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मंगलवार, 15 जून 2010


दहन सी दहकै, द्वार देहरी दगर दगर ,
कली कुञ्ज कुञ्ज क्यारी क्यारी कुम्हिलाई है।
पावक प्रतीति पवन , परसि पुष्प पात पात ,
जरै तरु गात , डारी डारी मुरिझाई है ।
जेठ की दुपहरी सखि, तपाय रही अंग अंग ,
मलय बयार मन मार अलसाई है।
तपैं नगर गाँव ,छावं ढूंढ रही शीतल ठावं ,
धरती गगन 'श्याम' आगि सी लगाई है।।

1 टिप्पणी:

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

आपके छंद पढ़ कर बारहमासा की याद आ बधाई हो।
सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी