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गुरुवार, 3 जून 2010

शूर्पणखा काव्य उपन्यास ---आगे वन्दना ---

शूर्पणखा काव्य उपन्यास ---आगे  वन्दना ---(वैदिक सरस्वती वन्दना )
१. 
तेरे भक्ति भाव के इच्छुक ,
श्रेष्ठ कर्म रत ,ज्ञान धर्म युत ;
माँ तेरा आवाहन करते,
इच्छित वर उनको मिलते हैं ;
कृपा दृष्टि दो माँ सरस्वती ,
हों मन में नव भाव अवतरित |
      २.
तेरे बालक को हे माता,
प्रारम्भिक अभिव्यक्ति स्वतः ही,
हो जाती, जब मातु रूप में ,
ह्रदय गुहा में तुझको पाता |
शुद्ध भाव से तुझे भजे तो,
परिमार्जित मेधा होजाती |
     ३.
हे माँ ! तुम जब दिव्य रसों की,
दिव्य -लोक से वर्षा करतीं ;
निर्मल, बुद्धि ,विवेक ,ज्ञान की,
सभी प्रेरणा मिलती जग को|
ज्ञान भाव से सकल विश्व को,
करें पल्लवित मातु शारदे |
     ४.
मानव ही परमार्थ भाव रत,
माँ जब करता तुम्हें स्मरण;
श्रेष्ठ ज्ञान के तत्व मिलें फिर,
गूढ़ ज्ञान के स्वर मिल जाते |
गूढ़ ज्ञान के सभी अर्थ माँ ,
इस मन में ज्योतिर्मय करदो |
            ५.
ऋषियों ने माँ सप्त स्वरों से,
आदि ऊर्जा और स्वयंभू,
अनहद नाद से किया संगठित |
जग कल्याण हेतु माँ वाणी!
बनी बैखरी, हुई अवतरित,
हो जाते मन भाव उत्तरित |
        ६.
भाषा के निहितार्थ समझकर
वाणी होती मंगलकारी;
मंगलमय वाणी-स्वर नर को,
 आत्मीयता भाव सिखाये |
जब परमार्थ भाव मन विकसे,
माँ समृद्धि लक्ष्मी बन जाती |     क्रमश ...

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