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शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण -----चन्द्रावली...डा श्याम गुप्त ....

                                   कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित    

-ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण -----
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--- प्रेम, तपस्या एवं योग-ब्रह्मचर्य का उच्चतम आध्यात्मिक भाव-तत्व ----
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------आगे-------चन्द्रावली सखी----
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२.चन्द्रावली
करेह्ला गाँव में रहती थी | गोवर्धन मल्ल की पत्नी थी, जो चन्द्रावली के साथ कभी सखीथरा (सखी स्थल) में कभी गोवर्धन निकट रहते थे |
------- चन्द्रावली वृषभानु महाराज के भाई चंद्रभानु गोप महाराज की लाड़ली पुत्री थी, जो रीठौरा गाँव के राजा थे | अतः वह राधा की चचेरी बड़ी बहन थी| ये श्रीकृष्ण की अनन्य प्रिया सखी थीं| ललिता जी का जन्म स्थान भी करेहला है| ललिता, पद्मा अदि सखियाँ यहाँ चन्द्रावली से श्रीकृष्ण का मिलन कराने हेतु प्रयत्न करती थीं |
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राधा के वृन्दावन आने से पहले चन्द्रावली श्रीकृष्ण की युवावस्था की प्रेमिका व सखी थी, तत्पश्चात खंडिका नायिका |
------भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक चन्द्रावली में ललिता व चन्द्रावली के संवाद इस प्रकार हैं—
नारद- चन्द्रावली के प्रेम की चर्चा आजकल ब्रज की डगर डगर फ़ैली हुई है| उधर श्रीमती ( राधा जी ) जी का भी भय है तथापि श्रीकृष्ण से जल में दूध की भाँति मिल रही हैं किसी न किसी उपाय से श्रीकृष्ण से मिल ही रहती हैं।
ललिता- ब्रज में रहकर इससे वही बची होगी जो ईंट-पत्थर की होगी|
चन्द्रावली—किससे ..
ललिता- जिसके पीछे तेरी यह दशा है |
चन्द्रावली- किसके पीछे मेरी यह दशा है |
ललिता- सखी, तू फिर वही बात कहे जाती है मेरी रानी, ये आँखें ऐसी बुरी हैं की जब किसी से लगती हैं तो कितना भी छिपाओ नहीं छिपती, मेरी तो यह विपद भोगी हुई है |
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वृन्दावन के श्री रूप गोस्वामी महाराज की कृति राधा-माधव के अनुसार गोपियों में जो श्रीकृष्ण को प्रिय हैं, राधा और चन्द्रावली सर्वश्रेष्ठ हैं| दोनों में राधा जी श्रेष्ठ हैं वे माधव की कायारूपा हैं एवं सभी गुणों में सर्वश्रेष्ठ हैं|
------- रूप गोस्वामी जी के कुछ अन्य कृतियों, गोपाल विजय, के अनुसार ही चन्द्रावली राधा का ही अन्य नाम है | वस्तुतः सभी गोपियाँ राधा के ही विभिन्न भाव-नाम हैं| वे सभी राधा में ही निहित हैं|
------राधा मूल स्वरुप-शक्ति,महाभाव –वामा-हैं तो चन्द्रावली– दक्षिण अर्थात उनकी पूर्तिरूप भाव हैं|
------- यद्यपि चन्द्रावली सदैव ही राधा से कृष्ण प्रेम की प्रतियोगिता में क्रमश पीछे ही रह जाने वाली थी परन्तु फिर भी वह संतुष्ट थी |
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वृंदा कहती है कि चन्द्रावली व श्री कृष्ण के प्रेम महिमा कौन जान पाया है कि, जिनका प्रेम कभी कम नहीं होता, यद्यपि राधा के सौन्दर्य व गुणों में दिन प्रतिदिन वृद्धि के साथ कृष्ण में भी वृद्धि होते जाने पर चन्द्रावली के महत्त्व में कमी होने की संभावना है |
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श्रीकृष्ण के चले जाने पर गोवर्धन में एक ताल में राधा अपनी प्रतिच्छाया देख कर उसे चन्द्रावली समझती है, और कहने लगती है, अरे चन्द्रावली ! मैं तुझे देखकर कितनी भाग्यवान हूँ, आज भाग्यशाली दिवस है| श्रीकृष्ण ने कितनी बार तुम्हें अपनी भुजाओं में कस कर जकड़ा होगा, जल्दी आओ और अपनी भुजायें मेरे गले में डालकर मेरी प्यासी आत्मा को जल प्रदान करो क्योंकि उनमें अभी भी श्रीकृष्ण के कर्णफूलों की प्रिय सुगंध बसी हुई है |

---क्रमश ---राधा---अगली पोस्ट में....



चित्र---चन्द्रावली ...

सृष्टि व मानव जाति के महान समन्वयक—विश्व भर में पूज्य -देवाधिदेव शिव --डा श्याम गुप्त

                            कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित  


                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



        सृष्टि व मानव जाति के महान समन्वयक—विश्व भर में 
पूज्य -देवाधिदेव शिव 
        प्राणी व मानव कुल एवं मानवता के मूल समन्वयक त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने समस्त प्राणी जगत ( देव, दनुज, मानव, गंधर्व आदि सभी का आपस में सामाजिक संयोजन करके एक विश्व-मानवकुल की नींव रखी | शिव, जो वस्तुतः निरपेक्ष, सबको साथ लेकर चलने वाले महान समन्वयवादी थे, ने ब्रह्मा, विष्णु के सहयोग से इंद्र आदि देव एवं अन्य असुर आदि सभी कुलों को आपस में समन्वित किया और एक महान मानव समूह को जन्म दिया जो वैदिक-सभ्यता हुई एवं तत्पश्चात देव –असुर सभ्यता कहलाई तथा महाजलप्रलय के पश्चात पुनः उद्भव पर ‘आर्य-सभ्यता |
          यह उस समय की बात है जब भारतीय भूखंड एक द्वीप के रूप में अफ्रीका ( गोंडवाना लेंड) से टूट कर उत्तर में एशिया की ओर बढ़ रहा था | मूल गोंडवानालेंड में विक्सित जीव व आदि-मानव पृथक हुए भारतीय भूखंड के नर्मदा नदी क्षेत्र गोंडवाना प्रदेश में डेनीसोवंस( अर्धविकसित) एवं नियंडर्थल्स (अविकसित) मानव में विक्सित हो रहे थे एवं सभ्यता व संकृति का विकास होरहा था| ये मानव यहाँ विक्सित हुए एवं समूहों व दलों में भारत में उत्तर की ओर बढ़ते हुए, भारतीय प्रायद्वीप के एशियन छोर से मिल जाने पर बने मार्ग से उत्तर भारत होते हुए सुदूर उत्तर-मध्य एशिया क्षेत्र -सुमेरु क्षेत्र व मानसरोवर-कैलाश क्षेत्र पहुंचे एवं पश्चिमी एशिया-योरोप से आये अन्य अविकसित/ अर्धबिकसित मानवों से मिलकर विक्सित मानव, होमो सेपियंस में विक्सित हुए| इसीलिये सुमेरु क्षेत्र को भारतीय पौराणिक साहित्य में ब्रह्म-लोक कहा जाता है, जहां ब्रह्मा ने मानव की व सृष्टि की रचना की| सुमेरु के आस-पास के क्षेत्र ही देवलोक, इन्द्रलोक, विष्णु लोक, स्वर्ग आदि कहलाये जहाँ विभिन्न उन्नत प्राणियों मानवों ने सर्वप्रथम बसेरा किया | 
     शेष अफ्रीकी भूखंड से उत्तर-पश्चिम की ओर चलते हुए आदिमानव अन्य समूहों में योरोप-एशिया पहुंचता रहा, नियंडरथल्स में विक्सित होता रहा परन्तु उत्तर-पश्चिम की अनिश्चित शीतल जलवायु व मौसम से बार बार विनष्ट होता रहा, बचे-खुचे मानव पूर्व-मध्य एशिया के सुमेरु–कैलाश क्षेत्र में उपस्थित विक्सित मानवों से मिल गए|
       जनसंख्या बढ़ने पर, ब्रह्मा द्वारा मानव के पृथ्वी पर निवास की आज्ञा से, मानव सर्वत्र चहुँ ओर फ़ैलने लगे | पूर्वोत्तर की ओर चलकर बेयरिंग स्ट्रेट पार करके ये पैलिओ-इंडियन अमेरिका पहुंचे व सर्वत्र फ़ैल गए| पूर्व की ओर चाइना, जापान, पूर्वी द्वीप समूह आस्ट्रेलिया तक| दक्षिण में समस्त भारतीय भूमि पर फैलते हुए ये मानव सरस्वती घाटी ( मानसरोवर से पंजाब तक) में; जहां दक्षिणी भारत की नर्मदा घाटी में पूर्व में रह गए मानव समूह  उन्नति करते हुए पहुंचे मानवों (जिन्होंने हरप्पा, सिंध सभ्यता का विकास किया|) से इनकी भेंट हुई और दोनों सभ्यताओं ने मिलकर अति-उन्नत सरस्वती घाटी सभ्यता की नींव रखी| 
       यह वह समय था जब सुर-असुर द्वंद्व हुआ करते थे | शिव जो एक निरपेक्ष देव थे सुर, असुर, मानव व अन्य सभी प्राणियों, वनस्पतियों आदि के लिए समान द्रष्टिभाव रखते थे, सभी की सहायता करते थे | उन्हें पशुपतिनाथ व भोलेनाथ भी कहा जाने लगा |
१.शिव ने ही समुद्र मंथन से निकला कालकूट विषपान करके समस्त सृष्टि को बचाया| 
२.शिव ने ही देवताओं को अमृत प्राप्ति पर दोनों ओर बल-संतुलन हेतु असुरों को संजीवनी विद्या प्रदान की | 
३. शिव ने ही मानसरोवर से सरस्वती किनारे आये हुए इंद्र-विष्णु पूजक मानवों एवं दक्षिण से हरप्पा आदि में विक्सित स्वयं संभु सेक शिव के समर्थकों मानवों के दोनों समूहों, के मध्य मानव इतिहास का प्रथम समन्वय कराया, जिसके हेतु वे स्वयं दक्षिण छोड़कर कैलाश पर बस गए पहले दक्ष पुत्री सती से प्रेम विवाह पुनः हिमवान की पुत्री उत्तर-भारतीय पार्वती से विवाह किया तथा अनेकों असुरों का भी संहार किया, और महादेव, देवाधिदेव कहलाये | 
        हरप्पा, सिंध सभ्यता का विकास करने वाले भारतीय मानव ( गोंडवाना प्रदेश के मूल मानव ) जो अपने देवता शम्भू-सेक के पूजक थे अपनी संस्कृति विकसित करते हुए उत्तर तक पहुंचे थे | हरप्पा में प्राप्त शिवलिंग, पशुपति की मोहर आदि इसके प्रमाण हैं| अर्थात शिव मूल रूप से भारत के दक्षिण क्षेत्र के देवता थे |
      यही दोनों समूह मिलकर एक अति-उन्नत सभ्यता के वाहक हुए जो सरस्वती सभ्यता, या वैदिक सभ्यता कहलायी एवं कालान्तर में यही लोग ‘आर्य’ कहलाये अर्थात सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मानव | जो विकासमान हिमालय की नीची श्रेणियों को पार करके देवलोकों व समस्त विश्व में आया जाया करते थे| जनसंख्या व अन्य विकास की विभिन्न सीढ़ियों के कारण पुनः यही मानव समस्त विश्व में फैले और समस्त यूरेशिया, जम्बू द्वीप या वृहद् भारत कहलाया | आज समस्त विश्व में यही भारतीय मानव एवं उनकी पीढियां निवास करती हैं| 
     विश्व के प्रत्येक कोने में प्राप्त शिवलिंग एवं शिव मंदिर उनके सर्वेश्वर एवं देवाधिदेव, महादेव होने के प्रमाण हैं| अर्थात यह  द्योतक है इसका कि वैदिक सभ्यता व देवता भारत से समस्त विश्व में फैले पश्चिम में चलते गए उनके नाम व स्वरुप बदलते गए |



महादेव—शिव
 ------ चीनी ड्रेगन एवं बौने मानव के साथ शिव-पार्वती  – बादामी कर्नाटक
                        
  
----अफ्रीका में ६००० वर्ष प्राचीन शिवलिंग
 
--------ओसीरिस मिस्र
 
----रोम में बेबीलोन, मेसोपोटामिया एवं समस्त योरोप में लिंग को प्रायेपस कहाजाता है, |
-----मक्का के काबा में काले ग्रेनाईट का अंडाकार पत्थर शिवलिंग ही है जो शुक्राचार्य ( उशना काव्य, काबा गुरु) द्वारा स्थापित शिव मंदिर है | इसीलिये मुस्लिम शुक्रवार को पवित्र दिन मानते हैं
मक्का स्थित शिवलिंग ---जब यह बिना ढके पूजा जाता था
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--काला पत्थर जिसे चूमा जाता है शिव लिंग का शेष भाग ...
 
 
---टाइटन्स( जिन्हें असुर कहा जाता था ) वे महान शिव भक्त थे रावण की भाँति |
--आयरलेंड में हिल ऑफ़ तारा पर प्राचीन शिवलिंग स्थित है | ब्रोंज(कांसा) बनाने की शक्ति वाला देवता लेकर आया था जो देवी दनु के पुत्र थे | अर्थात कश्यप की पत्नी दनु( दक्ष पुत्री ) के पुत्र जो सारी आयरलेंड में राज्य करते थी एवं डेन्यूब नदी (दनु नदी )के किनारे किनारे सारे योरोप में
आयरलेंड में प्राचीन शिवलिंग
 
तारा पर्वत
 
----दनु के पुत्र दानव –समस्त योरोप में डेन्यूब नदी के किनारे किनारे बसे | डेन्यूब नदी योरोप के विभिन्न देशों में दुनाज़,दूना,दुनेव,दुनारिया,आदि नामों से जानी जाती है | यह योरोप की सबसे बड़ी नदी है वोल्गा के बाद |
--वियतनाम में प्राचीन शिवलिंग
---वेटिकन सिटी रोम में शिवलिंग –इट्रूस्कन म्यूज़ियम में | प्राचीन इटली का नाम इट्रूरिया था| इटली में भी ऐसे लिंग मिले हैं | ये  ईसापूर्व दूसरी से सातवीं सदी के हैं|
 
हरप्पा में मिले तीन शिवलिंग
 
द.अफ्रीका के सुद्वारा में ६००० हज़ार वर्ष प्राचीन कठोर ग्रेनाईट के शिवलिंग
 
नंदी की मूर्ती—इंडोनेशिया
 
रोमन देवता-नेपच्यून की शिव से समानता----हाथ में त्रिशूल शिव का मूल स्वरुप है |
उसके खड़े होने की स्थिति, माया से अप्रभावित शिव की ‘स्थित-‘से मेल खाती है |
वार्सीलोना
 
नेपच्यून का फुहारा ---न्यूरेमबर्ग जर्मनी में
 
नेपच्यून (शिव) –पोलेंड –
 
ग्रीक देवता –पोसीडोंन (शिव)
 
रोम - एमफीट्राईट- –पार्वती-शिव



 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

कृष्ण और -----ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण -----१.ललिता- ----डा श्याम गुप्त...

                                      कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित





                   


            -----कृष्ण और  -----ललिता चन्द्रावली राधा का त्रिकोण -----

--- प्रेम, तपस्या एवं योग-ब्रह्मचर्य का उच्चतम आध्यात्मिक भाव-तत्व ----



              स्त्रियों के सहयोग के बिना कोई सामाजिक या राजनैतिक कार्य कहाँ संपन्न होपाता है –कृष्ण बचपन से ही ( साम्राज्यवाद व कंस विरोधी धुरी के भावी नायक होने के कारण ) राजनैतिक क्रियाकलापों में संलग्न थे | -------क्योंकि पुरुषों पर सदैव राज्य की गुप्तचर दृष्टि रहती है अतः उन्होंने स्त्रियों को (गोपिकाओं को) अपने दल-बल में सम्मिलित किया एवं विभिन्न सामाजिक क्रिया कलापों ( लीलाओं ) के रूप में मथुरा के विरुद्ध राजनैतिक अभियान का संचालन किया |
-------उन्हें समस्त गोपिकाओं सहित बचपन से ललिता, तत्पश्चात राजा वृषभानु के भाई चंद्रभानु महाराज की पुत्री चन्द्रावली एवं युवावस्था में वृषभानु सुता होने के कारण राधिका, ब्रजेश्वरी राधा; जो अपने पद-स्थिति, समर्पण व सामाजिक कृतित्वों से सब पर छा गयी; इन सबका अपने अपने सखि-यूथों सहित इस कार्य में पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ |
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         वास्तव  में वह काल महिलाओं की स्वतंत्रता व इच्छाओं के दीर्घकालीन शमन से उत्पन्न विरोध-स्वर के उठने का था | श्रीकृष्ण उस सामाजिक उत्थान के नेता बनाकर उभरे एवं तात्कालिक परिस्थिति का राजनैतिक लाभ भी उठाया| ये सारी लीलाएं, क्रियाकलाप उसी का अंग थे|
-------पुरुष-प्रधान समाज में कृष्ण उनके अपने हैं जो उनकी उंगली पर नाचते है, स्त्रियों के प्रति जवाब देह हैं, नारी उन्मुक्त ,उत्थान के देवता हैं। 
                    सूरदास ने राधा के अतिरिक्त ललिता का विशेष रूप से उल्लेख किया है और साथ ही चन्द्रावली का भी।
------- ललिता को राधा की परम प्रिय, घनिष्ठ सखियों के रूप में 'मान' और 'खण्डिता' के प्रकरणों में चित्रित किया गया है। 'खण्डिता' प्रकरणों में इन दो के अतिरिक्त सूरदास ने 'शीला', 'सुखमा', 'कामा', 'वृन्दा', 'कुमुदा' और 'प्रमदा' का भी उल्लेख किया है।
--------गोपियों में कृष्ण के प्रेम की अधिकारिणी इन्हें ही माना गया है। परन्तु इनमें से किसी का राधा से ईर्ष्याभाव नहीं था। कृष्ण के प्रेम हेतु ये विभिन्न भाव प्रतिद्वंदिता, आपसी द्वेष आदि उनके लिए सुख व आनंद के स्रोत हैं |.\

----------यहाँ हम इस प्रेम त्रिकोण के बारे में अपनी बात कहेंगे -----

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ललिता
१.ललिता ---
जब जहां कृष्ण की बात होती है राधा का नाम आता है| सच भी है, राधा-कृष्ण अटूट एकात्मकता, एक ही महाभाव की भाँति एक ही हैं |
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--------परन्तु वस्तुतः श्रीकृष्ण की बचपन की मूल सखी, प्रेमिका, सहयोगी ललिता जी हैं जो राधाजी की प्रतिच्छाया होने के साथ, लोक साहित्य में प्रभावी उपस्थिति के बावजूद जन साहित्य व जन मन से उनकी छाया में गुम होजाती हैं |
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नित्य बिहारी राधा-कृष्ण की ललिता अभिन्न सहचरी हैं। ललिता जी राधाजी की सबसे प्रधान सखी है जो कि सर्वश्रेष्ठ थी । वे राधाजी से २७ दिन बड़ी थीं| ललिता जी की आज्ञा बिना न राधिका जी के स्वपक्ष में, न रास में ही प्रवेश होसकता है| इनके प्रयत्नों से ही राधा-माधव का मिलन हुआ| जब उन्हें पता चलता है भगवान गोवर्धन पर आते है । तो वो राधा जी को वृदांवन से मिलाने के लिए वहाँ लेकर आती है । हर प्रयास करती है ।
-------- ललिता जी के अंग की कांति गौरोचन के समान शुभ्र है, वर्ण लालिमा युक्त पीतवर्ण है | वे मोर के पंख सदृश्य रंग के वस्त्र धारण करती हैं|
--------- ललिता जी का जन्म यावट गाँव मे हुआ उनका निवास स्थान “ऊचा गाँव” है उनके पिता विशोक और माता शारदा है । और भैरव नाम के गोप के साथ उनका विवाह हुआ |
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ललिता जी राधा रानी की सहचरी के अतिरिक्त इनका खंडिका नायिका के रूप में भी चित्रंण होता है मतलब सेविका के रूप मे राधा माधव के साथ आती है और कभी-कभी नायिका बनकर कृष्ण जी के साथ विहार करती है ।
------- ललिता जी एक सफल दुति के अनुरूप, मान रूप, तीक्ष बुद्वि वाली, वाकचातुर्य, आत्मीयता, नायक को रिझाने वाली व्यक्तित्व सौन्दर्य वाली है । बिलकुल राधा रानी के जैसी ही है..... ललिता जी कोई सामान्य सखी नहीं है ये राधा जी कायारूपा है |
--------इनका अन्य नाम अनुराधा भी है | ललिता जी की आठ प्रधान सखी कही गई है - रत्नप्रभा, रतिकला, सुभद्रा, चंद्र्रेखिका, भद्र्रेखिका, सुमुखी, घनिष्ठा, कल्हासी, कलाप्नी |
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जब भगवान शिव महारास में सम्मिलित होने के लिए आए तो ललिता जी ने प्रवेश देने से मना कर दिया कि यहाँ ब्रज में कृष्ण के अलावा कोइ पुरुष नहीं प्रवेश पा सकता | भगवान् शिव ने कहा तो मैं क्या करूं, कृष्ण हमारे आराध्य हैं | ललिता जी ने उन्हें गोपी का श्रृंगार कराया, चोली पहनायी, कानों में कर्णफूल व घूंघट डाला, युगल मन्त्र दिया, तब प्रवेश हुआ | अतः ललिता जी शिव की गुरु होगयीं |
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तब योग के देवता शिव ने ललिता से कहा कि उसकी कृष्ण के प्रति यही एक तरफ़ा साधना उसे वहां तक लेजायगी जहां राधा अभी नहीं पहुँची है | आज जहां ललिता है वहीं एक दिन राधा भी होगी | ललिता विस्मय में रह गयी थी |
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वास्तव में कृष्ण की बचपन की सखी, प्रेमिका व अभिन्न मित्र ललिता थी |
------बिशाखा, चित्रा, चम्पकलता, इन्दुलेखा, तुन्ग्विद्या, रंगदेवी, वासुदेवी सभी ललिता के साथ बड़ी हुईं|
--------सभी एक साथ नंदगांव के कृष्ण के सख्य में बड़ी हुईं, वे गोप कन्या थीं, सभी में गोपी-प्रेम भावना थी, कभी कृष्ण के लिए उनमें अलग आत्मा की सीमा खड़ी नहीं हुई, उनके लिए कृष्ण सभी के हैं, कभी यह भावना नहीं आई की कान्हा केवल मेरे हैं, कान्हा के लिए सुख व वेदना साझी थी उन सबके लिए |
राधा अपनी माता के देहांत के बाद ननिहाल में रही, उसके पिता अपनी दूसरी पत्नी के साथ वृन्दावन आगये | राधा युवावस्था में आई और स्वच्छंदता से घूमती थी| संयोग से कृष्ण भी वृन्दावन आगये |
------- अतः यह संयोग ही था कि राधा युवावस्था में वृन्दावन आई और सब पर छागई, वह इस तरह कृष्ण की ओर खिची कि कृष्ण का मन भी मोहित होगया|
--------ललिता अपनी गति में रह गयी, जब तक उसके भीतर ज्वार उठता, कृष्ण कहीं और बह गए, पर ललिता की गति में एक स्थिरता थी कृष्ण उससे अपनी हर बात कह पाते हैं| वो वृन्दावन छोड़कर जाने वाले हैं यह बात वो राधा से नहीं कह पाते |
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वस्तुतः नन्दगाँव के बाद सबसे अधिक सन्देश ( कंस व मथुरा से संवंधित, राजनैतिक सन्देश-नन्द –वसुदेव - कृष्ण व गोप-गोपियों के कंस विरोधी संवर्ग के लिए ) यहीं ऊंचागाँव में ही आते थे,
-------अतः ललिता कृष्ण की अभिन्न मित्र, साथी, सहकर्मी थी उसको यह आभास था कि कृष्ण को बड़े होकर मथुरा चले जाना है, अपने सम्पूर्ण समर्पण के बाद भी ललिता जानती थी कि वियोग ही उसका सर्वस्व होने वाला है, अतः वह संयोग के हर पल को जी लेना चाहती है, भले ही कृष्ण राधा के साथ प्रेमपूर्ण क्यों न हों |
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                     एक बार सखियों ने प्रिया-प्रियतम का श्रृंगार करके ललिता जी के साथ श्री श्यामसुंदर के विवाह का आयोजन भी किया था| ललिता जी के मेहंदी रचे कर कमल जिस शिला पर टिके होने से उनके चिन्ह उस पर बन गए जो आज भी निधि वन में चित्र-विचित्र नामक शिला पर सुन्दर चित्रकारी के रूप में मिलते हैं|
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ललिता-माधव
                           शरदपूर्णिमा की महारास लीला में, राधा की आठ सखियों के साथ उसे भी सम्पूर्णता का अहसास था, ललिता व् कृष्ण एक ही जगह हैं यह सत्य ही उसे सम्पूर्ण कर रहा था, उसके अनुसार—नज़दीकी व दूरी तो सापेक्ष है, यह तो मन का विकल्प है | सूर्य तो सौर मंडल के प्रत्येक छुद्र से छुद्र गृह के भी साथ है, हम अपने अन्दर एकात्मकता का अनुभव करें न कि द्वैत का ईर्ष्या भाव |
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                     देवर्षि नारद के कहने पर एक बार ललिता कृष्ण के साथ झूले पर बैठ गयी तो राधा ने मान किया, ललिता सोचती है, किस भावना से यह मान |
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--------- क्या कृष्ण का सौन्दर्य इतना पार्थिव है जो एक के प्यार से सम्पूर्ण होजाए, कृष्ण की मुरली के आगे धरा का क्या सारे मनोजगत का सुख भी फीका पड जाता है, ईश्वर के होने की अनुभूति होजाती है| किसी गहरी सत्ता की अनुगूंज बस जाती है, तन मन में |
-------- प्रेम इस पर टिका नहीं होता है कि दूसरा हमें प्रेम करता है या नहीं | वह तो हमारे अन्दर का सत्य उद्भूत प्रेम है न कि प्यार की संभावना से प्रेरित व्यवहार | यदि स्व को जलाकर भष्म कर देना और शिवत्व का अमृत हमारे भीतर असीम प्रेम, वैराग्य रूप में नहीं आता तो यह असमर्थता हमारी है, दोष दैव का नहीं है |
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                         राधा को लगता है की वह कृष्ण को सम्पूर्ण रूप से चाहती है तो कृष्ण पर किसी अन्य के प्रेम की छाया न पड़े न कृष्ण किसी और के प्रति झुके |
-----------यदि किसी के सर्वस्व समर्पण होने से प्यार की संभावना खत्म होजाती हो तो महाराज कंस के विश्वस्त सैनिकों के नायक अय्यन से तो उसकी सगाई कब की होचुकी है, फिर उसके ही कृष्ण के प्रति प्रेम का क्या आधार रह पाता है |
--------- राधा के प्रति कृष्ण का प्रेम राधा को यह सब नहीं देखने देता | यदि प्यार न मिले तो तो प्यार की सार्थकता को प्रश्न समझने वाली राधा ये नहीं सोच पाती, कि जब एक दिन कृष्ण चले जायेंगे तो यही प्रश्न सबसे अधिक राधा के सामने खडा होगा | शिव के वचनों का अर्थ अब ललिता समझ रही थी |
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----कृष्ण की मुस्कान के भीतर छुपा विषाद राधा अपने प्रेम-संयोग के उल्लास में नहीं देख पाती, पर ललिता समझती है, कृष्ण एक बार जब अपने हस्त में बने मुद्रा को देखकर जब गंभीर होगये थे तब ललिता ने ही उन्हें हौले से धक्का देकर चेताया था|
-------- राधा का श्रृंगार ललिता जानकर करती थी, कृष्ण को क्या अच्छा लगता है राधा नहीं जानती थी जितना ललिता को कृष्ण के बारे में पता रहता था| कृष्ण अब राधा से अपनी खुशी के लिए प्यार नहीं करते अपितु वे राधा की बड़ी बड़ी आँखों के अश्रुपूर्ण होने से डरते थे |
-------जो बात कृष्ण राधा से नहीं कह पाए वह उन्होंने ललिता को ही कहा| गहरी बात अपने प्यार से नहीं कह पाते वह मित्र से कह देते हैं| कृष्ण भी ललिता से खुले हुए थे, वे उसके बचपन से अनुराग को जानते थे|
------ तुम्हारे होने पर हम सभी जितना प्यार करते हैं, उतना ही हम सब तुम्हें खोने पर भी करेंगे | राधा भी करेगी|........ यह सुनकर कृष्ण ललिता को स्थिर एकटक देखने लगे, कृष्ण इसके अर्थ में ऐसे डूबे जिसने कृष्ण की पूरी जिन्दगी के ही लिए प्यार का अर्थ बदल दिया | दूसरे क्षण ही मुस्कुराते हुए बोले, मेरे जाने के बाद राधा को संभाल लेना, उससे अधिक वे कुछ नहीं कह पाए |
--------श्रीकृष्ण के द्वारिका चले जाने पर ललिता ही राधिका को सम्हालती है | वह अपने विरह-व्यथा की अपेक्षा राधिका के विरह व्यथा का अधिक वर्णन करती है |
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----क्रमश -----अगली पोस्ट में --चन्द्रावली----'
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राधा -ललिता 
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ललिता -राधा
 

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

पुरुषत्व,स्त्रीत्व ... प्राकृतिक-संतुलन तथा आज की स्थिति--डा श्याम गुप्त ...

                                          कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


 



                           


 *पुरुषत्व,स्त्रीत्व ... प्राकृतिक-संतुलन तथा आज की स्थिति *****..


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-----सृष्टि का ज्ञात कारण है ईषत-इच्छा…..’एकोहं बहुस्याम”….. यही जीवन का उद्देश्य भी है । जीवन के लिये युगल-रूप की आवश्यकता होती है । अकेला तो ब्रह्म भी रमण नहीं कर सका….
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---"”स: एकाकी, नैव रेमे । स द्वितीयमैच्छत ।“
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--------तत्व दर्शन में ..ब्रह्म-माया, पुरुष-प्रकृति …वैदिक साहित्य में ..योषा-वृषा …संसार में……नर-नारी…। ब्रह्म स्वयं माया को उत्पन्न करता है…अर्थात माया स्वयं ब्रह्म में अवस्थित है……जो रूप-सृष्टि का सृजन करती है, अत: जीव-शरीर में-- माया-ब्रह्म अर्थात पुरुष व स्त्री दोनों भाव होते हैं।
-------शरीर - माया, प्रकृति अर्थात स्त्री-भाव होता है । अत: प्रत्येक शरीर में स्त्री-भाव व पुरुष-भाव अभिन्न हैं। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि जीव में ( अर्थात स्त्री-पुरुष दोनों में ही) दोनों तत्व-भाव होते हैं। गुणाधिकता (सेक्स हार्मोन्स या माया-ब्रह्म भाव की) के कारण….स्त्री, स्त्री बनती है…पुरुष, पुरुष ।
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---------तत्वज्ञान एवं परमाणु-विज्ञान के अनुसार इलेक्ट्रोन- ऋणात्मक-भाव है …स्त्री रूप है । उसमें गति है, ग्रहण-भाव है। प्रोटोन..पुरुष है….अपने केन्द्र में स्थित, स्थिर, सबसे अनजान, अज्ञानी-भाव रूप, अपने अहं में युक्त, आक्रामक, अशान्त …धनात्मक भाव ।
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------स्त्री- पुरुष के चारों ओर घूमती हुई उसे खींचती है,यद्यपि खिंचती हुई लगती है, खिंचती भी है,आकर्षित करती है,आकर्षित होती हुई प्रतीत भी होती है| इसप्रकार वह पुरुष की आक्रामकता, अशान्ति को शमित करती है, धनात्मकता को….नयूट्रल, सहज़, शान्ति भाव करती है….यह परमाणु का, प्रकृति का सहज़ सन्तुलन है।
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---------वेदों व गीता के अनुसार शुद्ध-ब्रह्म या पुरुष अकर्मा है, मायालिप्त जीव रूप में पुरुष कर्म करता है |
-------माया व प्रकृति की भांति ही स्त्री- स्वयं कार्य नहीं करती अपितु पुरुष को अपनी ओर खींचकर, सहज़ व शान्त करके कार्य कराती है परन्तु स्वय़ं कार्य करती हुई भाषती है, प्रतीत होती है।
-----नारी –पुरुष के चारों ओर घूमते हुए भी कभी स्वयं आगे बढकर पहल नहीं करती, पुरुष की ओर खिंचने का अभिनय करते हुए उसे अपनी ओर खींचती है। वह सहनशीला है। पुरुष आक्रामक है, उसी का शमन स्त्री करती है, जीवन के लिये, उसे पुरुषार्थ प्राप्ति हेतु, मोक्ष हेतु ।
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-----------भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन के चार पुरुषार्थ हैं - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष…. स्त्री –धर्म (गुणात्मकता) व काम (ऋणात्मकता) रूप है, पुरुष….अर्थ (धनात्मकता) व काम (ऋणात्मकता ) रूप है….
-------स्त्री-- पुरुष की धनात्मकता को सहज़-भाव करके मुक्ति की प्राप्ति कराती है। यह स्त्री का स्त्रीत्व है। कबीर गाते हैं….“हरि मोरे पीउ मैं हरि की बहुरिया…”…अर्थात मूल-ब्रह्म पुरुष-रूप है अकर्मा, परन्तु जीव रूप में ब्रह्म ( मैं ) मूलत:…स्त्री-भाव है ताकि संतुलन रहे। अत: यदि पुरुष अर्थात नर…भी यदि स्वयं नारी की ओर खिंचकर स्त्रीत्व-भाव धारण करे, ग्रहण करे तो उसके अहम, धनात्मकता, आक्रामकता का शमन सरल हो तथा जीवन, पुरुषार्थ व मोक्ष-प्राप्ति सहज़ होजाय ।
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-------प्रश्न यह उठता है कि यदि नारी स्वयं ही पुरुष-भाव ग्रहण करने लगे, अपनाने लगे तो ? यही आज होरहा है ।
-----पुरुष तो जो युगों पहले था वही अब भी है । ब्रह्म नहीं बदलता, वह अकर्मा है, अकेला कुछ नहीं है। ब्रह्म का मायायुक्त रूप, पुरुष जीवरूप तो नारीरूपी पूर्ण स्त्रीत्व-भाव से ही बदलता है, धनात्मकता, पुरुषत्व शमित होता है, उसका अह्म-क्षीण होता है, शान्त-शीतल होता है, क्योंकि उसमें भी स्त्रीत्व-भाव सम्मिलित है।
--------परन्तु स्त्री आज अपने स्त्रीत्व को छोडकर पुरुषत्व की ओर बढ रही है। आचार्य रज़नीश (ओशो)- का कथन है कि-
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" ’यदि स्त्री, पुरुष जैसा होने की चेष्टा करेगी तो जगत में जो भी मूल्यवान तत्व है वह खोजायगा ।"
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----------हम बडे प्रसन्न हो रहे हैं कि लडकियां, लडकों की भांति आगे बढ रही है। माता-पिता बडे गर्व से कह रहे हैं कि हम लडके–लडकियों में कोई भेद नही करते खाने, पहनने, घूमने, शिक्षा सभी मैं बराबरी कर रही हैं, जो क्षेत्र अब तक लडकों के, पुरुषों के माने जाते थे उनमें लडकियां नाम कमा रही है।
----------परन्तु क्या लडकियां स्त्री-सुलभ कार्य, आचरण-व्यवहार कर रही हैं? मूल भेद तो है ही...सृष्टि महाकाव्य में कहा गया है ....
' भेद बना है, बना रहेगा,
भेद-भाव व्यवहार नहीं हो | '

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-------------क्या आज की शिक्षा उन्हें नारीत्व की शिक्षा दे रही है? आज सारी शिक्षा-व्यवस्था तथा समाज भी भौतिकता के अज्ञान में फ़ंसकर लडकियों को लड़का बनने दे रहा है।
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-------यदि स्त्री स्वयं ही पुरुषत्व व पुरुष-भाव की आक्रमकता, अहं-भाव, धनात्मक्ता ग्रहण करलेगी तो उसका सहज़ ऋणात्मक-भाव, उसका कृतित्व, उसका आकर्षण समाप्त हो जायगा। वह पुरुष की अह्मन्यता, धनात्मकता को कैसे शमन करेगी?
-----पुरुष-पुरुष अहं का टकराव विसन्गतियों को जन्म देगा। नारी के स्त्रीत्व की हानि से उसके आकर्षणहीन होने से वह सिर्फ़ भोग-उपभोग की बस्तु बनकर रह् जायगी ।
-------पुरुषों के साथ-साथ चलना, उनके कन्धे से कन्धा मिला कर चलना एक पृथक बात है आवश्यक भी है परन्तु लडकों जैसा बनना, व्यवहार, जीवनचर्या एक पृथक बात। ---------आज नारी को आवश्यकता शिक्षा की है, साक्षरता की है, उचित ज्ञान की है। आवश्यकता स्त्री-पुरुष समता की है, समानता की नहीं, स्त्रियोचित ज्ञान, व्यवहार जीवनचर्या त्यागकर पुरुषोचित कर्म व व्यवहार की नहीं…..।

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

मुहब्बत के सिवा....ग़ज़ल.... डा श्याम गुप्त......

                          कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


मुहब्बत के सिवा....

कहते हैं शायर और भी गम हैं मुहब्बत के सिवा |
आप ही कहिये क्या रक्खा है मुहब्बत के सिवा |

हमने माना की मोहब्बत है इक काँटों की डगर,
किसने जाना है भला किससे, मुहब्बत के सिवा |

हमने लो मान लिया बेवफा है मुहब्बत भी खूब,ग़ज़ल----
बावफा और मिला कब है, मुहब्बत के सिवा |

जाने क्यों कहते हैं मुहब्बत को गम दुनिया वाले,
और जीने का सब़ब क्या है, मुहब्बत के सिवा |

इश्क वालों की जहां में यही खूबी है यारो,
जीते मरते हैं कब, किसपे, मुहब्बत के सिवा |

चलो माना कि हैं गम और भी ज़माने में, मगर,
इतना मीठा सा मिले कैसे, मुहब्बत के सिवा |

श्याम’ है इश्क में यही एक मुकम्मिल सा सवाल,
जियें तो किसपे, मरें किसपे, मुहब्बत के सिवा ||

बुधवार, 29 मार्च 2017

प्रतिपदा --नव संवत्सर ---डा श्याम गुप्त...

                        कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



 प्रतिपदा --नव संवत्सर ---

सृष्टि रचयिता ने किया, सृष्टि सृजन प्रारम्भ |
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से, संवत्सर आरम्भ ||

गुड़ी-पडवा, उगादी, चेटीचंड, चित्रेय |
विशु बैसाखी प्रतिपदा, संवत्सर नवरेह |

शुभ शुचि सुन्दर सुखद ऋतु, आता यह शुभ वर्ष |
धूम -धाम से मनाएं , भारतीय नव-वर्ष |

ऋतु बसंत मदमा रही, पीताम्बर को ओढ़ |
हरियाली साड़ी पहन, धरती हुई विभोर |

स्वर्ण थाल सा नव, प्रथम, सूर्योदय मन भाय |
धवल चांदनी चैत की, चांदी सी बिखराय |

फूलै फले नयी फसल, नवल अन्न सरसाय |
सनातनी नव-वर्ष यह, प्रकृति-नटी हरषाय |

पाश्चात्य नववर्ष को, सब त्यागें श्रीमान |
भारतीय नववर्ष हित, अब छेड़ें अभियान ||


चित्र-गूगल ..