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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

" कुछ शायरी की बात होजाए "....ग़ज़ल -6 .... डा श्याम गुप्त ....

                                      
                                              
                                           कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


             मेरी शीघ्र प्रकाश्य शायरी संग्रह....." कुछ शायरी की बात होजाए ".... से  ग़ज़ल, नज्में  इस ब्लॉग पर प्रकाशित की जायंगी ......प्रस्तुत है....ग़ज़ल- ६..... कब समझेंगे ....
लोग आखिर ये बात कब समझेंगे |
बदले शहर के हालात, कब समझेंगे |

ये है तमाशबीनों का शहर यारो,
कोई न  देगा साथ, कब समझेंगे |

जांच करने क़त्ल की कोई न आया,
हैं माननीय शहर में आज, कब समझेंगे|

चोर डाकू लुटेरे पकडे नहीं जाते,
सुरक्षा-चक्र में हैं ज़नाब, कब समझेंगे |

कब से खड़े हैं आप लाइन में बेंक की,
व्यस्त सब पीने में चाय, कब समझेंगे |

बढ़ रही अश्लीलता सारे देश में,
सब सोरहे चुपचाप, कब समझेंगे |

श्याम, छाई है बेगैरती चहुँ ओर,
क्या निर्दोष हैं आप, कब समझेंगे ||





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