर ग़ज़ल में कह सकूं माँ शारदे !
कुछ शायरी  के भाव का भी ज्ञान दो माँ शारदे ! 
 
माँ की कृपा यदि हो न तो कैसे ग़ज़ल साकार हो,
कुछ कलमकारी का मुझे भी भान हो  माँ शारदे !
 
मैं जीव, माया बंधनों में स्वयं को भूला हुआ,
नव स्वर लहरियों से हे माँ! ह्रद-तंत्र को झंकार दे |
 
मैं स्वयं को पहचान लूं उस आत्मतत्व को जान लूं,
अंतर में अंतर बसे उस परब्रह्म को गुंजार दे |

हे श्वेत कमलासना माँ !, हे श्वेत वस्त्र से आवृता,
वीणा औ पुस्तक कर धरे,नत नमन लो माँ शारदे !

मैं बुद्धिहीन हूँ काव्य-सुर का ज्ञान भी मुझको नहीं ,
उर ग़ज़ल के स्वर बह सकें कर वीणा की टंकार दे |

ये वन्दना के स्वर-सुमन अर्पण हैं माँ स्वीकार लो ,
हो धन्य जीवन श्याम'का बस कृपा हो माँ शारदे ||