साहित्य के नाम पर जाने क्या क्या लिखा जा रहा है रचनाकार चट्पटे, बिक्री योग्य, बाज़ारवाद के प्रभाव में कुछ भी लिख रहे हैं बिना यह देखे कि उसका समाज साहित्य कला , कविता पर क्या प्रभाव होगा। मूलतः कवि गण-विश्व सत्य, दिन मान बन चुके तथ्यों ( मील के पत्थर) को ध्यान में रखेबिना अपना भोगा हुआ लिखने में लगे हैं जो पूर्ण व सर्वकालिक सत्य नहीं होता। अतः साहित्य , पुरा संस्कृति व नवीनता के समन्वित भावों के प्राकट्य हेतु मैंने इस क्षेत्र में कदम रखा। कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित......
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गुरुवार, 2 जुलाई 2020
बुधवार, 19 दिसंबर 2018
पीर ज़माने की -ग़ज़ल संग्रह---२----आगे...प्रस्तावना ---साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ---डा श्याम गुप्त
कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित
------क्रमश --पीर ज़माने की----आगे-- 1. बात ग़ज़ल की ....
पीर ज़माने की -ग़ज़ल संग्रह-------आगे......२....
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प्रस्तावना ---साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
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प्रस्तावना ---साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
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डा श्यामगुप्त हिन्दी साहित्य में एक ऐसा नाम है जिसे भुलाया नहीं जा सकता | महाकाव्य ‘सृष्टि’ एवं ‘शूर्पणखा खंडकाव्य’ लिखकर वे आज महाकवि के रूप में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर जाने जाते हैं |
------ डा श्यामगुप्त का पूरा नाम डा.श्यामबाबू गुप्ता है | आगरा विश्वविद्यालय से एमबीबीएस, एम.एस.(शल्य) की डिग्री प्राप्त करने के उपरांत भारतीय रेलवे में शल्य-चिकित्सक के रूप में कार्यरत रहे | लखनऊ रेलवे अस्पताल में रहते हुए वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए |
------ डा श्यामगुप्त का साहित्य के प्रति लगाव बचपन से ही रहा | माता-पिता, बड़े भाई सभी शिक्षा व साहित्य से जुड़े रहे |
-------ब्रजक्षेत्र में जन्म होने के कारण स्वाभाविकरूप से कृष्ण-काव्य लेखन में विशेष रूचि रही | सुकवि डा श्यामगुप्त की लगभग एक दर्जन साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित होकर लोकार्पित हो चुकी हैं |
\
कविवर डा.श्यामगुप्त एक प्रयोगधर्मी साहित्यकार हैं | वे साहित्य के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं | वस्तुतः साहित्यकार को प्रयोगधर्मी होना चाहिए, मैं भी स्वयं को एक प्रयोगधर्मी साहित्यकार मानता हूँ इसलिए मेरा व उनका सम्बन्ध साहित्य के क्षेत्र में मिशाल बना हुआ है |
\
१९६६ ई में मेरे द्वारा चलाई हुई अगीत काव्य-विधा का सम्पूर्ण इतिहास व उसका छंद-विधान डा श्यामगुप्त द्वारा रचे गये लक्षण ग्रन्थ ‘अगीत साहित्य दर्पण’ के नाम से प्रकाशित हुआ |
------- यह ग्रन्थ अगीत काव्य-विधा को समझने हेतु मील का पत्थर सिद्ध हुआ | आपकी काव्यदूत, प्रेमकाव्य महाकाव्य, कुछ शायरी की बात होजाए, अगीत-त्रयी, ब्रजबांसुरी, ईशोपनिष का काव्यभावानुवाद, तुम तुम और तुम, प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह आदि चर्चित कृतियाँ प्रकाशित होचुकी हैं|
--------आपकी नवीनतम कृति ‘पीर ज़माने की’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित होकर शीघ् ही विज्ञ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होने जा रही है | यह खड़ीबोली हिन्दी में प्रकाशित हो रही है |
\
उर्दू की कोई लिपि नहीं है, अरबी-फारसी विदेशी लिपियाँ हैं जो बाहर से भारतवर्ष में आईं हैं | उर्दू शायरी भी अब धीरे धीरे नवीन प्रयोगों की ओर बढ़ रही है | उर्दू शायरी के दो प्रसिद्ध स्कूल हैं—१.दिल्ली स्कूल...२.लखनऊ स्कूल, हैदराबाद में बोली जाने वाली दक्खिनी उर्दू अलग है |
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हिन्दी में ग़ज़ल लिखने वालों में दुष्यंत कुमार को पहला रचनाकार/गज़लकार माना जाता है | श्री बलबीर सिंह रंग, पद्मश्री गोपालदास नीरज, राम बहादुर सिंह भदौरिया, ने हिन्दी में अच्छी गज़लें लिखी हैं|
------- नए लोगों में डा श्यामगुप्त, डा मंजू सक्सेना, विजयकुमारी मौर्या विजय, तरुण प्रकाश, डा हरि फैजाबादी, मिजाज़ लखनवी, मंजुल मंजर लखनवी, आदि के नाम लिए जा सकते हैं|
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डा श्यामगुप्त की गज़लें व अन्य शायरी मूलतः लखनऊ स्कूल से जुडी हुईं मानी जायगीं | उर्दू में मिर्ज़ा गालिव और उसके बाद फिराक गोरखपुरी की शायरी नए रचनाकारों के लिए मील का पत्त्थर बनी |
-------उर्दू ग़ज़ल व हिन्दी ग़ज़ल के बारे में इस संग्रह के आरम्भ में अपने कथ्यांकन ‘बात ग़ज़ल की’ के अंतर्गत महाकवि डा श्यामगुप्त जी ने ग़ज़लों के प्रकार, उनमें नवीन प्रयोगों तथा रचनाकारों का उल्लेख करते हुए अपनी बात विस्तार से उदाहरण सहित चर्चा की है | मैं उस गहराई में न जाकर कुछ बातें प्रस्तुत कृति ‘पीर ज़माने की’ के बारे में करूंगा |
-------प्रार्थना शीर्षक में गज़लकार डा गुप्त अपनी बात कहते हुए प्रभु से दर्शन देने की प्रार्थना करते हैं—
‘राह आधी आगया हूँ, अब चला जाता नहीं |
हो कृपा सागर तो दर्शन यहीं आकर दीजिये |
------ डा श्यामगुप्त का पूरा नाम डा.श्यामबाबू गुप्ता है | आगरा विश्वविद्यालय से एमबीबीएस, एम.एस.(शल्य) की डिग्री प्राप्त करने के उपरांत भारतीय रेलवे में शल्य-चिकित्सक के रूप में कार्यरत रहे | लखनऊ रेलवे अस्पताल में रहते हुए वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए |
------ डा श्यामगुप्त का साहित्य के प्रति लगाव बचपन से ही रहा | माता-पिता, बड़े भाई सभी शिक्षा व साहित्य से जुड़े रहे |
-------ब्रजक्षेत्र में जन्म होने के कारण स्वाभाविकरूप से कृष्ण-काव्य लेखन में विशेष रूचि रही | सुकवि डा श्यामगुप्त की लगभग एक दर्जन साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित होकर लोकार्पित हो चुकी हैं |
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कविवर डा.श्यामगुप्त एक प्रयोगधर्मी साहित्यकार हैं | वे साहित्य के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं | वस्तुतः साहित्यकार को प्रयोगधर्मी होना चाहिए, मैं भी स्वयं को एक प्रयोगधर्मी साहित्यकार मानता हूँ इसलिए मेरा व उनका सम्बन्ध साहित्य के क्षेत्र में मिशाल बना हुआ है |
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१९६६ ई में मेरे द्वारा चलाई हुई अगीत काव्य-विधा का सम्पूर्ण इतिहास व उसका छंद-विधान डा श्यामगुप्त द्वारा रचे गये लक्षण ग्रन्थ ‘अगीत साहित्य दर्पण’ के नाम से प्रकाशित हुआ |
------- यह ग्रन्थ अगीत काव्य-विधा को समझने हेतु मील का पत्थर सिद्ध हुआ | आपकी काव्यदूत, प्रेमकाव्य महाकाव्य, कुछ शायरी की बात होजाए, अगीत-त्रयी, ब्रजबांसुरी, ईशोपनिष का काव्यभावानुवाद, तुम तुम और तुम, प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह आदि चर्चित कृतियाँ प्रकाशित होचुकी हैं|
--------आपकी नवीनतम कृति ‘पीर ज़माने की’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित होकर शीघ् ही विज्ञ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होने जा रही है | यह खड़ीबोली हिन्दी में प्रकाशित हो रही है |
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उर्दू की कोई लिपि नहीं है, अरबी-फारसी विदेशी लिपियाँ हैं जो बाहर से भारतवर्ष में आईं हैं | उर्दू शायरी भी अब धीरे धीरे नवीन प्रयोगों की ओर बढ़ रही है | उर्दू शायरी के दो प्रसिद्ध स्कूल हैं—१.दिल्ली स्कूल...२.लखनऊ स्कूल, हैदराबाद में बोली जाने वाली दक्खिनी उर्दू अलग है |
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हिन्दी में ग़ज़ल लिखने वालों में दुष्यंत कुमार को पहला रचनाकार/गज़लकार माना जाता है | श्री बलबीर सिंह रंग, पद्मश्री गोपालदास नीरज, राम बहादुर सिंह भदौरिया, ने हिन्दी में अच्छी गज़लें लिखी हैं|
------- नए लोगों में डा श्यामगुप्त, डा मंजू सक्सेना, विजयकुमारी मौर्या विजय, तरुण प्रकाश, डा हरि फैजाबादी, मिजाज़ लखनवी, मंजुल मंजर लखनवी, आदि के नाम लिए जा सकते हैं|
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डा श्यामगुप्त की गज़लें व अन्य शायरी मूलतः लखनऊ स्कूल से जुडी हुईं मानी जायगीं | उर्दू में मिर्ज़ा गालिव और उसके बाद फिराक गोरखपुरी की शायरी नए रचनाकारों के लिए मील का पत्त्थर बनी |
-------उर्दू ग़ज़ल व हिन्दी ग़ज़ल के बारे में इस संग्रह के आरम्भ में अपने कथ्यांकन ‘बात ग़ज़ल की’ के अंतर्गत महाकवि डा श्यामगुप्त जी ने ग़ज़लों के प्रकार, उनमें नवीन प्रयोगों तथा रचनाकारों का उल्लेख करते हुए अपनी बात विस्तार से उदाहरण सहित चर्चा की है | मैं उस गहराई में न जाकर कुछ बातें प्रस्तुत कृति ‘पीर ज़माने की’ के बारे में करूंगा |
-------प्रार्थना शीर्षक में गज़लकार डा गुप्त अपनी बात कहते हुए प्रभु से दर्शन देने की प्रार्थना करते हैं—
‘राह आधी आगया हूँ, अब चला जाता नहीं |
हो कृपा सागर तो दर्शन यहीं आकर दीजिये |
----- कृति शीर्षक की ग़ज़ल ‘पीर ज़माने की ‘ में ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं---
उसमें घुसने की, मुझको ही मनाही है,
दरो-दीवार जो मैंने ही बनाई है |
X x x
वो दिल कोइ दिल नहीं जिसमें ,
भावों की नहीं बजती शहनाई है |
\
‘आज आदमी ‘ शीर्षक ग़ज़ल की निम्न पंक्तियों में आदमी का सच्चा चित्रण देखिये---
‘अब आदमी के सर पर बैठा है आदमी ,
छत अपने सर की ढूँढता है आज आदमी |
x x x
लड़ते थे पेच पतंग के, अंखियों के पेच भी,
सब खोजता ही रह गया आज आदमी |
\
‘ग़ज़ल ज्ञान’ नामक ग़ज़ल में ग़ज़ल का ज्ञान देखिये ----
गजल की कोई किस्म नहीं होती है दोस्तो,
ग़ज़ल का जिस्म उसकी रूह ही होती है दोस्तो |
x x x
मस्ती में झूम कहदें श्याम, ग़ज़ल ज्ञान क्या,
हर ग़ज़ल सागर ज्ञान का ही होती है दोस्तों |
------ होली राष्ट्रीय त्यौहार है आज होली है शीर्षक ग़ज़ल की चार पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं---
बौराई सी घूमे वो नई नवेली दुल्हन,
घर भर को चढ़ा बुखार कि आज होली है |
x x x
इतरा के उसने मल दिया मुख पर गुलाल श्याम,
तन मन खिली रंगोली कि आज होली है |
\
‘अंदाज़े बयाँ ज़िंदगी का’ ...में ज़िंदगी जीने का मकसद बयां किया गया है | मुझे न छेड़ो, ग़ज़ल, कविता कामिनी, गज़लोपनिषद, तटबंध होना चाहिए, वो अपने आप देता है, तू वही है, लिखी जाने लगी है ग़ज़ल, ग़ज़ल की ग़ज़ल, भ्रम से घिरे हैं लोग, नियम, गंगा प्रदूषण, माँ का वंदन आदि गज़ले सामाजिक सरोकारों से जुडी हुई हैं और कोई ने कोई नूतन सन्देश समाज के लिए प्रेषित करती हैं|
------ग़ज़ल माँ का वंदन की पंक्तयां देखें—
फिर आज माँ की याद आयी सुबह सुबह,
शीतल पवन सी घर में आयी सुबह सुबह |
------ गज़लें अंदाज़े बयाँ ज़िंदगी का, दीप जले, जश्न मनाता चल, दोस्त, क्या होगा, आदमी आदि बुद्धिजीवियों के लिए पठनीय हैं| यथा—
हम जो खुद अच्छे रहें अच्छा रहे हर आदमी ,
श्याम क्यों यह अज तक समझा नहीं हर आदमी |
उसमें घुसने की, मुझको ही मनाही है,
दरो-दीवार जो मैंने ही बनाई है |
X x x
वो दिल कोइ दिल नहीं जिसमें ,
भावों की नहीं बजती शहनाई है |
\
‘आज आदमी ‘ शीर्षक ग़ज़ल की निम्न पंक्तियों में आदमी का सच्चा चित्रण देखिये---
‘अब आदमी के सर पर बैठा है आदमी ,
छत अपने सर की ढूँढता है आज आदमी |
x x x
लड़ते थे पेच पतंग के, अंखियों के पेच भी,
सब खोजता ही रह गया आज आदमी |
\
‘ग़ज़ल ज्ञान’ नामक ग़ज़ल में ग़ज़ल का ज्ञान देखिये ----
गजल की कोई किस्म नहीं होती है दोस्तो,
ग़ज़ल का जिस्म उसकी रूह ही होती है दोस्तो |
x x x
मस्ती में झूम कहदें श्याम, ग़ज़ल ज्ञान क्या,
हर ग़ज़ल सागर ज्ञान का ही होती है दोस्तों |
------ होली राष्ट्रीय त्यौहार है आज होली है शीर्षक ग़ज़ल की चार पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं---
बौराई सी घूमे वो नई नवेली दुल्हन,
घर भर को चढ़ा बुखार कि आज होली है |
x x x
इतरा के उसने मल दिया मुख पर गुलाल श्याम,
तन मन खिली रंगोली कि आज होली है |
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‘अंदाज़े बयाँ ज़िंदगी का’ ...में ज़िंदगी जीने का मकसद बयां किया गया है | मुझे न छेड़ो, ग़ज़ल, कविता कामिनी, गज़लोपनिषद, तटबंध होना चाहिए, वो अपने आप देता है, तू वही है, लिखी जाने लगी है ग़ज़ल, ग़ज़ल की ग़ज़ल, भ्रम से घिरे हैं लोग, नियम, गंगा प्रदूषण, माँ का वंदन आदि गज़ले सामाजिक सरोकारों से जुडी हुई हैं और कोई ने कोई नूतन सन्देश समाज के लिए प्रेषित करती हैं|
------ग़ज़ल माँ का वंदन की पंक्तयां देखें—
फिर आज माँ की याद आयी सुबह सुबह,
शीतल पवन सी घर में आयी सुबह सुबह |
------ गज़लें अंदाज़े बयाँ ज़िंदगी का, दीप जले, जश्न मनाता चल, दोस्त, क्या होगा, आदमी आदि बुद्धिजीवियों के लिए पठनीय हैं| यथा—
हम जो खुद अच्छे रहें अच्छा रहे हर आदमी ,
श्याम क्यों यह अज तक समझा नहीं हर आदमी |
------- प्रेम पियाला पीते रहो, आँख का पानी, ग़ज़ल होती है, ख्वाहिशें, पुरस्कार की हसरत , वल्लाह न जाइए, कोई तो मामिला होगा, घट पाप का आदि गज़लें नए प्रयोगों से परिपूर्ण हैं |
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गजलों की भाषा खड़ीबोली हिन्दी है कहीं कहीं उर्दू व अपभ्रंश शब्द आवश्यकतानुसार पाए जाते हैं | ब्रज व अवधी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है | ------शैली प्रवाहपूर्ण व बोधगम्य है| सभी गज़लें प्रसाद गुण से युक्त हैं | अलंकारों की छटा भी यत्र तत्र देखने को मिलाती है, अनुप्रास का प्रयोग अधिक हुआ है | डा श्यामगुप्त आगरा के निवासी हैं उनका कार्यक्षेत्र लम्बे समय तक लखनऊ रहा है अतः महाकवि के इस पूरे संग्रह में गंगा-जमुनी तहजीब की भाव-छटा देखने को मिलती है |
-------- डा श्यामगुप्त के प्रस्तुत संग्रह ‘पीर ज़माने की’ में नयी और पुरानी पीढी के रचनाकारों को कुछ न कुछ सीख अवश्य मिलेगी तथा यह ग़ज़ल संग्रह, ग़ज़ल संग्रहों की कड़ी में एक मील का पत्थर साबित होगा | ऐसा मेरा दृढ विश्वास है |
------ महाकवि श्यामगुप्त की कारयित्री प्रतिभा को मैं अपने चारों ओर परिक्रमित पाता हूँ | उनकी दिनों दिन साहित्यिक क्षेत्र में बढ़ती यश:कीर्ति मुझे भी प्रोत्साहित करती है | इस ग़ज़ल संग्रह से उर्दू हिन्दी ग़ज़लों की लिखने की जानकारी मिल सकती है, अतः यह पाठ्यक्रम में भी लगाने लायक है | महाकवि डा श्यामगुप्त लिखते रहें ,खूब लिखते रहें, वादे वादे जायते तत्वबोध के परिप्रेक्ष्य में, मैं इस ग़ज़ल संग्रह का स्वागत करता हूँ एवं अपनी समस्त शुभकामनाएं संप्रेषित करता हूँ |
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गजलों की भाषा खड़ीबोली हिन्दी है कहीं कहीं उर्दू व अपभ्रंश शब्द आवश्यकतानुसार पाए जाते हैं | ब्रज व अवधी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है | ------शैली प्रवाहपूर्ण व बोधगम्य है| सभी गज़लें प्रसाद गुण से युक्त हैं | अलंकारों की छटा भी यत्र तत्र देखने को मिलाती है, अनुप्रास का प्रयोग अधिक हुआ है | डा श्यामगुप्त आगरा के निवासी हैं उनका कार्यक्षेत्र लम्बे समय तक लखनऊ रहा है अतः महाकवि के इस पूरे संग्रह में गंगा-जमुनी तहजीब की भाव-छटा देखने को मिलती है |
-------- डा श्यामगुप्त के प्रस्तुत संग्रह ‘पीर ज़माने की’ में नयी और पुरानी पीढी के रचनाकारों को कुछ न कुछ सीख अवश्य मिलेगी तथा यह ग़ज़ल संग्रह, ग़ज़ल संग्रहों की कड़ी में एक मील का पत्थर साबित होगा | ऐसा मेरा दृढ विश्वास है |
------ महाकवि श्यामगुप्त की कारयित्री प्रतिभा को मैं अपने चारों ओर परिक्रमित पाता हूँ | उनकी दिनों दिन साहित्यिक क्षेत्र में बढ़ती यश:कीर्ति मुझे भी प्रोत्साहित करती है | इस ग़ज़ल संग्रह से उर्दू हिन्दी ग़ज़लों की लिखने की जानकारी मिल सकती है, अतः यह पाठ्यक्रम में भी लगाने लायक है | महाकवि डा श्यामगुप्त लिखते रहें ,खूब लिखते रहें, वादे वादे जायते तत्वबोध के परिप्रेक्ष्य में, मैं इस ग़ज़ल संग्रह का स्वागत करता हूँ एवं अपनी समस्त शुभकामनाएं संप्रेषित करता हूँ |
दि. ०१ फरवरी, २०१८ ई.गुरूवार शुभेच्छु
अगीतायन, ई-३८८५, साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य डीलिट.
राजाजीपुरम लखनऊ -१७ संस्थापक /अध्यक्ष,
दू.भा.०५२२-२४१४ ८१७ अखिल भारतीय अगीत परिषद्,
लखनऊ
मो.९३३५९९०४३५
अगीतायन, ई-३८८५, साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य डीलिट.
राजाजीपुरम लखनऊ -१७ संस्थापक /अध्यक्ष,
दू.भा.०५२२-२४१४ ८१७ अखिल भारतीय अगीत परिषद्,
लखनऊ
मो.९३३५९९०४३५
------क्रमश --पीर ज़माने की----आगे-- 1. बात ग़ज़ल की ....
सोमवार, 17 दिसंबर 2018
डा श्यामगुप्त का नया ग़ज़ल-संग्रह ‘पीर ज़माने की----- क्रमिक पोस्ट---१......डा श्याम गुप्त ...
कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित
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डा श्यामगुप्त का नया ग़ज़ल-संग्रह ‘पीर ज़माने की----- क्रमिक पोस्ट---
\
अनुशंसा ---- डा सुलतान शाकिर हाशमी ----
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महाकवि डा श्यामगुप्त का नया ग़ज़ल-संग्रह ‘पीर ज़माने की’ प्रकाशित होरहा है जिसमें उन्होंने उनके मन-लुभावनी, उत्साहवर्धक एवं तनाव को खुशी में, दुःख को शांति में बदलने की क्षमता रखने वाली अपनी सोच का एक अनूठा दर्पण शायरी के रूप में प्रस्तुत करके शायरी के खजाने को मालामाल किया है |
------उनकी नवीन उद्भावनाओं को देखकर आत्मचिंतन, आत्ममंथन एवं एकाग्रता का एहसास खुद ब खुद पैदा होजाता है |
\
डा श्यामगुप्त का नवीन संग्रह ‘पीर ज़माने की ‘ उनके द्वारा लिखित अनेक लोकप्रिय ग़ज़ल संग्रहों की परम्परा में एक नया अध्याय आपके समक्ष प्रस्तुत है,
------जिसमें एक संपन्न कवि की प्रतिभा, वैभव एवं चिन्तन को ग़ज़ल के धरातल पर शिद्दत से महसूस किया जा सकता है |
------डा श्यामगुप्त ने शुरू में ही ‘ग़ज़ल की बात’ में स्पष्ट रूप से लिखा है की काफिया, रदीफ़, गैर–रदीफ़ ग़ज़ल, कसीदा और ग़ज़ल का अर्थ क्या होता है |
------ग़ज़ल की परम्परा और इतिहास पर उनका ये तुलनात्मक लेख उनकी विद्वता का परिचायक है | वह लिखते हैं---
===========================================
महाकवि डा श्यामगुप्त का नया ग़ज़ल-संग्रह ‘पीर ज़माने की’ प्रकाशित होरहा है जिसमें उन्होंने उनके मन-लुभावनी, उत्साहवर्धक एवं तनाव को खुशी में, दुःख को शांति में बदलने की क्षमता रखने वाली अपनी सोच का एक अनूठा दर्पण शायरी के रूप में प्रस्तुत करके शायरी के खजाने को मालामाल किया है |
------उनकी नवीन उद्भावनाओं को देखकर आत्मचिंतन, आत्ममंथन एवं एकाग्रता का एहसास खुद ब खुद पैदा होजाता है |
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डा श्यामगुप्त का नवीन संग्रह ‘पीर ज़माने की ‘ उनके द्वारा लिखित अनेक लोकप्रिय ग़ज़ल संग्रहों की परम्परा में एक नया अध्याय आपके समक्ष प्रस्तुत है,
------जिसमें एक संपन्न कवि की प्रतिभा, वैभव एवं चिन्तन को ग़ज़ल के धरातल पर शिद्दत से महसूस किया जा सकता है |
------डा श्यामगुप्त ने शुरू में ही ‘ग़ज़ल की बात’ में स्पष्ट रूप से लिखा है की काफिया, रदीफ़, गैर–रदीफ़ ग़ज़ल, कसीदा और ग़ज़ल का अर्थ क्या होता है |
------ग़ज़ल की परम्परा और इतिहास पर उनका ये तुलनात्मक लेख उनकी विद्वता का परिचायक है | वह लिखते हैं---
‘मतला बगैर हो ग़ज़ल, हो रदीफ़ भी नहीं ,
यह तो ग़ज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं |
\
इसी तरह डा श्यामगुप्त अन्य ख़ूबसूरत शेर पेश करते हुए लिखते हैं—
यह तो ग़ज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं |
\
इसी तरह डा श्यामगुप्त अन्य ख़ूबसूरत शेर पेश करते हुए लिखते हैं—
‘उसमें घुसने की मुझको ही मनाही है,
दरो-दीवार जो मैंने ही बनाई है |’
दरो-दीवार जो मैंने ही बनाई है |’
‘इस सूरतो रंग का क्या फ़ायदा’ श्याम,
जो मन नहीं पीर जमाने की समाई है |’
जो मन नहीं पीर जमाने की समाई है |’
--------इसी तरह वह छोटी बहर में बहुत आसान ग़ज़ल ‘खुशी लुटाकर खुश ‘ में इस तरह के शेर प्रस्तुत करते हैं जो दिलों को मोह लेने का दम रखते हैं, जैसे ---
देख मुझको जला होगा,
वो कोइ दिलजला होगा |
देख मुझको जला होगा,
वो कोइ दिलजला होगा |
गज़ब हैं श्याम की गज़लें,
कोइ तो मामिला होगा | ----तथा----
कोइ तो मामिला होगा | ----तथा----
‘कोई गले लगा कर खुश,
कोई हमें सताकर खुश |
कोई हमें सताकर खुश |
कोई सबकुछ पाकर खुश,
श्याम तो खुशी लुटाकर खुश |’
\
गजल ‘आज आदमी ‘ में वह इस तरह मुखर होते हैं जैसे वक्त की सचाई बयां कर रहे हों ----
‘अब आदमी के सर पे बैठा आज आदमी,
छत अपने सर की ढूंढता आज आदमी |
श्याम तो खुशी लुटाकर खुश |’
\
गजल ‘आज आदमी ‘ में वह इस तरह मुखर होते हैं जैसे वक्त की सचाई बयां कर रहे हों ----
‘अब आदमी के सर पे बैठा आज आदमी,
छत अपने सर की ढूंढता आज आदमी |
हर आदमी है त्रस्त मगर होंठ बंद हैं,
अपने ही मकड़जाल बंधा आज आदमी |
\
चूंकि डा श्यामगुप्त स्वयं में कलम व कलाम के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं इसलिए वह ‘कविता–कामिनी’ में लिखते हैं---
अपने ही मकड़जाल बंधा आज आदमी |
\
चूंकि डा श्यामगुप्त स्वयं में कलम व कलाम के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं इसलिए वह ‘कविता–कामिनी’ में लिखते हैं---
‘किस दिल में कविता-कामिनी का राज नहीं है |
है बात और काव्य जो दिलसाज नहीं है |’
है बात और काव्य जो दिलसाज नहीं है |’
कवि बादशाह है सदा अपने कलाम का ,
है बात और उसके सर पे ताज नहीं है |’
\
डा श्यामगुप्त को उर्दू ग़ज़ल के बुनियादी उसूल अच्छी तरह मालूम हैं तभी वह मतला और मख्ता भी जानते हैं और काफिया रदीफ़ भी |
-------उन्होंने अपनी शायरी में जिन्हें अच्छी तरह बरता भी है | वह कहते हैं---
है बात और उसके सर पे ताज नहीं है |’
\
डा श्यामगुप्त को उर्दू ग़ज़ल के बुनियादी उसूल अच्छी तरह मालूम हैं तभी वह मतला और मख्ता भी जानते हैं और काफिया रदीफ़ भी |
-------उन्होंने अपनी शायरी में जिन्हें अच्छी तरह बरता भी है | वह कहते हैं---
शेर मतले का न हो तो कुंवारी ग़ज़ल होती है ,
हो काफिया ही जो नहीं, बेचारी ग़ज़ल होती है |
हो काफिया ही जो नहीं, बेचारी ग़ज़ल होती है |
हर शेर एक भाव हो वो जारी गजल होती है,
हर शेर नया अंदाज़ हो वो भारी ग़ज़ल होती है || ----एवं—
हर शेर नया अंदाज़ हो वो भारी ग़ज़ल होती है || ----एवं—
कुछ तुम रुको कुछ हम रुकें चलती रहे ये ज़िंदगी |
कुझ तुम झुको कुछ हम झुकें ढलती रहे ये ज़िंदगी |
कुझ तुम झुको कुछ हम झुकें ढलती रहे ये ज़िंदगी |
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें सुनती रहे ये ज़िंदगी ,|
कुछ तुम सुनो कुछ हम सुनें कहती रहे ये ज़िंदगी |
\
इसी तरह डा श्यामगुप्त के इस नए ग़ज़ल संग्रह ‘पीर ज़माने की; में ऐसी बेशुमार गज़लें मौजूद हैं जिसमें दो पंक्तियों की शायरी के नियमों में बंधी हुई जो गज़लें देखी हैं वह भाव और विचारों से परिपूर्ण हैं,
------- बल्कि एसी ही शायरी को ग़ज़ल कहते हैं और शायरी में गजलों को मालिका कहा जाता है |
--------वह शायरी जिसमें सुन्दरता हो, तुकांत, लय, गति, भाव, विषय और प्रवाह हो जिसे पढ़ते पढ़ते शायरी के सागर में डूबने का ऐहसास, वादियों में घूमने का पुरमस्त कैफ, जवान और वयान की नुदरत साफ़ व शफ्फाफ़ नज़र आती हो |
-------डा श्यामगुप्त ऐसी ही शायरी के लिए जाने जाते हैं | मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ और इस नए संग्रह के लिए अपनी शुभकामनाएं प्रस्तुत करता हूँ |
--- डा सुलतान शाकिर हाशमी
पूर्व सलाहकार सदस्य, योजना आयोग, भारत सरकार
मो. ८०९०३०१४७१ ..
कुछ तुम सुनो कुछ हम सुनें कहती रहे ये ज़िंदगी |
\
इसी तरह डा श्यामगुप्त के इस नए ग़ज़ल संग्रह ‘पीर ज़माने की; में ऐसी बेशुमार गज़लें मौजूद हैं जिसमें दो पंक्तियों की शायरी के नियमों में बंधी हुई जो गज़लें देखी हैं वह भाव और विचारों से परिपूर्ण हैं,
------- बल्कि एसी ही शायरी को ग़ज़ल कहते हैं और शायरी में गजलों को मालिका कहा जाता है |
--------वह शायरी जिसमें सुन्दरता हो, तुकांत, लय, गति, भाव, विषय और प्रवाह हो जिसे पढ़ते पढ़ते शायरी के सागर में डूबने का ऐहसास, वादियों में घूमने का पुरमस्त कैफ, जवान और वयान की नुदरत साफ़ व शफ्फाफ़ नज़र आती हो |
-------डा श्यामगुप्त ऐसी ही शायरी के लिए जाने जाते हैं | मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ और इस नए संग्रह के लिए अपनी शुभकामनाएं प्रस्तुत करता हूँ |
--- डा सुलतान शाकिर हाशमी
पूर्व सलाहकार सदस्य, योजना आयोग, भारत सरकार
मो. ८०९०३०१४७१ ..
------क्रमश --आगे --
प्रस्तावना ------
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