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बुधवार, 30 अगस्त 2017

राधाष्टमी के अवसर पर--डा श्याम गुप्त के पद-----

                                          कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

 



                            

राधाष्टमी के अवसर पर--डा श्याम गुप्त के पद-----

१.
राधाजी मैं तो बिनती करूँ ।
दर्शन दे कर श्याम मिलादो,पैर तिहारे पडूँ ।
लाख चौरासी योनि में भटका, कैसे धीर धरूँ ।
जन्म मिला नर , प्रभु वंदन को,सौ सौ जतन करूँ ।
राधे-गोविन्द, राधे-गोविन् , नित नित ध्यान धरूँ ।
जनम जनम के बन्ध कटें जब, मोहन दर्श करूँ ।
श्याम, श्याम के दर्शन हित नित राधा पद सुमिरूँ ।
युगल रूप के दर्शन पाऊँ, भव -सागर उतरूँ ॥

२.
जनमु लियो वृषभानु लली |
आदि-शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली |
जलज-चक्र रवि-तनया विलसति, सुलसित लसति भली |
पंकज-दल सम खिलि-खिलि सोहे, कुसुमित कंज अली |
पलकन पुट-पट मुंदे श्याम’ लखि मैया नेह छली |
विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली |
नित नित चंद्रकला सम बाढ़हि, कोमल अंग् ढली |
बरसाने की लाड लड़ैती, लाड़न लाड़ पली ||
३.
कन्हैया उझकि उझकि निरखे |
स्वर्ण खचित पलना चित-चितवत केहि विधि प्रिय दरसै |
जहँ पौढ़ी वृषभानु लली, प्रभु दरसन कौं तरसै |
पलक पांवड़े मुंदे सखी के, नैन कमल थरकैं |
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों, फर फर फर फरके |
तीन लोक दरसन कौं तरसें, सो दरसन तरसै |
ये तो नैना बंद किये हैं, कान्हा बैननि परखे |
अचरज एक भयो ताही छिन, बरसानौ सरसे |
खोलि दिए दृग भानुलली,मिलि नैन, नैन हरषे|
दृष्टिहीन माया, लखि दृष्टा, दृष्टि खोलि निरखे|
बिन दृष्टा के दर्श श्याम, कब जगत दीठ बरसै ||
४.
राधा रानी दर्पण निरखि सिहावैं |
आपुहि लखि, आपुहि की शोभा, आपुहि आपु लजावें |
आदि-शक्ति धरि माया छवि ज्यों माया भरम सजावै |
माया ही माया से लिपटे, माया भ्रम उपजावै |
माया ते जग-जीवन उपजे, जीवन मरम बतावै |
ताही छिन छवि श्याम की उभरी, राधा लखि सकुचावै |
इत-उत चहुँ दिशि ढूँढन लागी, कान्हा कतहु न पावै |
कबहु आपु छवि, कबहु श्याम छवि, लखि आपुहि भरमावै |
समुझ श्याम-लीला, भ्रम आपुन, मन ही मन मुसुकावै |
ब्रह्म की माया, माया नाचे, जीवन-जगत नचावै |
माया-ब्रह्म लीला-कौतुक लखि, श्याम’ सहज सुख पावै ||
५.
काहे न मन धीर धरे घनश्याम |
तुम जो कहत हम एक विलगि कब हैं राधे ओ श्याम ।
फ़िर क्यों तडपत ह्रदय जलज यह समुझाओ हे श्याम !
सान्झ होय और ढले अर्क, नित बरसाने घर-ग्राम ।
जावें खग मृग करत कोलाहल अपने-अपने धाम।
घेरे रहत क्यों एक ही शंका मोहे सुबहो-शाम।
दूर चले जाओगे हे प्रभु! छोड़ के गोकुल धाम ।
कैसे विरहन रात कटेगी, बीतें आठों याम ।
राधा की हर सांस सांवरिया, रोम रोम में श्याम।
श्याम', श्याम-श्यामा लीला लखि पायो सुख अभिराम ।
६.
राधे काहे न धीर धरो ।
मैं पर-ब्रह्म ,जगत हित कारण, माया भरम परो ।
तुम तो स्वयं प्रकृति-माया ,मम अन्तर वास करो।
एक तत्व गुन, भासें जग दुई, जगमग रूप धरो।
राधा-श्याम एक ही रूपक ,विलगि न भाव भरो।
रोम-रोम हर सांस सांस में, राधे ! तुम विचरो ।
श्याम, श्याम-श्यामा लीला लखि,जग जीवन सुधरो।



सोमवार, 28 दिसंबर 2009

डा. श्याम गुप्त के पद-----

पद- गीत का एक रूप है, भक्त कवियों द्वारा यह मुख्यतः प्रयोग किया गया है।िसमें प्रथम पन्क्ति टेक की भान्ति कम मात्रा की , लगभग आधी व अन्य सभी पन्क्तियांपूरी होतीं हैं।न्क्तियो हिन्दी में दो मुख्य धारा मिलतीं हैं---सूर दास की पद धारा -जिसमें सभी पन्क्तियों में वही अन्त्यानुप्रास रहता है। दूसरी तुलसी की पद धारा--जिसमें दो दो पन्क्तियों के अन्त्यानुप्रास होते हैं, जो हर दो पन्क्तियों
१. सूरदास परम्परा--



को तुम कौन कहां ते आई।
पहली बेरि मिली हौ गोरी का ब्रज कबहुं न आई।
बरसानौ है धाम हमारो, खेलत निज अंगनाई ।
सुनी कथा दधि माखन चोरी,गोपिन सन्ग ढिढाई।
हिलिमिलि चलि दधि-माखन खैयें तुम्हरो कछु न चुराई।
मन ही मन मुसुकाइ किशोरी कान्हा की चतुराई।
नैन नैन मिलि सुधि बुधि भूली भूलि गई ठकुराई।
चन्चल चपल चतुर बतियां सुनि राधा मन भरमाई ।
हरि हरिप्रिया मनुज लीला लखि सुर नर मुनि मुसुकाई॥



२. तुलसी परम्परा---



सुअना मन के भरम परे ।



जैसा अन्न हो जैसी सन्गति सोई धर्म धरे ।





संतन देरा वास करे जे राम नाम गुन गाये।
अन्न भखे गणिका के घर ते, दुष्ट बचन चिल्लाये।



परि भुजन्ग मुख बने गरल, और मोती सीप समाई।
परे केर के पात स्वाति जल, सो कपूर बनि जाई ।



दीपक गुन बनि मिटे अन्धेरो,चरखा सूत बुने ।
सोई कपास सन्ग अनल-अनिल केघर को भसम करे।



काम क्रोध मद मोह लोभ अति बैरी राह छिपे हैं ।
ये सारे मन के गुन सुअना,तिरगुन भरम भरे हैं ।



चिअ चितवन चातुर्य विषय वश हित अनहित ही भावै ।
माया मन की सहज़ व्रित्ति मन सुगम राह ही जावै ।



काल उरग साये मे सब जग,भ्रम वश प्रभु बिसरे ।
एक धर्म बस श्याम नाम , नर भव सागर उतरे ॥