saahityshyamसाहित्य श्याम

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मंगलवार, 21 जुलाई 2009

श्याम लीला ---पद.

काहे मन धीर धरे घनश्याम |
तुम जो कहत ,हम एक विलगि कब हैं राधे श्याम
फ़िर क्यों तडपत ह्रदय जलज यह समुझाओ हे श्याम !
सान्झ होय और ढले अर्क, नित बरसाने घर-ग्राम
जावें खग मृग करत कोलाहल अपने-अपने धाम
घेरे रहत क्यों एक ही शंका मोहे सुबहो-शाम
दूर चले जाओगे हे प्रभु! , छोड़ के गोकुल धाम
कैसे विरहन रात कटेगी , बीतें आठों याम
राधा की हर सांस सांवरिया , रोम रोम में श्याम
श्याम', श्याम-श्यामा लीला लखि पायो सुख अभिराम



राधे काहे धीर धरो
मैं पर-ब्रह्म ,जगत हित कारण, माया भरम परो
तुम तो स्वयं प्रकृति -माया ,मम अन्तर वास करो
एक तत्व गुन , भासें जग दुई , जगमग रूप धरो
राधा -श्याम एक ही रूपक ,विलगि भाव भरो
रोम-रोम हर सांस सांस में , राधे ! तुम विचरो
श्याम; श्याम-श्यामा लीला लखि,जग जीवन सुधरो

3 टिप्‍पणियां:

KK Yadav ने कहा…

Radha-shyam ki sundar jugalbandi !!

मेरे ब्लॉग शब्द सृजन की ओर पर पर पढें-"तिरंगे की 62वीं वर्षगांठ ...विजयी विश्व तिरंगा प्यारा"

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा! इस लाजवाब और बेहतरीन पोस्ट के लिए ढेर सारी बधाइयाँ !

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

धन्यवाद बबली जी...