saahityshyamसाहित्य श्याम

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बुधवार, 3 जून 2009

पीर मन की

जान लेते   पीर मन की     तुम अगर,
तो न भर निश्वांस झर-झर अश्रु झरते।
देख लेते जो  द्रगों के  अश्रु कण  तुम  ,
तो नहीं     विश्वास के  साये   बहकते ।

जान  जाते तुम कि तुमसे प्यार कितना,
है हमें,ओर तुम पे है एतवार  कितना  ।
देख लेते तुम अगर इक बार मुडकर  ,
खिल खिला उठतीं कली गुन्चे महकते।
 
महक उठती पवन,खिलते कमल सर में,
फ़ूल उठते सुमन करते भ्रमर गुन गुन ।
गीत अनहद का गगन् गुन्जार देता ,
गूंज उठती प्रक्रिति मेंवॊणा की गुन्जन ।

प्यार की   कोई भी   परिभाषा  नहीं है ,
मन के  भावों की कोई  भाषा नहीं है ।
प्रीति की भाषा नयन पहिचान लेते ,
नयन नयनों से मिले सब जान लेते ।

झांक लेते तुम जो इन भीगे द्रगों में,
जान  जाते पीर मन की प्यार मन का।
तो अमिट विश्वास के साये  महकते,
प्यार की निश्वांस के पन्छी चहकते ॥  

2 टिप्‍पणियां:

sakhi with feelings ने कहा…

bahut sunder bhav
झांक लेते तुम जो इन भीगे द्रगों में,
जान जाते पीर मन की प्यार मन का।
तो अमिट विश्वास के साये महकते,
प्यार की निश्वांस के पन्छी चहकते ॥

sahi kaha..magar jaanna mushkil nahi magar koi koshish nahi karta shayd.
acha likha hai..
magar krishan lila nahi dikhi mujhe
regards
sakhi

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

next post --krishn lilaa.