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रविवार, 23 अक्तूबर 2011

प्रेमकाव्य-महाकाव्य. षष्ठ सुमनान्जलि (क्रमश:)-खंड ग-वियोग श्रृंगार ..गीत ६ ...डा श्याम गुप्त

                                                          कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



  प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है  | अब तक प्रेम काव्य ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया गया ..तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग).. वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है.....  
                 खंड ग ..वियोग श्रृंगार --जिसमें --पागल मन,  मेरा प्रेमी मन,  कैसा लगता है,  तनहा तनहा रात में,  आई प्रेम बहार,  छेड़ गया कोई,  कौन,  इन्द्रधनुष एवं  बनी रहे ......नौ रचनाएँ प्रस्तुत की जायंगी | प्रस्तुत है.. षष्ठ गीत ..फिर से छेड गया कोई....

फिर से छेड़ गया कोई ||
प्रियतम  फिर से बरखा आई ,
प्रेम-भरी  है  पाती  लाई |
तेरी सुलझाई लट को प्रिय,
फिर से खोल गयी पुरवाई |
मन में तेरी प्रीति समाकर ,
रहती   हूँ   खोई-खोई |

फिर  से छेड़ गया कोई ||
ठंडी  ठंडी पवन सुहानी,
छेड़े कोई तान पुरानी  |
चकवा-चकवी चाँद निहारें ,
पूनम की ये रात सुहानी |
निशि भर रहे ढूँढते प्रिय को,
मिल न सका लेकिन कोई |

फिर से छेड़ गया कोई  ||

मन में तेरी प्रीति बसी है,
जीवन जग की रीति सजी है |
मर्यादाओं के बंधन की,
पैरों  में जंजीर बंधी है |
यादों में मन की सीमा के,
बंधन तोड़ गया कोई |

फिर से छेड़ गया कोई  ||







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