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मंगलवार, 22 मार्च 2016

कैसे रंगे बनवारी---डा श्याम गुप्त ...

                             कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



कैसे रंगे बनवारी




सोचि सोचि राधे हारी, कैसे रंगे बनवारी
कोऊ तौ न रंग चढ़े, नीले अंग वारे हैं |
बैजनी बैजन्तीमाल, पीत पट कटि डारि,
ओठ लाल लाल, श्याम, नैन रतनारे हैं |
हरे बांस वंशी हाथ, हाथन भरे गुलाल,
प्रेम रंग सनौ कान्ह, केस कजरारे हैं |
केसर अबीर रोली, रच्यो है विशाल भाल,
रंग रंगीलो तापै मोर-मुकुट धारे हैं ||

चाहे कोऊ रंग डारौ, चढिहै न लालजू पै,
क्यों न चढ़े रंग, लाल, राधा रंग हारौ है |
राधे कहो नील-तनु, चाहें श्यामघन सखि,
तन कौ है कारौ पर, मन कौ न कारौ है |
जन कौ दुलारौ कहौ, सखियन प्यारौ कहौ ,
तन कौ रंगीलौ कहौ, मन उजियारौ है |
एरी सखि! जियरा के प्रीति रंग ढारि देउ,
श्याम रंग न्यारो चढ़े, सांवरो नियारो है ||

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