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रविवार, 10 जून 2018

मेरी चारधाम यात्रा भाग एक---- डा श्याम गुप्त---

                                 कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित




              मेरी चारधाम यात्रा 
 भाग एक----


      उत्तर भारत में हिमालय स्थित चारधाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ व बद्रीनाथ भारतवर्ष के एवं हिन्दुओं के प्राचीनतम तथा पवित्रतम तीर्थस्थल हैं | हर किसी हिन्दू व भारतीय की जीवन में एक बार बदरीनाथधाम जाने की इच्छा मोक्ष की इच्छा के समान है | वास्तव में तो यह यात्रा माँ गंगा के चहुँ और की परिक्रमित यात्रा ही है |  गौमुख ग्लेशियर से भागीरथी और गंगोत्री एक ओर से नीलकंठ भागीरथ ग्लेशियर से अलकनंदा और उसकी पृष्ठभूमि में नर-नारायण पर्वत के मध्य बद्रीनाथ, उसी के दूसरे पृष्ठ से शतपथ ग्लेशियर से मंदाकिनी और केदारनाथ, और सामने  कालिंदी पर्वत की  बंदरपूंछ चोटी के पश्चिमी अंत में फैले  चंपासर ग्लेसियर से –यमुनोत्री- यमुना |
        अतः प्रोग्राम बनते ही मैं व सुषमाजी तुरंत ही बेंगलोर से लखनऊ आगये| लखनऊ से सत्यप्रकाश गुप्ता जी व पदमा जी, श्री कृष्ण कुमार सिन्हा एवं उनकी पत्नी तथा आगरा से डा राकेश गुप्ता, सुधा गुप्ता व उनका पुत्र राजुल ट्रेन द्वारा १७-५-२०१८ को हरिद्वार पहुंचे जहां से हम नौ लोगों को चार्मिंग यात्रा वालों के १० दिन के टूर पैकेज द्वारा चारधाम यात्रा को प्रस्थान करना था|
प्रथम दिन---दिनांक १७-५-१८ को होटल में विश्राम के बाद हम सभी हर की पौड़ी हरद्वार पर गंगा आरती में सम्मिलित हुए |
       हर की पौड़ी या हरि की पौड़ी का ब्रह्म कुंड हरिद्वार का मुख्य घाट है जहां गंगा पर्वतों को छोड़कर मैदान में उतरती है | समुद्रमंथन से प्राप्त अमृतकुम्भ से कुछ बूंदे यहाँ भी गिरी थीं, अतः यह स्थान भी मोक्ष का द्वार मानाजाता है | यही कनखल में दक्ष के यज्ञ स्थल है जिसमें शिवपत्नी सती ने आत्मदाह किया था | शाम को प्रतिदिन गंगा आरती का सुप्रसिद्ध व मनोहारी कार्यक्रम होता है | हरिद्वार को माया नगरी और कुंभ नगरी भी कहा जाता हैं |
     
   चित्र १-हर की पौड़ी --- 
 
  चित्र २,३  ---गंगा आरती

दूसरे दिन – हरिद्वार से बारकोट ----
         १८-५-१८ की प्रातः हम १२ सीटर टेम्पो ट्रेवेलर से हरिद्वार से मसूरी एवं केम्पटीफाल होते हुए बारकोट के लिए रवाना हुए जो हरिद्वार से २१० किमी है १३५२ मी ऊंचाई पर है जहां से यमुनोत्री जाते हैं| बारकोट ( या बड़ाकोट )  उत्तरकाशी ( या प्राचीन नाम बड़ाहाट ) का प्रवेश द्वार है एवं चारों ओर हिमालय की दुर्गम बंदरपूंछ पर्वत श्रेणी एवं अन्य ऊंची श्रेणियों के मध्य यमुना के किनारे पर बसा हुआ मनोरम स्थान है | रात्रि विश्राम किया गया |
      बड़कोट की पौराणिकता से संबंधित दो भिन्न विचार धाराएं स्थानीय रूप से प्रचलित हैं। एक का मत है कि महाभारत युग में बड़कोट राजा सहस्रबाहु के राज्य की राजधानी थी। हजार बाहुओं के समान शक्ति रखने वाला सहस्रबाहु अपना दरबार एक सपाट भूमि पर लगाता था बड़ा दरबार अर्थात बड़कोट। माना जाता है कि पांडवों ने वन पर्व के दौरान गंधमर्दन पर्वत पर जाते समय सहस्रबाहु का आतिथ्य स्वीकार किया गया था। यहां के कई कुंडों एवं मंदिरों का निर्माण पांडवों द्वारा हुआ, ऐसा माना जाता है।
 
चित्र ४ व ५ ----बारकोट रात्रि में---होटल की बालकनी में सुषमाजी व मि.मिथिलेश सिन्हा तथा प्राचीन पर्वतीय छतें स्लेट पत्थर की खपरेल ---
 
चित्र -६ .बंदरपूंछ व अन्य चोटियों से घिरा बारकोट
      एक अन्य मत का दृढ़ विश्वास है कि बड़कोट मूल रूप से जमदग्नि मुनि और उनके पुत्र परशुराम की भूमि रही थी। कहा जाता है वास्तव में सहस्रबाहु दक्षिण में शासन करता था और चारधामों की यात्रा के लिये ही वह उत्तर आया था। उसका विवाह जमदग्नि मुनि की पत्नी रेणुका की बहन बेनुका से हुआ था।
--------यह तथ्य मौजूद है कि रवाँई एवं बड़कोट के लोग अपनी वंश परंपरा पांडवों , जिन्होंने एक ही स्त्री द्रोपदी से विवाह रचाया था, से जोड़ते हैं उस क्षेत्र के गांवों में मूल रूप से निर्वाहित प्राचीन परंपराओं में से एक है बहुपतित्व की प्रथा जिसमें कई पतियों को रखने का रिवाज है।


---क्रमश भाग दो ----

शुक्रवार, 8 जून 2018

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न ---- डा श्याम गुप्त






                                        कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



                       काव्य गोष्ठी संपन्न ----
         माह के प्रत्येक प्रथम गुरूवार को होने वाली काव्यगोष्ठी दिनांक ०७ जून २०१८ गुरूवार को डा श्याम गुप्त के आवास सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर प्रातः ११ बजे संपन्न हुई |
         वाणी वन्दना डा श्यामगुप्त तथा श्रीमती विजयलक्ष्मी महक ने तथा गणेश वन्दना श्री बिनोद सिन्हा द्वारा की गयी | डा रंगनाथ मिश्र सत्य, श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर द्वारा सम्मान पत्र देकर साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया | जापानी काव्य विधा हाइकू व तांका पर चर्चा हुई| 
        गोष्ठी का प्रारम्भ कविवर संजय समर्थ ने इस प्रकार किया –
स्वार्थ के कंटक विपिन में,
पुष्प परहित के खिलादो |
      श्री मंजुल मंजर लखनवी द्वारा अपने विविध काव्यपाठ के दौरान लालच की बात ओजपूर्ण स्वर में कही गयी –
लालच भरा था मन में, निकाला नहीं गया ,
झगड़ा भी जानबूझ के टाला नहीं गया |
      श्रीमती मंजू सिंह ने काव्य के प्रसिद्द प्रतिमान .पतंगा’ की बात यूं रखी—
सुबह हुई, दीपक बुझ गया,
बेचारा पतंगा लुट गया |
     श्रीमती पुष्पा गुप्ता लन्दन की लड़की के भारतीय परिधान पर यूं रीझ गयीं –
लन्दन की एक लड़की, परिधान शुद्ध भारती,
मन को रिझा गयी, गहरे समा गयी |
      कविवर अनिल किशोर शुक्ल निडर ने अपने पर्यावरण प्रेम का इज़हार इस प्रकार किया---
सब मिल करके पेड़ लगाओ,
मरुथल में हरियाली लाओ |
      श्रीमती सुषमा गुप्ता ने श्रीकृष्ण के मित्र महाज्ञानी उद्दव का के ज्ञान अहं को प्रेमलता में परिवर्तन ब्रजभाषा के एक सुन्दर पद द्वारा इस ललित्यमयता से प्रस्तुत किया –
ऊधो ब्रज सुषमा गए खोय |
ज्यों ज्यों निकट भयो वृदावन जिय कछु चंचल होय |
ब्रक्ष की फुनगी काननि झुकिझुकि, कहन लगीं इतराय |
किधों चले ऊधो इन गलियन ब्रह्म की गैल भुलाय|
      डा श्यामगुप्त ने ग्रीष्म की भीषणता का वर्णन घनाक्षरी छंदों ब्रजभाषा की लालित्यपूर्ण अलंकारिक शैली में इस प्रकार किया ---
दहन सी दहकै द्वार देहरी दगरिया,
कली कुञ्ज कुञ्ज क्यारी क्यारी कुम्हिलाई है |
     श्रीमती विजयलक्ष्मी जी ने साईं कृपा से पूर्ण अपना काव्यपाठ किया---
मेरी एक तमन्ना है सांई, तेरा नित नित दर्शन पाऊँ |
तेरी कृपा से सांई, मैं भवसागर तर जाऊं |
    श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने हाइकू व तांका सुनाये---
अल्हड़ मेघा
सतरंगी चूनर
नभ सुखाये |

आया फागुन
लाया होली के रंग
मन उमंग
बेगाने रंगे गए
धुले कपट छल |

     आगीत साहित्य के जनक, साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने जीएवन की छणभंगुरता पर एक अगीत प्रतुत किया—
जीवन ये छणभंगुर है
कभी कभी सुख आता,
सुख दुःख के साये  में
जीवन सबको भाता,
मन की कुंठा में भी
कहती हैं आत्मकथा,
अपनी ही बाधाएं कहती हैं
आत्मव्यथा
व्याकुल मन नवअंकुर है |
          स्वल्पाहार के पश्चात श्रीमती सुषमागुप्ता द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया एवं गोष्ठी अगले माह के प्रथम गुरूवार तक के लिए स्थगित कर दी गयी |

प्रस्तुत हैं कुछ झलकियाँ ---