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बुधवार, 2 मार्च 2016

हिन्दी काव्य में मुक्तवृत्त एवं जागृत और उन्नतिशील साहित्य हेतु स्व-बलि देने वाले युग दृष्टा कवि डा रंगनाथ मिश्र सत्य ... डा श्याम गुप्त ...

                                          कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



साहित्यकार दिवस पर डा श्याम गुप्त द्वारा प्रस्तुत किया गया आलेख-----

हिन्दी काव्य में मुक्तवृत्त एवं जागृत और उन्नतिशील साहित्य हेतु स्व-बलि देने वाले युग दृष्टा कवि डा रंगनाथ मिश्र सत्य ...

                   हिन्दी काव्य क्षेत्र में मुक्तवृत्त का पदार्पण 'निराला' के साथ हुआ। 'निराला' की उद्दाम भाव धारा को छंद के बन्धन बाँध नहीं सके। गिनी-गिनाई मात्राओं और अन्त्यानुप्रासों के बँधे घाटों-किनारों के बीच उनका भावोल्लास नहीं समा सकता था। ऐसी स्थिति में काव्याभिव्यक्ति के लिए मुक्तवृत्त की अनिवार्यता होती है। उन्होंने कहा है- "भावों की मुक्ति छन्दों की मुक्ति चाहती है।“ 'परिमल' की भूमिका में निराला कहते हैं---
"मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्य की मुक्ति कर्म के बन्धन में छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छन्दों के शासन से अलग हो जाना है।

                             कृत्रिम छन्दोबद्ध रचना के विरुद्ध यह नवीन उन्मेषशील काव्य की पहली विद्रोह वाणी थी | भाव-व्यंजना की दृष्टि से मुक्तछन्द कोमल और परुष दोनों प्रकार की भावाभिव्यक्ति के लिए समान रूप से समर्थ हैं | आज मुक्तछन्द काव्य-रचना का मुख्य छन्द है |

                  इस प्रकार 'निराला' भारतीय संस्कृति-साहित्य के द्रष्टा कवि हैं| उन्हें काव्य तथा जीवन में निरन्तर रुढ़ियों का मूलोच्छेद करते हुए अनेक संघर्षों का अपने स्वाभिमान बलि के स्तर तक सामना करना पड़ा। हिन्दी के लिए 'निराला' को यह बलि देनी पड़ी।

                 पश्च निराला युग में हिन्दी-साहित्य ने एक और नवीन उन्मेषशील दृष्टा कवि व साहित्यकार डा रंगनाथ मिश्र सत्य को जन्म दिया| साहित्य की सभी धाराओं-विधाओं में सक्षम कवि डा रंगनाथ मिश्र सत्य की भाव धारा को भी छंद के बन्धन बाँध नहीं सके। उन्हें भी रुढ़ियों का विरोध करते हुए करते हुए अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा, वही सब कुछ झेलना पडा, जब छटवें दशक में उनके द्वारा स्थापित, आज के वैज्ञानिक युग की आवश्यकता हेतु लम्बे अतुकांत छंदों, गीतों के साथ-साथ संक्षिप्त, केवल ५ से १० पंक्तियों में निबद्ध अतुकांत–कविता—“अगीत” का पदार्पण हुआ| छन्दोबद्ध रचना के विरुद्ध यह नवीन उन्मेषशील काव्य की द्वितीय विद्रोह वाणी थी| यह वह युग था जब हिन्दी साहित्य ही नहीं विश्व-साहित्य भी अनिश्चितता व दिशाहीनता की स्थिति से गुजर रहा था | संक्षिप्तता व वैज्ञानिकता के युग में छंदोबद्ध तुकांत कविता एवं लम्बे लम्बे गीतों, कविताओं का स्वप्निल संसार टूटता जारहा था |

                            अगीत की अवधारणा मानव द्वारा आनंदातिरेक में लयबद्ध स्वर में बोलना प्रारम्भ करने के साथ ही स्थापित होगई थी| विश्व भर के काव्य-ग्रंथों व समृद्धतम संस्कृत भाषा साहित्य में अतुकांत गीत, मुक्त छंद या अगीत, मन्त्रों, ऋचाओं व श्लोकों के रूप में सदैव ही विद्यमान रहे हैं| लोकवाणी एवं लोक-साहित्य में भी अगीत कविता भाव सदैव उपस्थित रहा है |

                              वस्तुतः कविता वैदिक, पूर्व-वैदिक, पश्च-वैदिक व पौराणिक युग में भी सदैव मुक्त-छंद रूप ही थी| कालान्तर में मानव सुविधा स्वभाव वश, चित्रप्रियता वश- राजमहलों, संस्थानों, राजभवनों, बंद कमरों में सुखानुभूति प्राप्ति हित कविता छंद शास्त्र के बंधनों व पांडित्य प्रदर्शन के बंधन में बंधती गयी | नियंत्रण और अनुशासन प्रबल होता गया तथा वन-उपवन में मुक्त, स्वच्छंद विहरण करती कविता-कोकिला, गमलों व वाटिकाओं में सजे पुष्पों की भांति बंधनयुक्त होती गयी तथा स्वाभाविक, हृदयस्पर्शी, निरपेक्ष काव्य, विद्वता प्रदर्शन व सापेक्ष कविता में परिवर्तित होता गया और साथ-साथ ही राष्ट्र, देश, समाज, जाति भी बंधनों में बंधते गए |

                            लंबी-लंबी कविताओं में आगे के आधुनिक युग की आवश्यकता--संक्षिप्तता, सरलता, सहजता सुरुचिकरता आदि आधुनिक परिस्थिति के काव्य की क्षमता के साथ तीब्र भाव-सम्प्रेषण व सामाजिक सरोकारों का उचित समाधान वर्णन व प्रस्तुति का अभाव था| इन्हीं विशिष्ट अभावों की पूर्ती हित के साथ-साथ मुक्त-छंद, अतुकांत

                         कविता, हिन्दी भाषा, साहित्य व समाज के उत्तरोत्तर और अग्रगामी विकास व प्रगति हेतु हिन्दी साहित्य की नवीन धारा " अगीत-विधा" का प्रादुर्भाव हुआ एवं उसे गति मिली | अगीत --एक जन-आंदोलन होकर उभरा | इसी क्रम में डा रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा १९७५ में 'संतुलित कहानी' व १९९८ में 'संघात्मक समीक्षा पद्धति' की स्थापना की | १९६६ से ही अगीत-विधा एक आंदोलन के रूप में विविध झंझावातों को सहते हुए अबाध गति से आगे बढती जा रही है | देश-विदेश में फैले हुए कवियों द्वारा यह विधा देश की सीमाओं को पार करके अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर अपना परचम लहराने लगी है |

                     इस दृष्टा की विधा अगीत को एक सुखद मोड़ तब मिला जब डा सत्य के परामर्श पर सन २००३ई. में अगीत परिषद के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट पं. जगतनारायण पांडेय ने रामकथा पर आधारित खंडकाव्य " मोह और पश्चाताप" तथा २००४ में "सौमित्र गुणाकर" महाकाव्य अगीत विधा में लिखा जो पांडे जी द्वारा स्वरचित गतिबद्ध सप्तपदी अगीत छंद" में निबद्ध था| ये दोनों कृतियाँ अगीतविधा में लिखे गए सर्वप्रथम खंडकाव्य व महाकाव्य थे |

                          डा सत्य के एक अन्य सहयोगी डा श्यामगुप्त ने सन २००६ ई. में शाश्वत आध्यात्मिक रहस्यमय विषय - 'सृष्टि, ईश्वर व जीवन-जगत के प्रादुर्भाव ' पर, विज्ञान व अध्यात्म पर समन्वित महाकाव्य " सृष्टि ( ईषत इच्छा या बिगबैंग-एक अनुत्तरित उत्तर )" अगीत विधा में लिखा, जिसके प्रणयन के लिए अतुकांत, सममात्रिक, लयबद्ध गेय 'अगीत षटपदियों' का निर्माण किया जो अगीत में एक और नवीन छंद की सृष्टि थी | इस कृति की सफलता व पत्रकारों, विद्वानों, समीक्षकों द्वारा आलेखों से यह सिद्ध हुआ कि अगीत में आध्यात्मिक, वैज्ञानिक व गूढ़ विषयों पर भी रचनाएँ की जा सकती हैं | सन-..२००८ में अगीत-विधा पर डा श्यामगुप्त की द्वितीय कृति "शूर्पणखा" खंड काव्य प्रकाशित हुई जिसे "काव्य-उपन्यास" का नाम दिया है | डा श्यामगुप्त ने अगीत विधा के अन्य विविध छंदों का भी निर्माण एवं प्रयोग किया जो आज नव-अगीत, त्रिपदा अगीत, लयबद्ध षटपदी अगीत, त्रिपदा अगीत ग़ज़ल के नाम से जाने जाते हैं |

                     डा सत्य के जागृत और उन्नतिशील साहित्य हेतु संघर्ष का एक अन्य उदाहरण है कि आपके सतत उत्साहवर्धन व प्रेरणा के फलस्वरूप डा श्यामगुप्त द्वारा ‘अगीत साहित्य दर्पण’ के रूप में अगीत-विधा के समस्त शास्त्रीय-विधान की रचना की गयी जो किसी नवीन काव्य-विधा का प्रथम शास्त्रीय रचना विधान है एवं जिसने अगीत को स्थायित्व व शास्त्रीय-मर्यादा प्रदान की |

                       इसप्रकार एक जागृत और उन्नतिशील साहित्य हेतु संघर्षशील व्यक्तित्व की भाँति डा रंगनाथ मिश्र सत्य अनेकों आलोचनाओं, कटु बचनों, दुष्प्रचारों, विरोधों आदि को झेलते हुए आगे बढ़ते गए, अपने व्यक्तिगत मानापमान, स्वाभिमान व स्वत्व की चिंता किये बिना साहित्य व संकृति हेतु अपनी बलि देने को सदा जागृत| उनकी साहित्यिक सेवाओं हेतु उन्हें साहित्यभूषण की उपाधि प्रदान की गयी एवं विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा विद्यासागर की उपाधि | जागृत और उन्नतिशील साहित्य हेतु संघर्षशील व्यक्तित्व को स्व-बलि देना ही होता है जो प्रतिगामी और उद्देश्यहीन साहित्य में नहीं होता । डा रंगनाथ सत्य जैसे संघर्षशील व्यक्तित्व ही युग-प्रवर्तक की भूमिका निभाते हैं एवं युग दृष्टा होते हैं|

१ मार्च,२०१६ई -----डा श्यामगुप्त, सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना,
साहित्यकार दिवस लखनऊ-२२६०१२, मो-९४१५१५६४६४..

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