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मंगलवार, 11 जुलाई 2023

मेरी नवीन पुस्तक -ओन लाइन प्रकशित --डॉ.श्यामगुप्त की संतुलित कहानियाँ .....

                                    कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

कृति---



डॉ.श्यामगुप्त की संतुलित कहानियाँ  

सर्वाधिकार ---लेखकाधीन

प्रथम संस्करण----जुलाई 2023 ई.

मूल्य----100/-रु.

रचयिता-डॉ.श्यामगुप्त एम.बी.बी.एस., एमएस(शल्य)

            हिदी साहित्य विभूषण, साहित्याचार्य                    

पता:सुश्यानिदी,के-३४८,आशियाना,लखनऊ-२२६०१२.

                          मो.९४१५१५६४६४,

ई मेल-  drgupta04@gmail.com

मुखपृष्ठ --- डॉ.श्यामगुप्त 

प्रकाशक- सुषमा प्रकाशन, आशियाना,लखनऊ

 

 

 Book—Dr. shyam gupt ki Santulit Kahaniyan     

             ( Moderate stories by Dr. Shyam Gupt )

Writer—Dr. Shyam Gupta MBBS, MS(surgery)

 Sushyanidi, K-348, Ashiyana , Lucknow,U.P.-INDIA -226012 Mo-941515646,  email-drgupta04@gmail.com 

Blog-https://shyamthot.blogspot.com

Publisher- Sushama prakashan, Ashiyana, Lucknow


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डॉ.श्यामगुप्त की संतुलित कहानियाँ

  

                    -अनुक्रमणिका -

 

समर्पण  व आभार –

 

संतुलित कहानी का कथ्य ---डॉ.श्यामगुप्त

 

कथाक्रम-१ से ३१ तक --


 

१.अतिसुखासुर ..

२.अब पोते को पालती .

३.एक ही रास्ता ..

४.कहानी मानव की ..

५.क्या विज्ञान ही ईश्वर है..

६.क्वालिटी ऑफ़ लाइफ ..

७.चलो अपन तुपन...

८.जो प्रभु चौंच बनाता है .

९.न गाँव न शहर ...

१०.नायिका ...

११.नारी और मुक्ति ..

१२.पर्यावरण दिवस...

१३.पूरी अधूरी कहानी..

१४.पूर्णकाम..

१५.प्रेम से प्रथम परिचय..

१६.बच्चे...

 १७.बाहरी आदमी...

१८.बारात कौन लाये ..

१९.भुज्यु राज की रक्षा..

२०.मरे जा रहे हैं शान में..  

२१.माँ और काज़ल पुराण..

२२.मिन्की ट्विंकल  आराध्य

२३.मुक्ति-पथ ..

२४.मोड़ जीवन के ..

२५.यक्ष प्रश्न..

२६.विचार व्यर्थ नहीं जाते..

२७.सहकर्मिणी-सहधर्मिणी..

२८.साहित्य और मार्केटिंग..

२९.इन्द्रधनुष..

३०.रिश्ता सारमेय सुत का..

३१.सही राह पर..   


 

 

 


शनिवार, 1 जुलाई 2023

पुस्तक, डॉ. श्याम गुप्त की लघुकथा संग्रह का आत्म-कथ्यांकन -----

                                               कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


लघुकथा संग्रह का आत्म-कथ्यांकन -----
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कथा संस्कृत शब्द ‘कथ’ से बना है जिसका मूल अर्थ है जो कहा जाय | अर्थात किसी विशिष्ट परिस्थिति या परिस्थितियों का युक्ति-युक्त वर्णन | मानव जीवन की असीमितता व व्यापकता से लेखक का प्रभावित होना आवश्यक है अतः कथाकार विभिन्न घटनाओं के अंकन के अतिरिक्त स्वयं के अनुभव, स्मृतियाँ, अनुभूत घटनाओं के तथ्यों पर भी कथा कहता है, कथाकार कथा के अंत को पाठकों के लिए सोचने को भी छोड़ सकता है |
लिपि के आविष्कार से पहले श्रुति रूप में मौखिक कथाएं तो आदिकाल से प्रचलित हैं, विशेषकर भारत में, जिनमें लोक-गाथाएँ पद्य–कविता रूप में तथा लोक-कथाओं में गद्य-कथ्य द्वारा रसमयता उत्पन्न जाती थी जो शायद विश्व में गद्य का सबसे प्राचीन रूप है | लिपि के अविष्कार के पश्चात लिखित कथा परम्परा प्रारम्भ हुई जो प्रायः आख्यान, एतिहासिक वर्णन, उपदेशात्मक व जीवन व्यवहार की कथाएं थीं |
आधुनिक कहानी भी यद्यपि श्रुति व आख्यान परम्परा से ही आई है,परन्तु कुछ विद्वान् उसे पश्चिम से आयातित कहते हैं | यह भ्रम इसलिए उत्पन्न होता है कि जब तथाकथित आधुनिक काल में लिखित कहानी परम्परा प्रारम्भ हुई उस काल में भारत पराधीन था एवं विदेशी आकाओं के पश्चिमी साहित्य व संस्कृति के समक्ष गुलाम भारत की अपनी परम्पराओं, साहित्य-इतिहास व दृष्टिकोण का कोई अर्थ नहीं था |
विदेशी हमलावरों ने भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक संस्थाओं का विनाश लंबे समय तक किया। इस दौर में कथा साहित्य धार्मिक पूजा-पर्वों में कहा-सुना जाकर जीवित रहा जिसका उद्देश्य जन-मन में शुभत्व के प्रति आशा व आस्था बनाये रखना था। ये कथाएँ मनुष्य में अपने आचरण में सुधार, सद्गुणों में वृद्धि, आदि की प्रेरणा का स्रोत बनतीं थीं । ये लघु आकार की कथाएँ अल्प समय में कह-सुन ली जाती थीं, बच्चे उन्हें सुनते और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जीवन मूल्य पहुँचते रहते। फलत:, राजनैतिक पराभव काल में भी भारतीय जनमानस अपना मनोबल, मानवीय मूल्यों में आस्था और सत्य की विजय का विश्वास बनाये रह सका।
आधुनिक कहानी में प्रायः यथार्थ् का वर्णन है, विकास की चेतना है| अनास्था एवं विश्वास की क्षीणता के इस वैज्ञानिक युग में मानव पूर्ण यथार्थवादी हो चुका है अतः कथाकार मनोविज्ञान का सहारा लेकर मानव जीवन के किसी मर्मस्पर्शी घटना,कथ्य आदि पर कथा-कहानियाँ कहता है जो मानव को अपनी व्यथा-कथा लगे और उसे रस-निष्पत्ति का आभास हो|
लघुकथा, आधुनिक कथा-कहानी की एक विशेष धारा है जिसका मूल, कथ्य की संक्षिप्तता एवं तथ्य की स्पष्टता एवं विषय की गंभीरता व गहनता है | मेरे विचार से लघुकथा कोइ आसमान से उतरी विचित्र व नयी विधा नहीं है | लघुकथा का मूल संस्कृत साहित्य में है। लघु अर्थात छोटी, कथा जिसमें कहने योग्य कोइ सोद्देश्य बात हो जो मन तक पहुंचे । विश्व साहित्य के इतिहास में लघुकथा का विस्तृत इतिहास है। भारतीय वाङ्मय में कथाओं, प्रबोध कथाओं, जातक-गाथाओं एवं लोकगाथाओं में लघुकथाओं का बाहुल्य है | हिंदी कथा-साहित्य में भी लघुकथा प्रारम्भ से ही विद्यमान है।
जब एक संवेदनशील मन अपने इर्द गिर्द घटित घटनाओं के नेपथ्य में विसंगतियों या असंवेदनशीलता को अंदर तक अनुभव करता है तो कथा प्रारम्भ होती है, परन्तु आवश्यक नहीं कि लघुकथा का विषय केवल विसंगतियाँ या असंवेदनशीलता ही हो, अन्य सामाजिक सरोकारयुक्त विषय भी लघुकथाओं के विषय हो सकते हैं|
जिस घटना के पीछे कथा तत्व छुपा न हो, उससे खबर या रिपोर्ट तो बन सकती है लघुकथा नहीं। किसी घटना को ज्यों का त्यों लिख देना सपाट बयानी कहलाता है। जब घटना को कल्पना और रचनाशीलता का पुट दिया जाता है यह सपाट बयानी एक साहित्यिक कृति में परिवर्तित होती है।
यद्यपि अभी तक लघुकथा हेतु कोई सार्वभौम सार्थक दृष्टि नहीं अपनाई गई है। हाँ कथा के तीन मूल बिन्दुओं—कथानक, दर्शन-उद्देश्य अथवा सन्देश और शिल्प शैली पर आधारित गुणतत्व को इस प्रकार कहा जा सकता है –
लाघवता -विज्ञान की सूत्रीय-भाषा की भांति लघुकथा भाषा विज्ञान का सूत्र रूप है, अर्थात किसी रचना को विषय से भटकाने वाले विचारों व शब्दों से मुक्त रखना तथा मात्र वस्तु-प्रेषण हेतु आवश्यक सामग्री का ही चयन होना| दृश्य का वर्णन नहीं अपितु दृश्य घटता हुआ प्रतीत होना चाहिए।
नेपथ्य - रचना में स्वयंसिद्ध या छुपा हुआ कथ्य या तथ्य सहज स्पष्ट और सार्थक एवं संदर्भित स्पष्ट सम्प्रेषणीय होना चाहिए, गूढ़, व्यंजनीय नहीं|
सम्पूर्णता -अर्थात रचना का कहानी तत्व व कथ्य सौन्दर्य अवयवों सहित समस्त प्रभावकारी अवयवों से युक्त होना। जिसमें भाषिक गठन शैली सम्प्रेषण और प्रभाव प्रशंसनीय हों|
लघुकथा का इष्ट -आजकल प्रायः लघुकथाओं में समाज की नकारात्मक आलोचना भाव ही पाया जाता है जो उचित नहीं| लघुकथा का उद्देश्य मात्र नकारात्मक आलोचना न होकर, सकारात्मक उद्वेलन से यथार्थ का विवेचन कर परोक्ष मार्गदर्शन करना है तथा पाठक के अंतर्मन में समाज में स्थित विसंगतियों के प्रति तीब्र-प्रतिक्रियात्मकता एवं उनसे मुक्त होने की इच्छा उत्पन्न करना होता है| लाक्षणिकता प्रतीकात्मकता कलात्मकता के साथ-साथ रोचकता व सुरुचिपूर्णतायुक्त शब्दावली व कथ्यांकन की उपस्थिति इन्हें बोथ कथाओं से पृथक करती है|
वस्तुतः स्वतंत्रता के संघर्ष काल में साम्यवाद ने युवा वर्ग को आकर्षित किया । स्वतन्त्रता के तुरंत उपरांत काल में सरकारों व शासन तंत्र में अंग्रेजी राजतंत्र और साम्यवादी व्यवस्था के प्रति विकट सम्मोहन ने इन दोनों तत्वों को सत्ता और साहित्य में सहभागी बना दिया जबकि भारतीय सनातन परंपरा में विश्वास करने वाले तत्व पिछड़ गए। साहित्यकारों और समीक्षकों द्वारा भारतीय वांग्मय की सनातन विरासत और परंपरा को हीन, पिछड़ा, अवैज्ञानिक और अनुपयुक्त कहकर अंग्रेजी साहित्य की दुहाई देते हुए, उसकी आड़ में साम्यवादी विचारधारा के अनुकूल जीवनमूल्यों को विविध विधाओं का मानक ठहराया गया । फलत:, रचनाकर्म का उद्देश्य समाज में व्याप्त शोषण, टकराव, बिखराव, संघर्ष, टूटन, फुट, विसंगति, विडंबना, असंतोष, विक्षोभ, कुंठा, विद्रोह आदि का शब्दांकन मात्र हो गया। उन्होंने देश में हर क्षेत्र में हुई उल्लेखनीय प्रगति, सद्भाव, एकता, साहचर्य, सहकारिता, निर्माण, हर्ष, उल्लास, उत्सव आदि की जान-बूझकर अनदेखी और उपेक्षा की।
अतः यद्यपि प्रायः लघुकथा में किसी अनुभव अथवा घटना की टीस और कचोट को बहुत ही गहनता के साथ उद्घाटित किया जाता है पर यदि रचना हर्ष और ख़ुशी को उद्घाटित करे तो वह लघुकथा क्यों न होगी? निश्चय ही सर्वांगीण प्रगति हेतु लघुकथा को अपनी सनातन पृष्ठभूमि तथा आधुनिक हिंदी के विकास काल की प्रवृत्तियों में समन्वय और सामंजस्य स्थापित करते हुए भविष्य के लिए उपयुक्त विविधवर्णी साहित्य सृजन के लिए सजग होना होगा।
समाज किसी एक विचार या वाद के लोगों से नहीं बनता। उसमें विविध विचारों और रुचियों के लोग होते हैं जिनकी आवश्यकता और परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, तदनुसार साहित्य की हर विधा में रचनाओं का कथ्य, शिल्प और शैली बदलते हैं। लघुकथा को देश, काल और परिस्थिति सापेक्ष्य होने के लिए विविधता को ग्रहण करना ही होगा। पुरातन और अद्यतन में समन्वय से ही सनातन प्रवाह और परंपरा का विकास होता है।
कुछ विशिष्ट कथाकारों व स्वघोषित संस्थाओं वर्गों द्वारा लघुकथा के रूप-निर्धारण हेतु मानक थोपने के प्रयास दर्शाते हैं कि उन्हें पारंपरिक शिल्प और शैली से खतरा अनुभव हो रहा है | लघुकथा लेखन का उद्देश्य पाठक और प्रसंगों तक पहुँचना ही है तो इससे क्या अंतर पड़ता है कि वह पहुँच बोध, उपदेश, व्यंग्य, संवाद किस माध्यम से की गयी |
कुछ साहित्यकार लघुकथा को लेखक विहीन विधा कहते हैं परन्तु साहित्यकार द्वारा कोइ भी साहित्य स्वयं को व्यक्त करने हेतु लिखा जाता है | लेखक तो किसी भी विधा के प्रत्येक शब्द-भाव में उपस्थित रहता है | स्वयं को व्यक्त करने हेतु कुछ न हो तो कोइ क्यों लिखेगा लघुकथा या कुछ भी | इन विशिष्ट वर्गों द्वारा जो मूल आपत्तियां व तथ्य प्रश्नांकित किये जाते हैं वे हैं –लेखकीय प्रवेश, कालखंड, समाधान नहीं हो, चरित्र चित्रण न हो, संकेतात्मकता व द्वंदात्मकता | यद्यपि अधिकाँश विद्वानों द्वारा इन सबकी अत्यावश्यक निषेध पर जोर नहीं दिया जाता |
मूलतः संक्षिप्तता में व्यापकता लघुकथा का मूल तत्व है | सरल, सुरुचिपूर्ण, स्पष्ट भाषा, कथ्य, शिल्प एवं विषय संदर्भगत संवेदना से परिपूर्ण आधे से डेढ़ पृष्ठ का समुच्चय लघुकथा कहा जाना चाहिए | अति लघुता को लघुकथा नहीं चुटुकुला मात्र ही माना जाएगा | सांकेतिकता एवं ध्वन्यात्मकता लघुकथा के प्रमुख तत्व हैं। एक ही मन: स्थिति की सक्रियता को सघनता से संप्रेषित करने का लक्ष्य रहता है। अभिधा, लक्षणा व व्यंजना तीनों शब्द-शक्तियों का उपयोग किया जा सकता है| वैयाकरणीय त्रुटियाँ, विश्वमान्य सत्य की अवहेलना, सांस्कृतिक व सामजिक शुचिता संवेदना एवं सरोकार किसी भी रचना की भाँति लघुकथा का भी आवश्यक अंग हैं |
लघुकथाएं केवल घटना की प्रस्तुति मात्र नहीं हैं, सामाजिक सरोकार रहित कोई भी प्रस्तुति साहित्य कैसे होसकती है | निश्चय ही सर्वांगीण प्रगति हेतु लघुकथा को अपनी सनातन पृष्ठभूमि तथा आधुनिक हिंदी के विकास काल की प्रवृत्तियों में समन्वय और सामंजस्य स्थापित करते हुए भविष्य के लिए उपयुक्त विविधवर्णी साहित्य सृजन के लिए सजग होना होगा।
अतः सोद्देश्य व सरोकार युत विशिष्ट घटना, उसका संक्षिप्त में कथन तथा सटीक व गहन प्रभाव लघुकथा का मूल है | लघुकथा लेखन का उद्देश्य लक्ष्य पर प्रभाव छोड़ना है। एक लघुकथा सुख, दुःख, हर्ष, शोक, हास्य, चिंता, विरोध आदि विविध मनोभावों में से किसी एक की अभिव्यक्त कर अधिक प्रभावी हो सकती है।
प्रस्तुत कृति ‘डा श्यामगुप्त की लघुकथाएं’ मूलतः सामाजिक सरोकारों से युक्त कथाएं हैं जिनमें कुछ कथाओं में दूरस्थ सरोकार भी हैं| इन कथाओं में आवश्यक नहीं कि कुछ स्वयंभू तथाकथित वर्गों व्यक्तित्वों संस्थाओं द्वारा वर्णित, कथित, प्रचारित, स्व-गठित विविध नियमों को ही कठोरता से अपनाया गया हो | इनमें कथाओं में विविध विषयों, कथ्य शैलियों के अनुरूप विविध वर्णन विधियों को सहज कथा रूप में एक विशिष्ट दृष्टिकोण एवं नवीनतापूर्ण सरल, सहज एवं सम्प्रेषणीय ढंग से प्रस्तुत किया गया है| इसे रसज्ञ पाठकों,विद्वानों व साहित्य मर्मज्ञों का आशीर्वाद प्राप्त हो ऐसी मेरी आकांक्षा एवं आशा है |
दि. २८ जून २०२३ई. -- डा श्यामगुप्त
सुश्यानिदी, के-३४८,आशियाना,
लखनऊ-२२६०१२
मो.९४१५१५६४६४..

मेरी नवीन ऑनलाइन प्रकाशित पुस्तक----डॉ. श्याम गुप्त की लघुकथाएं --

                                                 कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



मेरी नवीन ऑनलाइन प्रकाशित पुस्तक----डॉ. श्याम गुप्त की लघुकथाएं --
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कृति---डॉ. श्यामगुप्त की लघुकथाएं---ऑनलाइन---
सर्वाधिकार -लेखकाधीन
प्रथम संस्करण-जून २०२३... ऑनलाइन...
मूल्य----१०० रु.
रचयिता-: डॉ श्यामगुप्त
सुश्यानिदी,के-३४८,आशियाना,लखनऊ २२६०१२.
मो.९४१५१५६४६४, drgupta04@gmail.com
मुखपृष्ठ -डॉ श्यामगुप्त
प्रकाशक – सुषमा प्रकाशन, आशियाना, लखनऊ २२६०१२
Book--Dr shyam gupt ki Laghu Kathayen
(short-stories by Dr Shyam Gupt )
Writer—Dr Shyam Gupta
Sushyanidi, K-348, Aashiyana, Lucknow, U.P.-INDIA -226012
Mo-941515646, email-drgupta04@gmail.com
Publisher- Sushma prakaashan, Lucknow
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डॉ. श्यामगुप्त की लघुकथाएं
----अनुक्रमणिका ----
समर्पण --
आभार --
लघु कहानी का कथ्य ---डा श्यामगुप्त
कथाक्रम-१ से ५८ तक----
१.आठवीं रचना ...-------
२..अफसर ...-----------
३.ढलती शाम और डूबता सूरज ....---
४.एक मुलाक़ात बस यूंही ...-----
५.कार्य विभाजन ----------
६.चींटियाँ ...------
७.अपन तुपन -----
८.मी टू प्लस -----
९.मनोरंजन ...----------
१०.इलेक्शन और गांधीजी
११.गट्टू पहलवान ..------
१२.बदलते उसूल ----------
१३.मोड़ जीवन के ...---------
१४.माँ ...-----------------
१५.मंत्री जी शहर में...-------
१६.बेस्ट फ्रेंड...------------
१७.बचपन...------------- -
१८.पुरुषार्थ...----------------
१९.पाल ले इक रोग नादाँ ...-----
२०.रिमार्क...--------------- -
२१.सीट...----------------
२२.भव चक्र....--------------
२३.रथ चढ सिया सहित ...--------
२४.शुक्र का पारगमन ...---------
२५.गुड डॉक्टर या पोपुलर डॉक्टर ----------
२६.आत्मकथा ....------------------
२७.कहानी की कहानी ....-------------
२८.विवाह
२९.छोटी सी गोली ....-----------------
३०.दो का पहाड़ा...
३१.आम
३२.समस्या व लोकपाल...-----------------
३३.लोफर...--------------------------
३४.विकृति की जड़ ...------------------
३५.जो सहि दुःख परछिद्र दुरावा ------------
३६.न चाहते हुए भी...------------------
३७.विकास या पतन..-------------------
३८.हूँ तो उनकी निगाह में -------------
३९.सुख-दुःख ...------------------
४०.समय नियोजन....---------------
४१.लघुकथा -----------------------
४२.मैनूं पिचाना जी ------
४३. नारी और नारी सम्मान ---
४४.दादा --
४५.मेम साहब --
४६.श्राद्ध ---
४७.गुणात्मक सोच----
४८.टाइल्स ---
४९.हैरी पोटर ---
५०.कठिन डगर ---
५१.डाकिया ...
५२.कोरोना काल--
५३.सुव्यवस्था----
५४.नौकरी----
५५.मुक्तिपथ---
५६.मानवता का प्रथम महासमन्वय --
५७.सही राह पर ----
५८.विश्वास और मित्रता ....
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आभार
उन सभी का जिनके समय समय पर प्राप्त विचार व भावोद्गार इन कथाओं में भावित हुए...
एवं
जो इन कथाओं के जाने-अनजाने पात्र रूप में प्रतिष्ठित हुए...
====
समर्पण
पूज्य पिताजी स्व.श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता
एवं
पूज्य माताजी स्व.श्रीमती रामभेजी देवी गुप्ता को
माँ की ममता की छाया जब,
सदा हमारे संग रहती है |
प्रथम गुरु की शिक्षाएं बन,
संस्कार मन रच बस जाते |
जीवन का हर तमस मिटाने,
कितने ज्ञानदीप जल उठते ||
पिता की छत्र-छाया वो ,
हमारे सिर पै होती है |
उंगली पकड़ हाथ में चलना ,
खेलना-खाना, सुनी कहानी |
बचपन के सपनों की गलियाँ ,
कितने जीवन मिल जाते हैं
=====
All reactions:
Deepika Gupta, Ramesh Chandra Bhatt and 19 others
समर्पण 

सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

विविध पंथों मतों द्वारा पाखण्ड विवाद, वेदों की चोरी, ज्ञान का लोप व अज्ञान का प्रसार -डॉ श्याम गुप्त

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


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विविध पंथों मतों द्वारा पाखण्ड विवाद, वेदों की चोरी, ज्ञान का लोप व अज्ञान का प्रसार -डॉ श्याम गुप्त
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कल एक #ब्रह्माकुमारी वाले सज्जन परिवार घर आये और बड़ी देर तक प्रेरित करते रहे कि शिव बाबा आपको सतयुग में ले जायेंगे, त्रिदेव को चलाने वाले शिव बाबा हैं | ब्रह्माकुमारी संस्थान से जुड़ जाएँ, ७ दिन का ध्यान का कोर्स करलें, गीता श्रीकृष्ण ने नहीं शिव बाबा ने लिखी है, तमाम बातें गीता में गलत लिखी हैं| शास्त्रों में ३३ करोड देवताओं की बात कपोल कल्पित है आदि आदि | कुछ उठने बैठने की सामान्य अच्छी अच्छी बातें जो सभी कहते हैं भी कहते रहे |
मैं सोचने लगा–तुलसी बाबा ने अपनी रामायण में लिखा है ....
हरित भूमि तृण संकुल समुझ परहि नहिं पंथ,
जिमी पाखण्ड विवाद ते, लुप्त होयँ सदग्रंथ |
---अर्थात जब उपजाऊ भूमि पर तमाम तृणसमूह, घास,फूस, पात, पत्तियां उग आती हैं तो रास्ते की पगादंदियाँ भी दिखाई नहीं देतीं जैसे विभिन्न पाखंडो से भरे शास्त्र विरुद्ध समूहों के समाज में उत्पन्न होने से सदग्रंथ---वेद आदि ज्ञान, बुद्धि, विद्या क्रियाएं लुप्त होजाती हैं | यही आज हो रहा है |
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आज कितने पंथ, समूह, वर्ग धार्मिक क्रियाओं के नाम पर उत्पन्न होगये हैं जो शास्त्रों के विरुद्ध प्रचार में लिप्त हैं | घर घर में योगा, सहज योग, अपोनोपोनो, ध्यान, स्वामी, कथावाचक, ईश्वरीय विश्व विद्यालय, इस्कोन, आशाराम बापू, श्री श्री आदि पाखण्ड उत्पन्न होगये हैं जो सनातन धर्म एकांगी तत्त्व के प्रचार अथवा दुष्प्रचार में लिप्त हैं| असंतुष्ट व अतृप्त लोगों को कुछ अच्छी अच्छी बातें व सब्ज बाग़ दिखाकर भटकाते हैं | पुराकाल में जैन व बौद्ध धर्मों ने भी पाखण्ड किया था |
ब्रह्माकुमारी संगठन तो बाकायदा शास्त्रों व गीता का विरोध करता है और बाबा शिव को ईश्वर से ऊपर बताता है | यह सफ़ेद कपड़ों वाला पंथ शायद ईसाइयत का एक नया रूप है सनातन के विरुद्ध नया षड्यंत्र | ये सब सामान्य जन को कुछ अच्छी अच्छी संवेदनापूर्ण बातें एवं व्यक्तिगत परामर्श व सहायता से भ्रमित करते हैं और जन समूह एवं जिनको अपने धर्म व सनातन हिन्दू धर्म के बारे में अधिक ज्ञान नहीं होता उन्हें को कुछ समझ नहीं आता, वे ईश्वर, ज्ञान, विद्या को भूलकर बाबाओं के गुण गान में लग जाते हैं |
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सनातन वैदिक धर्म, वेद, पुराणो शास्त्रों ( अर्थात ज्ञान, विद्या, बुद्धि, तर्क सम्मत व्यवहार ) के विरुद्ध सदा से ही, हर युग में विभिन्न विरोधी पंथ सम्प्रदाय,मत, मज़हब उत्पन्न होते आये हैं जिनके विवाद व पाखण्ड के कारण जनता भ्रमित होती है एवं ज्ञान, विद्या व शिक्षाएं, धर्म आदि कालानुसार लुप्त होजाते हैं, पृथ्वी पर पाप और अधर्म का राज्य होजाता है और फिर –‘यदा यदा हि धर्मस्य...’ के अनुसार उनकी पुनर्स्थापना की जाती है |
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#सतयुग में वेदों को चुराने की घटनाएँ हैं | सतयुग में हयग्रीव नामक असुर द्वारा वेदों को चुराकर सागर में छुपादिया( अर्थात ज्ञान का लोप किया गया ) और मत्स्य रूप में विष्णु भगवान ने उसे मारकर वेदों को पुनः देवताओं को सौंपा, अर्थात समाज में ज्ञान की प्रतिष्ठा की गयी |
जब पणिसमूह द्वारा महर्षि वशिष्ठ की गायें ( ज्ञान, बुद्ध, विद्या, वेद) चुराकर अंधेरी गुफाओं( अज्ञान रूपी अंधकार ) में छुपा दीं तब इंद्र की सहायता से गायों को ढूंढा गया | ज्ञान की प्रतिष्ठापना की गयी|
राजा #रामचंद्र के काल में जब जाबालि ऋषि का शिष्य शम्बूक वेदो के विरुद्ध व नास्तिकता का प्रचार करता था तो अज्ञान फ़ैलाने के कारण राजा राम ने उसे समूल उच्छेद कर दिया था | महाभारत में भी #चार्वाकों को इसी कारण युधिष्ठिर द्वारा दण्डित किया गया था|
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आज भी यही स्थिति है | ये जगह जगह पर उगे हुए जाने कितने पंथ, मज़हब, वर्ग, बाबा लोग समाज को कहाँ लेजारहे हैं, सभी जानते हैं | आज जो अनाचार, दुराचार, विकृतियाँ पनप रहीं हैं उनका कारण यही शास्त्र विरोधी कृत्य हैं|
------- मुस्लिम और ईसाइयत जैसे हिन्दू विरोधी धर्मों के कृत्य इसीलिये वृद्धि पर हैं कि सनातन धर्म को ये पाखण्ड खोखला कर रहे हैं| इन्ही परिस्थितियों के लिए गोस्वामी जी ने लिखा था ---
हरित भूमि तृण संकुल समुझ परहि नहिं पंथ,
जिमी पाखण्ड विवाद ते, लुप्त होयँ सदग्रंथ |

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

                                                   
सहजीवन ---मानवता विकास व संबंधों का आधार --डा श्याम गुप्त --
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वरिष्ठ नागरिक संस्था, सेकिंड इनिंग , आशियाना, लखनऊ की पत्रिका 'सक्षम' में प्रकाशित आलेख ---





कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित