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गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

" कुछ शायरी की बात होजाए "....ग़ज़ल 4 .... डा श्याम गुप्त ....

                                              
                                           कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


             मेरी शीघ्र प्रकाश्य शायरी संग्रह....." कुछ शायरी की बात होजाए ".... से  ग़ज़ल, नज्में  इस ब्लॉग पर प्रकाशित की जायंगी ......प्रस्तुत है....ग़ज़ल-४.......


            मुझे न छेडो...
मुझे न छेडो इस मानस में ज्वाला मुखी भरे हैं।
जाने क्या-क्या कैसे कैसे अन्तर्द्वन्द्व भरे हैं।

क्या पाओगे घावों को सहलाकर इस तन-मन के,
क्या पाओगे छूकर तन के मन के घाव हरे हैं।

खुशियों की सरगम हो,या हो पीडा की शहनाई,
हंस-हंस कर हर राग सजाया ,बाधा से न डरे हैं।

कोने-कोने क्यों छाई आतन्कवाद की छाया ,
सामाज़िक शुचि मूल्य आज टूटॆ-टूटे बिखरे हैं।

हमने अतिसुख-अभिलाषा में आग लगाई घर को,
कटु बातें कह् डालीं हमने मन के भाव खरे हैं।

यह अग जग सुख-दुःख का मेला, किसने दुःख ना झेला,
धैर्य लगन सत नीति चले जो,सुख के पुष्प झरे हैं |

जिसने खुद को कठिन परिश्रम,जप-तप योग तपाया,
वे ही सोने जैसा तपकर इस जग में निखरे हैं।

एक भरोसा उसी राम का,जग- पालक- धारक है,
श्याम’ कृपा  से जाने कितने भव-सागर उतरे हैं॥

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