saahityshyamसाहित्य श्याम

यह ब्लॉग खोजें

Powered By Blogger

रविवार, 24 जुलाई 2011

प्रेम काव्य -षष्ठ -सुमनांजलि ....

                                                                      कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित.......



          प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है ..षष्ठ -सुमनान्जलि....रस श्रृंगार... इस सुमनांजलि में प्रेम के श्रृंगारिक भाव का वर्णन किया जायगा ...जो तीन खण्डों में ......(क)..संयोग श्रृंगार....(ख)..ऋतु-श्रृंगार तथा (ग)..वियोग श्रृंगार ....में दर्शाया गया है...


            (क)- संयोग श्रृंगार में --पाती, क्या कह दिया ,  मान सको तो,     मैं चाँद तुझे कैसे.....,  प्रिय तुमने किया श्रृंगार ,  पायल,   प्रियतम जब इस द्वारे आये,    सखि ! कैसे   व   मांग सिंदूरी ...आदि ९ रचनाएँ प्रस्तुत की जायगीं |
प्रथम रचना---
पाती .....
जो पवन मेरे तन से लिपट कर बही ,
चंदनी सी महक लेके आती रही |
मैं समझ ही गया ये सुरभि बावरी,
तेरे तन की छुअन लेके आती रही ||

तेरे तन की छुअन प्यार पाती बनी,
मेरे मन की कली जब खिलाने लगी |
मैं समझ ही गया लिख के पाती,मगन-
प्रीति-स्मृति में तू मुस्कुराती रही ||

जब गगन में दमक यूं उठी दामिनी,
मैं समझ ही गया तू है खुल कर हंसी |
मेरे गीतों सजे , वे वासंती ख़त,
ये हवा तुझको गाकर सुनाती रही ||

जब मयूरी ने जंगल में कुंजन किया,
मस्त होके मयूरा लगा नाचने |
मैं समझ ही गया, कोई रचना मेरी,
पढ़ ठुमकने लगी, तू ठुमकती रही ||

मैं समझ ही गया ये सुरभि बावरी,
मेरे गीतों से तुझको रिझाती रही |
जो पवन मेरे तन से लिपट कर बही ,
चंदनी सी महक लेके आती रही ||



द्वितीय रचना........क्या कह दिया...


तुमने आकर के हाथों से क्या छू दिया ,
मेरा आँचल निखर कंचनी होगया |
जाने नयनों ने नयनों से क्या क्या कहा ,
रूप पुलकित धवल चांदनी होगया |
तुमने आकर के हाथों से क्या छूदिया ,
मेरा आंचल निखर कंचनी हो गया ||


तेरी बातों में जाने कहाँ खोये हम,
भूल कर दीन-दुनिया तुम्हारे हुए |
तुमको ख्यालों में पाकर के बेसुध हुए ,
राज सारे ही दिल के बयाँ होगये ||
मृदु स्वरों से न जाने क्या तुमने कहा,
तन खनकती हुई करधनी होगया ||

आँगन आँगन फिरूं मन में होके मगन,
अब सुहाने लगे सब नदी बाग़ वन |
मन की मैना व कोकिल लगीं कूकने ,
एक होने लगे जैसे धरती - गगन ||
नर्म होठों से तुमने ये क्या छू दिया,
मेरा तन मन महक चंदनी होगया ||

मन का हिरना फिरे है इधर से उधर,
मस्त वीणा की झंकार मन में उठी |
मन में मलयज की शीतल लहर बह चली ,
पग की पायल झनन झन झनाने लगी |
तुमने साँसों में बस कर ये क्या कर दिया ,
तन बदन खिल कमल-पांखुरी होगया ||

मन में मनसिज कुसुम-शर से चलने लगे,
रंग बासन्ती आँखों में छाने लगा |
सारे तन में यूं कलियाँ चिटखने लगीं ,
मन तेरे सुर में ही सुर मिलाने लगा |
कितने रंगों से आँचल मेरा भर दिया,
मन तेरे प्यार की बांसुरी होगया ||

जाने नयनों ने नयनों से क्या क्या कहा,
रूप पुलकित धवल चांदनी होगया ||



तृतीय गीत ---


मान सको तो मान लो...

मान सको तो मान लो ,
मैंने तुमसे किया है प्यार |
तुम ही हो मेरे जीवन धन,
तुम ही मेरा प्यार -
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


तुम पर सारा जीवन वारूं ,
वारी सब संसार |
तुम्हीं प्यार की प्रथम किरण हो,
तुम ही अंतिम प्यार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


तुमसे जगीं भावनायें, मन-
उमड़े रंग हज़ार |
तुम दीपक हो मैं बाती हूँ,
तुम जीवन का सार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


जब जब आये मन को भाये,
हम कर बैठे प्यार |
हमने तुमसे प्यार किया है,
तुम मेरा संसार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


मानना चाहो मान लो मेरे,
इस मन का इज़हार |
तुमने हम से प्यार किया है,
अब कैसी मनुहार |
मैंने तुमसे किया है प्यार ||


चतुर्थ गीत ...


मैं चाँद तुझे कैसे कहदूं .....

मैं चाँद तुझे कैसे कहदूं ,
वो बदली में छुप जाता है |
तेरा सुन्दर मुखड़ा प्रियवर ,
घूंघट को भी दमका जाता है ||

बदली से निकल कर वो चंदा ,
अपनेपन पर इठलाता है |
तेरा चिलमन जब हटता है,
वह खुद ही शरमा जाता है ||

जो दाग चाँद के माथे पर ,
उसका कोई भी नाम नहीं |
तेरे मुखड़े का सुन्दर तिल,
मुखड़े को भी दमकाता है ||

वो घटता बढ़ता रहता है,
इक रोज कहीं खो जाता है |
यह रूप मगर इस घर भर को ,
तो प्रतिदिन ही महकाता है ||

वो रातों को ही आता है,
हर सुबह कहीं खोजाता है |
यह सुन्दर आनन तेरा प्रिय,
प्रतिपल मुझको हरषाता है ||

वह दूर दूर ही रहता है ,
विरहा में सदा सताता है |
तेरे अंतस का अपनापन ,
तन मन जगमग कर जाता है |

उसकी अपनी भी ज्योति कहाँ ,
है प्रभा सूर्य की बिखराता |
तेरे यौवन की ज्योति निरख ,
है दिनकर भी सहमा जाता ||

मैं चाँद तुझे कैसे कह दूं,
वह बदली से घिर जाता है |
तेरा यह सुघड़ सलोना मुख ,
घूंघट को भी दमकाता है ||





 पंचम गीत..


प्रिय तुमने किया श्रृंगार....


प्रिय, तुमने किया श्रृंगार ||


टूट गए दृढ़ता के बंधन हम कर बैठे प्यार |
तेरे तन की गर्मी से उठ आई बरखा बहार |
बगटुट मनुवा ऐसे दौड़े जैसे मस्त बयार |
प्रिय, तुमने किया श्रृंगार ||


सतरंगे रंग इन्द्रधनुष के आँचल से छलके |
दन्तपंक्ति हो धवल तरंगित ज्यों घन बिजुरी चमके |
पायल बिछुआ रुनझुन, सुरभित गजरा हरसिंगार |
प्रिय, तुमने किया श्रृंगार ||

अंखियों में कजरा, नकबेसर,मोतिन मांग सजाई |
चाल चले कलहंस लजाये,गालों पर अरुणाई |
माथे पर बिंदिया सिंदूरी, चमके ज्यों अंगार |
प्रिय, तुमने किया श्रृंगार ||

दूज का चन्दा बना गले का चन्द्रहार लहराए |
चन्दन लेप सुगन्धित तन ज्यों मलयानिल हर्षाये |
कर्णफूल झूलें ज्यों झूला झूलें सुन्दर नार ||


प्रिय, तुमने किया श्रृंगार |
सखि ! तुमने किया श्रृंगार ||








षष्ठ गीत....  पायल ..



सखी ! तेरी पायल की झंकार ||
नाच उठा मन मोर,
सज गया सपनों का संसार |
प्रेम बांसुरी बजी ह्रदय में ,
झूम उठा घर-द्वार |
सखी ! तेरी पायल की झंकार ||


झनक झनक पैजनियाँ बोले ,
सारे भेद जिया के खोले,
जैसे हो कान्हा की वंशी ,
छेड़े मन के तार |
सखी ! तेरी पायल की झंकार ||


जब जब हो पायल की छन छन ,
तड़पे प्रेम विरह घायल मन |
दूर देश से जैसे कोई,
आई प्रेम पुकार ||
सखी ! तेरी पायल की झन्कार ||


छत, बैठक, घर, मंदिर, आँगन,
छलकाए रस पायल छन छन |
आतप में जैसे श्यामल घन,
छेड़े राग मल्हार |,
सखी ! तेरी पायल की झंकार ||

मेरे मन की विरह पीर को ,
तेरी पायल कब समझेगी |
प्रीति भरे इस मन आँगन में ,
बैरिन पायल कब छनकेगी |
मैं तो हार गया हूँ सजनी !
कर कर के मनुहार |

सखी! तेरी पायल की झंकार ||





सप्तम गीत---
प्रियतम जब इस द्वारे आये.....

प्रियतम जब इस द्वारे आये |
दीप जले मन, तन हरषाये ||

भीनी भीनी प्यार की महक,
मन साँसों में भर भर जाए |
अंग अंग में खिली चांदनी,
मन राधा बन् कर मुस्काए | ....प्रियतम जब.......||

नैन चदरिया राह बिछाये,
दीप जलाए द्वार खड़ी थी |
उपालंभ की गठरी बाँधे,
मैं तो कर मनुहार खड़ी थी |

प्रियतम से जब हुआ सामना,
मन पिघला नवनीत होगया |
झूले बाहों के झूले जब,
उपालंभ संगीत होगया |

जो मनुहार किये बैठी थी ,
आँसू बन् प्रिय गीत होगया |
मौन मौन मन बात होगई,
बोल मुखर फिर कब हो पाए | ---प्रियतम जब......||

बाहों में भरकर इठलाये ,
प्रियतम जब इस द्वारे आये |
तन पिघला नवनीत होगया,
मन राधा बनकर मुस्काए |

प्रियतम जब इस द्वारे आये ||






 अष्ठम गीत ..रति-श्रृंगार में ....


सखि कैसे ....?


सखि री ! तेरी कटि छीन,
पयोधर भार भला धरती हो कैसे ?
बोली सखी मुसकाय , हिये-
उर-भार तिहारो धरतीं हैं जैसे ||

भौहें बनाईं कमान भला , हैं-
तीर कहाँ पे, निशाना हो कैसे ?
नैनन के तूरीण में बाण ,
धरे उर पैनी कटार के जैसे ||

कौन यहाँ मृग-बाघ धरे ,
कहौ,बाणन वार शिकार हो कैसे ?
तुम्हरो हियो मृग भांति पिया,
जब मारे कुलांच, शिकार हो जैसे ||

प्रीति तेरी मन मीत, प्रिया -
उलझाए ये मन, उलझी लट जैसे |
लट सुलझाय तो तुम ही गए,
प्रिय, मन उलझाय गए कहो कैसे ?

ओठ तेरे बिम्बाफल भांति,
किये रचि, लाल अंगार के जैसे |
नैन तेरे प्रिय, प्रेमी चकोर ,
रखें मन जोरि अंगार से जैसे ||

अनहद -नाद को गीत बजे,,
संगीत, प्रिया अंगडाई लिए से |
कंचन-काया के ताल-मृदंग पे ,
थाप तिहारी कलाई दिए से ||

प्रीति भरे रस बैन तेरे , कहो -
कोकिल-कंठ भरे रस कैसे ?
प्रीति की वंशी तेरे उर की,पिय -
देती सुनाई मेरे उर में से ||

पंकज नाल सी बाहें प्रिया, उर-
बीच धरे हो, क्यों अँखियाँ मीचे |
मत्त मतंग की नाल सी बाहें ,
भरें उर बीच , रखें मन सींचे ||






मंगलवार, 21 जून 2011

प्रेम काव्य-महाकाव्य.. पंचम सुमनान्जलि--समष्टि-प्रेम .----डा श्याम गुप्त


  ------ प्रेम के विभिन्न  भाव होते हैं , प्रेम को किसी एक तुला द्वारा नहीं  तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है- पंचम -सुमनान्जलि..समष्टि-प्रेम ....जिसमें देश व राष्ट्र -प्रेम , विश्व-वन्धुत्व  व मानव-प्रेम निहित ...७ गीत व कवितायें ...... देव दानव मानव,  मानव धर्म,  विश्व बंधुत्व ,  गीत लिखो देश के,  बंदेमातरम ,  उठा तिरंगा हाथों  में  व  ऐ कलम अब छेड़ दो.... प्रस्तुत की जायेंगीं |  प्रस्तुत है ......प्रथम कविता ...

गीत -१ ....देव मानव दानव ....

मूर्ति देव है जन जीवन का,
और द्विजों का देव अग्नि है |
मनीषियों का देव ह्रदय है,
समदर्शी हित सभी देव हैं ||

देव वही जो सबको देते,
देव वही जो सब कुछ देते |
जो सबको बस देता जाए,
वह जग में देवता कहाए |

सूरज जो गर्मी देता है,
और उजाला देता रहता |
चन्दा भी शीतलता देता,
बादल वर्षा करता रहता ||

सागर से मिलते हैं मोती,
नदिया जल देती रहती है |
धरती जाने क्या क्या देती,
सब कुछ वह देती रहती है ||

बृक्ष भला कब फल खाते हैं,
पुष्प कहाँ निज खुशबू लेते |
कांटे  भी तो  देते  ही  हैं ,
दुःख के साथ सीख देदेते ||

शास्त्र तभी तो यह कहता है,
देव-तत्व सबमें रहता है |
जग में जो कुछ भी बसता है,
कुछ न कुछ देता रहता है ||

सारी दुनिया देती रहती ,
मानव लेता ही रहता है |
यदि लेकर के हो कृतज्ञ, फिर-
प्रभु इच्छाएं भर देता है ||

जो कृतज्ञ होकर लेता है,
सिर्फ जरूरत भर लेता है |
निज सुख खातिर कष्ट नहीं, 
जो , देने वाले को देता है ||

'जग हरियाली युक्त बनाएं-
और प्रदूषण मुक्त बनाएं |'-
जो यह सब भी चिंता करते,
उऋण रहें देवों के ऋण से ||

जो प्रसन्न देवों को रखते,
उनको ही कहते हैं  मानव |
अति-सुख अभिलाषा के कारण,
उन्हें सताएं , वे हैं दानव ||

लालच और लोभ के कारण ,
प्रकृति का दोहन जो करते |
वे जो अति भोगी मानव हैं,
कष्ट  सभी  देवों  को  देते  ||

करें प्रदूषण युक्त धरा को,
अज्ञानी लोभी जो मानव |
मानव पद से वे गिर जाते,
वे सब कहलाते हैं दानव  ||




गीत -२....मानव धर्म...

धर्म   वही  तो   होता है,
जो  सबको धारण करता |
अपना बना व्यक्ति को वह,
उसको अनुशासित करता ||

सभी को एक समान समझ,
सब की ही सेवा करना |
सम्मति  से सबकी चलना,
अडिग सत्य पर रहना  ||

जीव मात्र से प्रेम करें ,
यह मानव धर्म सिखाता |
जीने की धारणा यही,
है जीवन धर्म कहाता ||

सिधु सरस्वती के तीरे ,
यह गाथा गयी सुनायी |
प्रजा वहाँ पर रहती थी -
जो, वह हिन्दू कहलाई ||

बातें यही मुहम्मद ने,
सब अपनों को समझाईं |
जिन लोगों ने समझी थी,
वे बने मुसलमां भाई  ||

यही विचारों का मंथन,
जब ईशा ने फैलाया |
उनका जो आदर करता ,
वह ईसाई कहलाया ||

हिन्दू, मुस्लिम, ,ईसाई-
सिख,मानव  रहा बनाता |
देश, काल सुविधानुसार ,
वह जीवन मर्म सजाता ||

हिल मिल रहें प्रेम से सब,
यह हमको धर्म सिखाता |
सब धर्मों में बसती है,
मानव धर्म की भाषा ||




गीत-३.....विश्व बंधुत्व .......


बृक्ष   वही   तो कहलाते हैं,
वही  प्रशंसा  भी पाते हैं  |
सोते   बसते   छाया   में मृग,
और  जहां  पक्षी  आते हैं ||


मरकट गण जिनकी डालों पर,
उछल उछल हरषाते रहते  |
कीट-पतंगे जिनपर पलते ,
भौंरे पुष्पों का रस लेते  ||

 
खगकुल जिनके तरुशिखरों पर,
जीवन का संगीत सुनाते |
 विश्व प्रेम हित सभी प्राणियों-
को अपना सर्वस्व लुटाते ||


मानव हो या बृक्ष, देव बन,
जो सबको देता रहता है  |
सभी प्राणियों को सुख देता,
सबका प्रिय भाजन बनता है ||


विश्व प्रेम की ज्योति जलाकर ,
वही प्रेम का दीप जलाता |
विश्व प्रेम वाहक बनता है,
जग को आलोकित कर जाता ||


गीत -४--गीत लिखो देश के .....
 
लेखनी  तुम लिख चुकी श्रृंगार के,
बहुत सारे गीत अब कुछ ध्यान दो |
और  भी है कुछ सृजन  के लिए अब ,
नीति  पर चल, देश को भी मान दो ||

 
देख  करके  दुर्दशा   संसार की,
रक्त का संचार क्या होता नहीं ?
खौल उठतीं क्यों नहीं हैं धमनियां ,
शब्द  शर-संधान क्यों होता नहीं ||

 
गीत  तुम लिखती रहीं श्रृंगार के,
चूड़ियों की खनक के, सिंगार के   |
प्यार के, मनमीत के, मनुहार के ,
पायलों के गीत की, झंकार के ||

 
रेडियो  टीवी  कलावीथी  सभी,
नृत्य-गायन, देह-दर्शन मंच पर |
व्यस्त हैं, अभ्यस्त हैं सब मस्त हैं ,
भद्र जन जो, इस सभी से त्रस्त हैं ||
 
आज जग में क्या कमी श्रृंगार की ,
हर तरफ  श्रृंगार की ही आरती |
तुम अगर  श्रृंगार रत ही जो रही,
रो  उठेगी  शारदा , माँ भारती ||
 
चीर अपना हरण नारी कर रही,
स्वयं ही दुशासनों को वर रही |
हो रहा है खेल  नारी  देह का ,
और नारी चुप सहन सब कर रही ||
 
नाम पर नव-प्रगति के कामी पुरुष ,
और धन-लोलुप पुरुष-नारी सभी |
नाम देते हैं कला का, भोग को,
कह रहे सम्मान वे अपमान को ||

 
भांग सी घोली हुई है हवा में,
मस्त हैं सब स्वप्न के संसार में |
सभ्यता, राष्ट्रीयता, शुचि नीतियाँ ,
रोरहीं, इस असत के व्यापार में |
 
 
खौलकर कुछ कह रहीं हों धमनियां,
शौर्य का संचार कुछ होता कहीं |
नींद हट, चैतन्य पलकें यदि हुईं ,
तो उठो, इस दुर्दशा पर ध्यान दो ||
 
 
गीत गाओ, नीतियों के, देश के,
नारियों की लाज के सम्मान के |
तोड़ दो कारा रुपहले जाल की ,
गीत गाओ राष्ट्र-हित सम्मान के ||
 
 
हर गली , हर नगर में,  हर देश में ,
कृष्ण बन,हर व्यक्ति उठकर खडा हो  
मान मर्यादा ढँकी कुछ रह सके,
लाज की साड़ी लिए कर, खडा हो || 

 
है बहुत कुछ नव-सृजन के लिए अब ,
रक्त भी है धमनियों में खौलता |
शौर्य का संचार  भी है  हो चला,
देश के चिर-शौर्य की गाथा लिखो ||

 
कौन  पूछेगा   उसे   संसार  में  ?
वक्त की आवाज़ जो सुनता नहीं |
लिख न पाया जो प्रगति की भूमिका,
वह अमिट इतिहास बन पाता नहीं |


गीत ५......वंदे मातरम् .... 

 



अब तो बंदे मातरम् के गान से भी,  

धर्म  की निरपेक्षिता खतरे में है |

शूरवीरों  के वो  किस्से -कथाएं ,

अब भला बच्चों से कोई  क्यों कहे ?


देश सारा  खेलता अन्त्याक्षरी,

बस करोड़ों जीतने के ख्वाब हैं |

व्यर्थ की उलझन भरे हैं सीरियल,

पात्र  सारे  बन गए  बाज़ार  हैं ||


नक़ल चलती अक्ल का है काम क्या ,

सेक्स,  हिंसा,   द्रश्य   पारावार  है |

अंग्रेज़ी नाविल व फ़िल्में चल रहीं ,

रो रहा  साहित्य  का  बाजार  है ||

 

धर्म  संस्कृति का पलायन होरहा,

अर्थ-संस्कृति का हुआ है अवतरण |

चंद सिक्कों के लिए हों अर्ध नग्ना,

बेचतीं तन नारियाँ, औ नर वतन ||


धर्म संस्कृति राष्ट्र की थाती गयी ,

शेयरों  की  नित  नई  ऊंचाइयां  |

नक़ल की संस्कृति बढ़ावा पारही,

राष्ट्र संस्कृति देश की रुसवाइयां ||

 

हर तरफ हैं लोग दिखते ऊंघते,

या  कि सोते, हर कुए में भांग है |

शौर्य -गाथाएं पढ़े गायें लिखें ,

यह  तकाजा है समय की मांग है ||


शिवा राणा आन, हठ हम्मीर की ,

आज फिर से कृष्ण की, रघुबीर की |

धर्म  दर्शन  वेद और पुराण की,

है  जरूरत फिर नए संग्राम की ||


उठो, ऐ प्यारे वतन के वासियों !

नींद छोडो, चमन में खतरा खडा |

अस्मिताएं अमन खतरे में सभी,

मान, सुख-सम्मान खतरे में पड़ा ||


शूरवीरों के वो किस्से, कहानी,

पुत्र  से  कोई  पिता कैसे कहे,|

अब तो वंदे मातरम् के गान से ,

धर्म की निर्पेक्षिता खतरे में है ||





गीत-६  .उठा तिरंगा हाथों में .....

 स्वाभिमान  से  शीश उठाकर ,

 ऊंचाई के आसमान पर |

उठा  तिरंगा हाथों में हम ,

फहरा  फहरा चढते जाएँ ||


हम हैं गोप गोपिका हम हैं ,

गोवर्धन धारी कान्हा के |

वही  है सदा सखा हमारा ,

जिसने  पूजा धरती माँ को ||

 

हम उसके साथी बन जाएँ ,

आसमान पर चढ़ते जाएँ ||

 

कठिन परिश्रम करें लगा मन,

सभी सफलता वर सकते हैं |

दृढ इच्छा से काम करें तो,

सूरज चाँद पकड़ सकते है ||

 

स्वार्थ युद्ध ,अणु बम की वर्षा, 

नहीं चाहिए, शान्ति चाहिए |

आगम निगम विचार चाहिए,

गीता वाक्य प्रसार चाहिए ||

 

भारत देता शान्ति- मन्त्र है,,

विश्व शान्ति महकाते जाएँ ||

 

आसमान में चढ़ते जाएँ ,

उठा तिरंगा हाथों में हम |

लहरा लहरा बढ़ते जाएँ,

फहरा फहरा बढ़ते जाएँ ||


 गीत ७...नव तराने ...



ऐ कलम  ! अब छेड़ दो तुम नव तराने ,

पीर दिल की दर्द के नव आशियाने |  

आसमानों  की नहीं है चाह मुझको ,

मैं चला हूँ बस जमीं के गीत गाने ||


आज क्यों हर ओर छाई हैं घटाएं ,

चल रहीं हर ओर क्यों ये आंधियां |

स्वार्थ लिप्सा दंभ की धूमिल हवा में ,

लुप्त  मानवता  हुई है  कहाँ जाने  ||

 

तुम करो तो याद कुछ दायित्व अपना ,

तुम करो पूरा सभी दायित्व अपना |

तुम लिखो हर बात मानव के हितों की,

क्या मिलेगा भला प्रतिफल , राम जाने ||

 

तुम  मनीषी और  परिभू  स्वयंभू  हो  ,

तोड़ कारा  सभी वर्गों की   गुटों की |

चल पड़ो स्वच्छंद नूतन काव्य पथ पर,

राष्ट्र हित उत्थान के लिखदो तराने ||

 

हर तरफ समृद्धि सुख की ही धूम है,

नव-प्रगति, नव साधनों की धूप फ़ैली |

चाँद तारों  पर  जा पहुंचा  आदमी है,

रक्त-रंजित धरा फिर भी क्यों ,न जाने ?


व्यष्टि सुख में ही जूझता हर आदमी,

हित समष्टि न सोच पाता आदमी अब | 

देश के अभिमान, जग सम्मान के हित,,

देश  के  उत्थान   के लिख दो  तराने ||


राष्ट्र-हित सम्मान के लिख दो तराने,

आज नव उत्थान के लिख दो तराने |

तुम लिखो तो बात मानव के हितों की,

फल व प्रतिफल ,तुम न सोचो, राम जाने ||


मैं चला हूँ   इस जमीं के  गीत गाने|

पीर  दिल  की  दर्द के  नव आशियाने |

ऐ कलम ! अब छेड़ दो तुम नव तराने ||        ----क्रमश ..षष्ठ सुमनांजलि....रस-श्रृंगार ....


शुक्रवार, 3 जून 2011

डा श्याम गुप्त का पद........

                                                                                       कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

 रे मन अब कैसी ये भटकन |
क्यों न रमे तू श्याम भजन  नित,  कैसी मन अटकन |
श्याम कृपा बिन जगत-जुगति नहीं,मिले न भगति सुहानी |
श्याम भगति बिनु क्या जग-जीवन कैसी अकथ कहानी |
श्याम की माया,  श्याम ही जाने,  और न जाने कोय |
माया  मृग-मरीचिका  भटकत  जन्म  वृथा ही  होय |
श्याम भगति रस रंग रूप से  सींचे जो मन उपवन |
श्याम,श्याम की कृपा मिले ते सफल होय नर जीवन ||
                                रे नर ! अब कैसी ये भटकन......||