जान लेते पीर मन की तुम अगर,
तो न भर निश्वांस झर-झर अश्रु झरते।
देख लेते जो द्रगों के अश्रु कण तुम ,
तो नहीं विश्वास के साये बहकते ।
जान जाते तुम कि तुमसे प्यार कितना,
है हमें,ओर तुम पे है एतवार कितना ।
देख लेते तुम अगर इक बार मुडकर ,
खिल खिला उठतीं कली गुन्चे महकते।
महक उठती पवन,खिलते कमल सर में,
फ़ूल उठते सुमन करते भ्रमर गुन गुन ।
गीत अनहद का गगन् गुन्जार देता ,
गूंज उठती प्रक्रिति मेंवॊणा की गुन्जन ।
प्यार की कोई भी परिभाषा नहीं है ,
मन के भावों की कोई भाषा नहीं है ।
प्रीति की भाषा नयन पहिचान लेते ,
नयन नयनों से मिले सब जान लेते ।
झांक लेते तुम जो इन भीगे द्रगों में,
जान जाते पीर मन की प्यार मन का।
तो अमिट विश्वास के साये महकते,
प्यार की निश्वांस के पन्छी चहकते ॥
