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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

डा श्याम गुप्त का हीरक जयन्ती वर्ष अभिनन्दन ग्रन्थ -- अमृत कलश -- पश्च पृष्ठ व पुरोवाक ---डा श्याम गुप्त

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

                                   

डा श्याम गुप्त -अमृत कलश ---


                                         पुरोवाक ---साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र  सत्य

      पुरा नवीन आस्थाओं पर समान रूप से समन्वयक विश्वास रखने वाले, प्रत्येक क्षेत्र की भांति साहित्य में भी उसी चले आरहे ढर्रे पर चलकर सदा नवनीति का नवनीत प्रस्तुत करने वाले, प्रचार मंचों से प्रायः दूर रहने वाले, गर्ज़ तर्ज़ कर कोई उपस्थिति दर्शाए बिना चुपचाप साहित्य सेवा उसकी प्रगति समुन्नति में रत, मौलिक विषयों पर लिखने वाले, वरिष्ठ साहित्यकार, कवि, लेखक, समीक्षक, निबंधकार, कहानीकार, उपन्यासकार, चिन्तक, विचारक, साहित्य की सभी विधाओं में प्रवीण, डा श्यामगुप्त साहित्यिक जगत में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं| प्रत्येक वर्त्तमान भाव, विचार विषय पर अपने नवीन वैचारिक तथ्य, चले आरहे ढर्रे के विपरीत भाव कथ्य शैली के प्रस्तोता डा श्यामगुप्त स्वयं में ही एक संस्था हैं | आपकी अब तक १५ कृतियाँ काव्यदूत काव्य-निर्झरिणी - काव्य-मुक्तामृत सृष्टि महाकाव्य, शूर्पणखा खंडकाव्य, प्रेमकाव्य महाकाव्य, इन्द्रधनुष उपन्यास, ब्रजवान्सुरी, अगीत साहित्य दर्पण, कुछ शायरी की बात होजाए, अगीत-त्रयी, ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद, तुम तुम और तुम, पीर ज़माने की एवं बुककाव्य काँकरियाँ  आदि प्रकाशित हो चुकी हैं एवं वे अनेक सम्मानों पुरस्कारों से सम्मानित हैं | 

      कवि-कविता, रचना-रचनाकार, साहित्य-साहित्यकार की बेवाक, निष्पक्ष, बिना लाग-लपेट कठोर आलोचनात्मक समीक्षा टिप्पणी करने वाले के रूप में विख्यात, साहित्य की प्रत्येक विधा एवं प्रत्येक विषय पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले आराधक कवि-साहित्यकार डा श्यामगुप्त, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पश्चात हिन्दी साहित्य में अपनी महत्ता खोती हुई आलोचना-विधा की पुनः प्रतिष्ठा करने वाले साहित्यकार हैं | 

    डा श्यामगुप्त हिन्दी, ब्रज अंग्रेज़ी भाषाओं, उनके व्याकरण साहित्य के तत्व-निरूपण पर गहन पकड़ रखने वाले एवं स्पष्ट दृष्टि दृष्टिकोण युत विविध विषयक ज्ञान रखने वाले विरले साहित्यकार हैं | साहित्य में सुस्थापित तत्वों मानदंडों के साथ-साथ लीक से हटकर कुछ नवीन करते रहना उनका अध्यवसाय है अतः शोध ग्रंथों की भांति आपकी प्रत्येक कृति कुछ कुछ नवीनता स्वयं के नवीन विशिष्ट विचार तथा नवीन स्थापनाओं को लिए हुए होती है जो उन्हें अन्य कवियों साहित्यकारों से प्रथक एवं विशिष्ट बनाती है |

      कवि हृदय डा श्यामगुप्त एक अनुभवी, प्रतिभावान सक्षम, वरिष्ठ साहित्यकार हैं जो वरिष्ठ चिकित्सक भी हैं , वे विज्ञान के छात्र रहे हैं एवं चिकित्सा विज्ञान शल्यक्रिया-विशेषज्ञता उनका जीविकोपार्जन | भारतीय रेलवे की सेवा में चिकित्सक के रूप में देशभर में कार्यरत रहे अतः समाज के विभिन्न वर्गों, अंगों, धर्मों, व्यक्ति परिवार समाज की संरचना एवं अंतर्द्वंद्वों को आपने करीब से देखा, जाना समझा है | वे एक संवेदनशील, विचारशील, तार्किक के साथ साथ सांसारिक-आध्यात्मिक-धार्मिक नैतिक समन्वय की अभिरूचि पूर्ण साहित्यकार हैं, उनकी रचनाएं कृतित्व स्वतःस्फूर्त एवं जीवन से भरपूर हैं|

         बहुआयामी साहित्यकार महाकवि डा श्यामगुप्त हिन्दी भाषा में खड़ी-बोली ब्रज-भाषा एवं अंग्रेज़ी भाषाओं के साहित्य में रचनारत हैं| हिन्दी-साहित्य की गद्य पद्य दोनों विधाओं की गीत, अगीत, नवगीत, छंदोवद्य-काव्य, ग़ज़ल, कथा-कहानी, आलेख, निवंध, समीक्षा, उपन्यास, नाटिकाएं सभी में वे समान रूप से रचनारत हैंअनेक काव्य रचनाओं के वे सहयोगी रचनाकार हैं कई रचनाओं की भूमिका के लेखक भी हैं| अंतरजाल ( इंटरनेट ) पर विभिन्न राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय -पत्रिकाओं के वे सहयोगी रचनाकार हैं | श्याम स्मृति The world of my thoughts .., साहित्य श्याम, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान विजानाति-विजानाति-विज्ञान, छिद्रान्वेषी, अगीतायन आदि उनके स्वतंत्र चिट्ठे (ब्लॉग) हैं एवं वर्ल्डप्रेस डाट काम तथा अन्य कई सामुदायिक चिठ्ठों के सहयोगी रचनाकार हैं | दैनिक जागरण एवं नवभारत टाइम्स समाचार पत्रों के ब्लोग्स पर भी वे लेखन रत हैं |

     डा श्यामगुप्त की साहित्यिक दृष्टि काव्य-प्रयोजन मूलतः नवीनता के प्रति ललक एवं रूढ़िवादिता के विरोध की दृष्टि है| साहित्य के मूलगुण-भाव-प्रवणता, सामाजिक सरोकार, जन आचरण संवर्धन हेतु प्रत्येक प्रकार की प्रगतिशीलता, नवीनता के संचरण गति-प्रगति के वे पक्षधर हैं| कविता के मूलगुण - गेयता, लयवद्धता, प्रवाह गति एवं सहज सम्प्रेषणीयता के समर्थन के साथ-साथ केवल छंदीय कविता, केवल सनातनी छंद, गूढ़ शास्त्रीयता,

२.
अतिवादी रूढ़िवादिता लीक पर ही चलने के वे हामी नहीं हैं|  अपने इसी गुण के कारण वे आज की नवीन प्रगतिशील काव्य-विधा अगीत-कविता की और आकर्षित हुए एवं स्वयं
एक समर्थ गीतकार छंदीय कविता में पारंगत होते हुए भी तत्कालीन काव्यजगत के छंदीय कविता में रूढिगतिता के ठेके
सजाये हुए स्वघोषित स्वपोषित संस्थाओं उनके अधीक्षकों के अप्रगतिशील क्रियाकलापों एवं तमाम विरोधों के बावजूद अगीत कविता विधा को प्रश्रय देते रहे एवं उसकी प्रगति हेतु विविध आवश्यक साहित्यिक कदम भी उठाये जो उनके विशद अगीत-साहित्य के कृतित्व के रूप में सम्मुख आया |

             डा श्यामगुप्त, नवीन प्रयोगों, स्थापनाओं को काव्य, साहित्य समाज की प्रगति हेतु आवश्यक मानते हैं, परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं की साहित्य काव्य के मूल उद्देश्यों से विरत कर दिया जाय, नवीनता के नाम पर मात्राओं, पंक्तियों को जोड़-तोड़ कर, विचित्र-विचित्र शब्दाडम्बर, तथ्यविहीन कथ्य, विरोधाभासी देश, काल तथ्यों को प्रश्रय दिया जाय, यथा वे कहते हैं कि..
          साहित्य सत्यम शिवम् सुन्दर भाव होना चाहिए,
          साहित्य शुभ शुचि ज्ञान पारावार होना चाहिए |’

           महाकाव्य एवं खंडकाव्य रचकर वे महाकवि की संज्ञा प्राप्त करचुके हैं | काव्य-शास्त्रीय ग्रन्थ, एक काव्य विधा का सम्पूर्ण लक्षण-ग्रन्थ लिखने पर उन्हें साहित्याचार्य की संज्ञा से भी सम्मानित किया जा चुका है |
          ऐसे गुणों से विभूषित महाकवि के विविध रूप-भावों कृतित्वों से साहित्य जगत को विशद रूप में परिचित कराने की इच्छा से उनकी साहित्य साधना आराधना को कृतिबद्ध रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक समझा गया | अतः अखिल भारतीय अगीत परिषद लखनऊ एवं नव सृजन संस्था , लखनऊ  ने उनके हीरक जयन्ती अवसर पर अभिनंदन ग्रन्थ अमृत कलश के प्रकाशन का आयोजन किया है | इस अवसर पर  शुभकामनाओं सहित |

 अगीतायन, ३८८५ ,राजाजीपुरम                                            
  लखनऊ,-१७                                                  डॉ. रंगनाथ मिश्र सत्य एम् ,पीएचडी,डीलिट 
  मो.९३३५९९०४३५
                                                                              संस्थापक /अध्यक्ष
                                                                     अखिल भारतीय अगीत परिषद्,लखनऊ                                                                  
                                                                                 





पश्च पृष्ठ---अमृत कलश 

फ्लेप--अमृत कलश 

फ्लेप--अमृत कलश 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

डा श्याम गुप्त का हीरक जयन्ती वर्ष अभिनन्दन ग्रन्थ --अमृत कलश --पृष्ठ १ से ४ --डा श्याम गुप्त .....क्रमश

                                                कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित




                      डा श्याम गुप्त का  हीरक जयन्ती वर्ष  अभिनन्दन ग्रन्थ --                                              अमृत कलश --
मुख पृष्ठ ---
                   






       अमृत कलश --  पृष्ठ एक 






                          





    अमृत कलश 

              सम्पादक मंडल

 साहित्यभूषण डॉ. रंगनाथ मिश्र सत्य 
        अध्यक्ष, अ.भा.अगीत परिषद्, लखनऊ
 डॉ योगेश गुप्ता –.
       अध्यक्ष - नव-सृजन साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था , लखनऊ
 देवेश द्विवेदी देवेशसचिव-नव सृजन

 श्रीमती सुषमा गुप्ता  एमए हिन्दी

 प्रेम शंकर शास्त्री बेताव  --प्रवक्ता अग्रसेन इंटर कालिज , लखनऊ









अमृत कलश --पृष्ठ  दो व तीन ---







अमृत कलश -पृष्ठ ४-----


                                    











अमृत कलश

हिन्दी साहित्य-विभूषण , साहित्याचार्य 
 महाकवि डॉ. श्याम गुप्त, हीरक जयन्ती अभिनंदन ग्रन्थ ..

अभिनंदन ग्रन्थ समिति
साहित्यभूषण डॉ. रंगनाथ मिश्र सत्य
डॉ. योगेश गुप्त
देवेश द्विवेदी देवेश
श्रीमती सुषमा गुप्ता
तेज नारायण श्रीवास्तव राही
अनिल किशोर शुक्ल निडर
मुरली मनोहर कपूर
श्रीमती मंजू सक्सेना
रामप्रकाश शुक्ल प्रकाश
श्रीमती विजय कुमारी मौर्या
निर्विकार पंकज श्याम
रीना गुप्ता
दीपिका गुप्ता
शैलेश कुमार अग्रहरी

                         -----क्रमश 



रविवार, 16 फ़रवरी 2020

लोकार्पण समारोह----- अभिनन्दन ग्रन्थ 'अमृत कलश' -----डा श्याम गुप्त

                                              कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

   अखिल भारतीय अगीत परिषद् एवं नव सृजन सांस्कृतिक संस्था लखनऊ द्वारा प्रकाशित   डा श्याम गुप्त    अभिनन्दन ग्रन्थ 'अमृत कलश' एवं डा श्याम गुप्त की तीन कृतियों --तुम तुम और तुम --प्रेम  व श्रृंगार गीत संग्रह ...पीर ज़माने की ---ग़ज़ल संग्रह एवं ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ,....का  
---------लोकार्पण समारोह दिनांक २२ फरवरी २०२० शनिवार को यू पी प्रेस क्लब हज़रत गंज लखनऊ में सायं ४ बजे | सभी आमंत्रित हैं......




  

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

कृष्ण जन्म पर---डा shyam गुप्त

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



बाजै रे पग घूंघर बाजै रे ।
ठुमुकि ठुमुकि पग नचहि कन्हैया, सब जग नाचै रे ।
जसुमति अंगना कान्हा नाचै, तोतरि बोलन गावै ।
तीन लोक में गूंजे यह धुनि, अनहद तान गुंजावै ।
कण कण सरसे, पत्ता पत्ता,  हर प्राणी हरषाये  |
कैसे न दौड़ी आयं गोपियाँ घुँघरू चित्त चुराए |
तारी  दै दै  लगीं नचावन, पायलिया छनकैं  |
ढफ ढफली खड़ताल, मधुर-स्वर,कर कंकण खनकें |
गोल बनाए गोपी नाचें,  बीच नचें नंदलाल  |
सुर दुर्लभ लीला आनंद मन, जसुमति होय निहाल |
कान्हा नाचे ठुम्मक ठुम्मक, तीनों लोक नचावै रे |
मन आनंद चित श्याम’, श्याम की लीला गावै रे ||


ब्रज की भूमि भई है निहाल |
सुर गन्धर्व अप्सरा गावें नाचें दे दे ताल |
जसुमति द्वारे बजे बधायो, ढफ ढफली खडताल |
पुरजन परिजन हर्ष मनावें जनम लियो नंदलाल |
आशिष देंय विष्णु शिव् ब्रह्मा, मुसुकावैं गोपाल |
बाजहिं ढोल मृदंग मंजीरा नाचहिं ब्रज के बाल |
गोप गोपिका करें आरती,  झूमि  बजावैं  थाल |
आनंद-कन्द प्रकट भये ब्रज में विरज भये ब्रज-ग्वाल |
सुर दुर्लभ छवि निरखे लखि-छकि श्याम’ हू भये निहाल ||

सखी री मोरे अंगना आयो श्याम |
पीताम्बर कटि मोर पखा सिर छवि सांवरी ललाम |
चंचल चपल नैन कजरारे कानन लटकन लोल |
हरित मुरलिया अधरन सौहै मधुरस घोले बोल |
ठुमुकि ठुमुकि पग नचै कन्हैया सुधि बुधि बैठी खोय |
लग्यो नचावन कर गहि मोहन मोहि लियो सखि मोय |
भरमाई सखि नैनन सैननि नटखट नन्द किशोर |
छींके  चढि दधि माखन लूट्यो मटुकी दीन्ही फोरि |
चेतति ही जब पकरन धाई भाज्यो नैन नचाय |
श्याम, श्याम लीला चित चितवत चित चकोर हरषाय ||

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

सृष्टि के महासृजक’ कश्यप मुनि , कश्मीर व कश्मीरी ब्राहमण ---डा श्याम गुप्त

                                         कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

सृष्टि के महासृजक’ कश्यप मुनि , कश्मीर व कश्मीरी ब्राहमण ---
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जब सृष्टि विकास की बात होती हैं तो अर्थ होता है कि जीव, जंतु या मानव की उत्पत्ति |ऋषि कश्यप एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने बहुत-सी स्त्रियों से विवाह करके पृथ्वी पर प्राणी-कुल का विस्तार किया था। आदिमकाल में जातियों की विविधता आज की अपेक्षा कई गुना अधिक थी।
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प्रजापत्य कल्प में ब्रह्मा ने रुद्र रूप को ही स्वयंभु मनु और स्त्री रूप में शतरूपा को प्रकट किया। स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा के कुल पाँच सन्तानें थीं जिनमें से दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद तथा तीन कन्याएँ आकूति, देवहूति और प्रसूति थे। आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम के साथ हुआ। रुचि के आकूति से एक पुत्र उत्प‍न्न हुआ जिसका नाम यज्ञ रखा गया। इनकी पत्नी का नाम दक्षिणा था। कपिल ऋषि देवहूति की संतान थे। हिंदू पुराणों अनुसार इन्हीं
*****तीन कन्याओं से संसार के मानवों में वृद्धि हुई।*****
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दक्ष ने प्रसूति से 24 कन्याओं को जन्म दिया। इसके नाम श्रद्धा, लक्ष्मी, पुष्टि, धुति, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, ऋद्धि, और कीर्ति हैं। तेरह का विवाह धर्म से किया और फिर भृगु से ख्याति का, शिव से सती का, मरीचि से सम्भूति का, अंगिरा से स्मृति का, पुलस्त्य से प्रीति का पुलह से क्षमा का, कृति से सन्नति का, अत्रि से अनसूया का, वशिष्ट से ऊर्जा का, वह्व से स्वाह का तथा पितरों से स्वधा का विवाह किया।
*****आगे आने वाली सृष्टि इन्हीं से विकसित हुई।******
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ऋषि कश्यप -- सृष्टि के महासृजक---
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ऋषि #कश्यप ब्रह्माजी के मानस-पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे। इन्हें
#अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है जिनका नाम आज भी भारतीय संस्कारों के समय लिया जाता है । इनकी माता 'कला' कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी। सप्तर्षियों में एक महर्षि कश्यप सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी के आदेशानुसार सृष्टि सृजन हेतु अवतरित हुए।
-----ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति ने अपनी अन्य साठ कन्याओं में से== १७ कन्याओं का विवाह कश्यप के साथ=== कर दिया। इस प्रकार महर्षि कश्यप की अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सुरसा, तिमि, विनता, कद्रू, पतांगी और यामिनि आदि पत्नियां बनीं।
---- वैश्वानर की दो पुत्रियों ==पुलोमा और कालका के साथ भी कश्यप ने== विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के साठ हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ जोकि कालान्तर में निवातकवच के नाम से विख्यात हुए।
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१. महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नी अदिति के गर्भ से बारह आदित्य पैदा किए, जिनमें सर्वव्यापक देवाधिदेव नारायण का #वामन अवतार भी शामिल था। श्री विष्णु पुराण के अनुसार ---
मन्वन्तरे∙त्र सम्प्राप्ते तथा वैवस्वतेद्विज। वामन: क’यपाद्विष्णुरदित्यां सम्बभुव ह।।
त्रिमि क्रमैरिमाँल्लोकान्जित्वा येन महात्मना।पुन्दराय त्रैलोक्यं दत्रं निहत्कण्ट
-----अर्थात्-वैवस्वत मन्वन्तर के प्राप्त होने पर भगवान् विष्णु कश्यप जी द्वारा अदिति के गर्भ से वामन रूप में प्रकट हुए। उन महात्मा वामन जी ने अपनी तीन डगों से सम्पूर्ण लोकों को जीतकर यह निष्कण्टक त्रिलोकी इन्द्र को दे दी थी।
-------बारह आदित्यों के रूप में महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से जन्म लिया, जोकि इस प्रकार थे -विवस्वान् ( सूर्य ), अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरूण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)।
महर्षि कश्यप के पुत्र #विवस्वान् से #मनु वैवस्वत का जन्म हुआ| महाराज मनु को इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रान्नु, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक दस श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति हुई।
२. महर्षि कश्यप ने दिति के गर्भ से परम् दुर्जय हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री पैदा की। श्रीमद्भागवत् के अनुसार इन तीन संतानों के अलावा दिति के गर्भ से ४९ अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जोकि मरूद्गण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र नि:संतान रहे। देवराज इन्द्र ने इन्हें अपने समान ही देवता बना लिया। जबकि हिरण्याकश्यप को चार पुत्रों अनुहल्लाद, हल्लाद, परम भक्त प्रहल्लाद, संहल्लाद आदि की प्राप्ति हुई।
३. पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरूण, अनुतापन, धुम्रकेतु, विरूपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि ६१ महान् पुत्र हुये।
४. रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए।
५.पत्नी अरिष्टा से गन्धर्व पैदा हुए।
६.सुरसा नामक रानी की कोख से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए।
७.इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ।
८.मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं।
9.कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने साँप, बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए।
१०.ताम्रा ने बाज, गीद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया।
११.सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पति की।
१२.रानी सरसा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया।
१३.तिमि ने जलचर जन्तुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया।
१४.विनता के गर्भ से गरूड़ (विष्णु का वाहन) और अरूण (सूर्य का सारथि) पैदा किए।
१५.कद्रू की कोख से अनेक नागों का जन्म हुआ।
१६.रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ।
१७.यामिनी के गर्भ से शलभों (पतिंगों) का जन्म हुआ।
१८ व १९---पुलोमा और कालका से पौलोम और कालकेय नामक साठ हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ जोकि कालान्तर में निवातकवच के नाम से विख्यात हुए।
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कश्यप को ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माना गया हैं। पुराणों अनुसार हम सभी उन्हीं की संतानें हैं। सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम #मेरू पर्वत के शिखर पर था जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में लीन रहते थे।
----मुनिराज कश्यप नीतिप्रिय थे और वे स्वयं भी धर्म-नीति के अनुसार चलते थे और दूसरों को भी इसी नीति का पालन करने का उपदेश देते थे। उन्होने अधर्म का पक्ष कभी नहीं लिया, चाहे इसमें उनके पुत्र ही क्यों न शामिल हों। वे राग-द्वेष रहित, परोपकारी, चरित्रवान और प्रजापालक थे। वे निर्भिक एवं निर्लोभी थे। कश्यप मुनि निरन्तर धर्मोपदेश करते थे, जिनके कारण उन्हें श्रेष्ठतम उपाधि हासिल हुई। समस्त देव, दानव एवं मानव उनकी आज्ञा का अक्षरश: पालन करते थे।
----- महर्षि कश्यप अपने श्रेष्ठ गुणों, प्रताप एवं तप के बल पर श्रेष्ठतम महानुभूतियों में गिने जाते थे। उन्होंने समाज को एक नई दिशा देने के लिए ‘#स्मृति-ग्रन्थ’ जैसे महान् ग्रन्थ की रचना की। इसके अलावा ‘#कश्यप-#संहिता’ की रचना करके तीनों लोकों में अमरता हासिल की।
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कश्यप सागर व कश्मीर ----
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इतिहास के अनुसार ‘#कस्पियन #सागर’ एवं भारत के शीर्ष प्रदेश #कश्मीर का नामकरण भी महर्षि कश्यप जी के नाम पर ही हुआ। महर्षि कश्यप द्वारा संपूर्ण सृष्टि के सृजन में दिए गए महायोगदान की यशोगाथा वेदों, पुराणों, स्मृतियों, उपनिषदों एवं अन्य धार्मिक साहित्यों में उपलब्ध है, जिसके कारण उन्हें ‘==सृष्टि के महासृजक==’ उपाधि से विभूषित किया जाता है।
माना जाता है कि कश्यप ऋषि के नाम पर ही कश्यप सागर (कैस्पियन सागर) और कश्मीर का प्राचीन नाम था। शोधकर्ताओं के अनुसार कैस्पियन सागर से लेकर कश्मीर तक ऋषि कश्यप के कुल के लोगों का राज फैला हुआ था। समूचे कश्मीर पर ऋषि कश्यप और उनके पुत्रों का ही शासन था। कश्यप ऋषि का इतिहास प्राचीन माना जाता है।
------ कैलाश पर्वत के आसपास भगवान ==शिव के गणों की सत्ता== थी। उक्त इलाके में ही=== दक्ष राजा=== का भी साम्राज्य भी था|
हिमालय से लगे लगभग सभी राज्य और देश प्राचीन भारत का हिस्सा रहे हैं जिसमें भारतीय राज्य कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल के अलावा नेपाल, तिब्बत और भूटान नाम के तीन देशों का भी पुराण और वेदों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है। तिब्बत को वेद और पुराणों में त्रिविष्टप कहा गया है। वहीं पर किंपुरुष नामक देश के होने का भी उल्लेख मिलता है।
मत्स्य पुराण में अच्छोद सरोवर और अच्छोदा नदी का जिक्र मिलता है जो कि कश्मीर में स्थित है।
अच्छोदा नाम तेषां तु मानसी कन्यका नदी ॥ १४.२ ॥ .
अच्छोदं नाम च सरः पितृभिर्निर्मितं पुरा । .
अच्छोदा तु तपश्चक्रे दिव्यं वर्षसहस्रकम्॥ १४.३ ॥
\
कश्यप ऋषि ===कश्मीर के पहले राजा ===थे। कश्मीर को उन्होंने अपने सपनों का राज्य बनाया। उनकी एक पत्नी कद्रू के गर्भ से नागों की उत्पत्ति हुई जिनमें प्रमुख 8 नाग थे- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक। इन्हीं से नागवंश की स्थापना हुई। आज भी कश्मीर में इन नागों के नाम पर ही स्थानों के नाम हैं। कश्मीर का अनंतनाग नागवंशियों की राजधानी थी। .
काश्मीर भारत का सबसे प्राचीन और प्रथम राज्य है। मरीच पुत्र कश्यप के नाम से पूर्व मेँ कश्यपमेरु या कशेमर्र नाम था।
इससे भी पूर्व मत्स्य पुराण में कहा गया है- मरीचि के वंशज देवताओं के पितृगण जहां निवास करते हैं वे लोग सोमपथ के नाम से विख्यात हैं। यह पितृ अग्निष्वात्त नाम से ख्यात है। जिनके सौन्दर्य से आकर्षित होकर इन्हीँ पितरोँ की मानस कन्या अमावसु नामक पितर युवक के साथ रहना चाहती थी। जिस दिन अमावसु ने अच्छोदा को मना किया। तब से वह तिथि अमावस्या नाम से प्रसिद्ध हुई और अच्छोदा नदी रूप हो गई। अमावस्या तभी से पितरोँ की प्रिय तिथि है।
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काश्मीर घाटी – सतीसर--- कश्मीरी ब्राहमण ---
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सतीसर से पूर्व--
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सुना जाता है कि यह एक घाटी थी जिसमें कुछ कबीले रहते थे जिनका मुखिया दया देव था जो वर्त्तमान अफ्रीकी कबीले से मिलते जुलते थे | वस्तुतः यह स्थान चरवाहे कबीलों का शीत ऋतु में एक प्रकार का अभयारण्य था जो उच्च पर्वतों से नीचे घाटी में उतर आते थे एवं ग्रीष्म में पुनः अपने प्रदेश में चले जाते थे | लगभग ३८९९ ईसा पूर्व नोआ की बाढ़ ( मनु का #महाजलप्लावन---मत्स्यावतार ) की घटना में बारामूला स्थान पर ऊपर पर्वत से गिरी हुई पहाडी ने रास्ता रोक दिया जिसमें समस्त कबीले आदि नष्ट होगये एवं यह घाटी सतीसर झील में परिवर्तित होगई | इसी स्थान को काट कर महर्षि कश्यप ने सतीसर झील के जल निकाल कर पुनः कश्मीर घाटी को बसाया |
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वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग १० करोड़ वर्ष पूर्व कश्मीर घाटी टेथिस सागर ( दिति सागर ) का भाग थी तथा आज जो पहाड़ियां है वे सब सागर के अन्दर जलमग्न थीं |
जिसे सतीसर कहा गया | भयानक भूकंप आने पर बारामूला के समीप पर्वत दीवार में दरार आगई और सतीसर झील कश्मीर घाटी में बदल गयी
----- ऋग्वेदिक काल में १२७००—११५०० BCE में कश्मीर घाटी ग्लेशिअल झील थी ––निलमत पुराण के अनुसार --- -एक ऋग्वेदिक कबीला— पिशाच -कश्मीर में रहता था जो हरियूपिया के असुर राजा का साथी था |
----११५०० BCE—में संभर = शंबरासुर-----हरियूपिया, हरप्पा का असुर राजा कश्मीर पर राज्य करने लगा |---११३२५ BCE—इंद्र ने शंबर को मार कर उसका राज्य छीन लिया |
वैदिक काल में कुरु-पांचाल राज्य पीर पंजाल पहाड़ियों तक जम्मू कश्मीर तक था|
जम्मू क्षेत्र में पुरु वंश का राजा मद्र-- मद्र राज्य वंश सिन्धु - सतलुज के मध्य राज्य करता था | मद्र की राजधानी सियालकोट एवं शाल्व की राजधानी शाकल थी |
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इस प्रकार काश्मीर क्षेत्र को को 'सती 'या 'सतीसर' कहते थे। यहां सरोवर में सती भगवती नाव में विहार करती थीं अर्थात शिव का क्षेत्र था जहां वे बहुत काल तक निवास करते रहे | तदुपरांत जलोद्भव नामक राक्षस इस झील में रहने लगा| वह स्थानीय लोगों पर अत्याचार करता था एवं ब्रहमा द्वारा दिए गए वरदान के अनुसार वह जब तक जल के अन्दर रहेगा कोई उसे नहीं मार सकता था |
------पार्वती ने कश्यप मुनि से कश्मीर आकर पांचाल गिरी क्षेत्र को शुद्ध करने को कहा |-----कश्यप अपने पुत्र नील नाग  वीरनाग ) के साथ शिव के साथ देने अनंतनाग क्षेत्र में आये और पिशाचों को हरा कर भगा दिया| वे पांचाल गिरि ( पीर पंजाल ) में बस गए. अतः उस स्थान का नाम कश्यप मेरु - कश्मीर कहा गया |
--------उस समय जलोद्भव राक्षस कश्मीर घाटी में उत्पात मचाये हुए था | ११२०० BCE के लगभग घाटी में भूकंप आया और बारामूला के समीप चट्टानें हट जाने से सतीसर झील काजल बहा गया जिससे मद्र ,शाल्व, सिन्धु व गुजरात में भीषण जल प्रलय हुई | कश्मीर घाटी में हरीपर्वत का उद्भव हुआ और जलोद्भव मारा गया | ११२०० BCE में कश्मीर घाटी रहने लायक हुई |
नील नाग कश्मीर का सर्वप्रथम शासक हुआ| और कश्यप-कद्रू के नाग पुत्रों ने लम्बे समय लगभग ५०० BCE तक कश्मीर पर राज्य किया |
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सतीसर
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नीलामत पुराण के अनुसार जब ब्रहमा के पौत्र कश्यप मुनि भारत के इस भाग की यात्रा पर आये तो उनके तेज, तप व अध्यात्मिक शक्ति बल को देखकर स्थानीय लोगों ने अपनी व्यथा सुनाई | कश्यप मुनि ने राक्षस को मारने का निश्चय किया | उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की तब शिव ने प्रसन्न होकर विष्णु व ब्रह्मा को जलोद्भव को दंड देने को कहा परन्तु यह एक कठिन काम था क्योंकि वह जल के अन्दर छुप जाता था |
------अंतत ब्रह्मा व विष्णु ने सतीसर को सुखाने का विचार किया | विष्णु ने बारामूला (बराह मूल ) के निकट पर्वत को काट दिया जिससे झील का जल बह गया | परन्तु फिर भी कुछ गड्ढे बचे थे जिसमें राक्षस छुप जाता था | तब विष्णु ने समीर पर्वत के एक टुकडे को काट कर उस गड्ढे में भर दिया और राक्षस उसमें दब कर मर गया, उस स्थान को कोही-मारन कहा गया और वह पत्थर हरी पर्वत हो गया। | यह भी कहा जाता है कि देवताओँ के आग्रह पर पक्षी सारिका रूप मेँ भगवती ने चोंच में पत्थर रखकर राक्षस के ऊपर फैंक कर राक्षस को मारा था।
-------ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में शोपियां के नज़दीक नोबुग्नई स्थान पर में नावें बांधने के बड़े बड़े छिद्र युत बड़ी बडी पर्वत शिलायें मिलती हैं जो हिन्दुओं के लिए पवित्र स्थान है | यह सिद्ध करते हैं कि कभी यह क्षेत्र जल के अन्दर रहा होगा |
प्रकारान्तर से सतीसर में बनी इस दरार से पूरा पानी निकल गया और भूमि ऊपर आ गयी। ऋषियोँ, मरीचि पितरः तथा कश्यप की इस वास्तविक स्वर्ग भूमि #अमरनाथ, बूढा़ अमरनाथ #ज्वालादेवी पठानकोट #वैष्णोदेवी, छीरभवानी और अति प्राचीन मार्तण्डमंदिर भी था। मार्तण्ड मंदिर क्षेत्र को अब 'मटन' गांव कहा जाता है। इस प्रकार यह स्थान सूखी हुई जमीन काश्मीर घाटी हुई | नीलमत पुराण के अनुसार --संस्कृत का = जल व शिमीरा = जल से सूखी हुई जमीन = काश्मीर--पृथ्वी का स्वर्ग | घाटी से प्रवाहित जल से वितस्ता ( व्यास ) व झेलम नदियाँ प्रवाहित हुईं |
कश्यप ऋषि ने इस सुन्दर स्थान को बसाने के लिए स्वयं जैसे विज्ञजनों ब्राहमणों को यहाँ बसने हेतु आवाहन किया एवं दूर दूर से विज्ञजनों को वहां लाकर बसाया गया|
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इतिहासकारों के अनुसार -#कात्याचार्य#माम्ताचार्य व #अत्वाचार्य तीन #ब्राह्मण भाई थे जिन्होंने इस सुन्दर स्थान को फलने फूलने में योगदान दिया| ====इन सभी के वंशज आज के कश्मीरी ब्राह्मण हैं| जो वहां के मूल निवासी हैं | ====अतः यह स्थान कश्यपपुर या कश्मीर कहलाया | मीर =घर = कश्यप का घर | यह भी कहा जाता है कि कश्यप मुनि की पत्नी का नाम मीर था अतः नाम कश्यपमीर = कश्मीर हुआ |
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मुस्लिम कथा---के अनुसार सुलेमान के समय कश्मीर में एक देव( विशालकाय राक्षस ) कशाप रहता था जो मीर नाम की स्त्री पर रीझा हुआ था परन्तु उसे रिझाने में असफल था| जब सुलेमान ने सतीसर झील के लजाल को निकालन का फैसला किया तो उसने कशाप देव को वचन दिया कि यदि वह इस कार्य को कर देता है तो उसे मीर प्रदान कर दी जायगी | इस प्रकार कशाप देव ने बारामूला पर स्थान कट कर झील को बहा दिया जो वितस्ता नदी बनी |
-------परन्तु यह असत्य कथा है इस स्थान पर बस्ती ५०० वर्ष ईसा पूर्व द्वापर युग मे बसाई गयी है जबकि सुलेमान कलियुग के १८०० वर्ष बाद कश्मीर पहुंचा था|
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श्रीनगर जिसका पुराना नाम प्रवरपुर है, महाराजा प्रवरसिंह इस क्षेत्र के प्रथम शासक थे | इसी शहर की दोनों ओर हरीपर्वत और शंकराचार्य पर्वत हैं आदि शंकराचार्य ने इसी पहाड़ी पर भव्य शिवलिंग, मंदिर और नीचे मठ बनाया। शंकराचार्य पर्वत के समीप अति प्राचीन दुर्गानाथ मंदिर के विध्वंस के मलबे से ही 'हमदन मस्जिद भी बनाई गई है जो लकडी़ की है। वहां एक बहते जलस्रोत में आज भी हिन्दू काली की पूजा करते हैं।
------ प्राचीन कश्मीर के लोग बूढ़े अमरनाथ क्षेत्र में महर्षि #पुलस्त्य के भव्य आश्रम में वेद पढ़ते थे। उनके नाम की वाली पुलस्ता नदी आज भी है। जम्मू पठान कोट मार्ग पर पुरमंडल नामक गौरवशाली गयाजी जैसा पवित्र और मान्य श्राद्धक्षेत्र भी है। .
भारतीय ग्रंथों के अनुसार जम्मू को डुग्गर प्रदेश कहा जाता है। जम्मू संभाग का क्षे‍त्रफल पीर पंजाल ( कुरु-पंचाल ) की पहाड़ी रेंज में खत्म हो जाता है। इस पहाड़ी के दूसरी ओर कश्मीर है।
पुरा कथा के अनुसार जम्मू हिन्दू राजा जम्बुलोचन ईसा से १४०० वर्ष पूर्व बसाया था | शिकार करते हुए राजा तवी नदी के इस क्षेत्र में पहुंचा तो नदी की धार में शेर व बकरी को एक ही स्थान पर जल पीते हुए देखकर अत्यंत प्रभावित हुआ और स्थान का नाम अपने नाम पर जम्बू रख दिया जो कालांतर में जम्मू हुआ |
जम्मू का उल्‍लेख महाभारत में भी मिलता है। हाल में अखनूर से प्राप्‍त हड़प्‍पा कालीन अवशेषों तथा मौर्य, कुषाण और गुप्‍त काल की कलाकृतियों से जम्मू के प्राचीन इतिहास का पता चलता है। लद्दाख एक ऊंचा पठार है जिसका अधिकतर हिस्सा 3,500 मीटर (9,800 फीट) से ऊंचा है। यह हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रृंखला और सिन्धु नदी की ऊपरी घाटी में फैला है।
चित्र १- सतीसर
चित्र२---सतीसर के सूखने के उपरांत कश्मीर घाटी…

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चित्र १- सतीसर
चित्र२---सतीसर के सूखने के उपरांत कश्मीर घाटी…

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

किस्से राज-दरबार के --- किस्सा एक--- महिला चिकित्सकों की ड्यूटी -- डा श्याम गुप्त

                                 कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


किस्से राज-दरबार के ---
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राजा का दरवारी या सरकारी अधिकारी का कार्य काँटों की बगिया में चलना होता है | उस पर पंचमुखी दबाव होते हैं -ऊपर के –अधिकारियों व शासन के ,उपभोक्ता या कर्मचारियों की अपेक्षाओं के, कर्मचारी यूनियनों के, सहयोगियों की चालों के एवं स्थानीय अराजक तत्वों के |
--------इसमें यदि पारदर्शिता, स्पष्ट-दृष्टि, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर, लाभ-हानि की सोच व कुछ प्राप्ति की आशा के बिना कार्य, नियमों व अपने विषय का स्पष्ट ज्ञान, संभाषण-योग्यता, न कहने की कला एवं कागज़ कार्य, लिखा-पढी में कहीं भी न फंसने की योग्यता है तो आप ‘परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ ‘..की भांति कार्य सम्पादन कर सकते है |
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१. किस्सा एक---
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महिला चिकित्सकों की ड्यूटी --
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बात उस समय की है जब मैं प्रशासनिक सेकण्ड इन कमांड था | मुझे ही चिकित्सकों की इमरजेंसी व अन्य ड्यूटियां लगानी होती थीं | होस्पीटल की चीफ एक महिला चिकित्सक थीं जो स्वयं स्त्री चिकित्सा विशेषज्ञ थीं |
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मैं सदैव ही नारी स्वातन्त्र्य का पक्षधर हूँ | मेरे उपन्यास, कथाएं, व काव्य-रचनाएँ आदि भी इस विषय पर हैं,
-------परन्तु ‘अति सर्वत्र वर्ज्ययेत’ का पक्षधर मैं महिलाओं के अति-सुरक्षा भाव एवं महिला होने का लाभ उठाने के भाव को उनके वास्तविक उत्थान व प्रगति की राह में रोड़ा समझता हूँ |
-------यदि महिलायें वेतन व अधिकारों में समानता चाहती हैं तो कार्यों में छूट क्यों चाहती हैं, विशिष्ट तथ्यों व स्थितियों को छोड़कर |
------अतः मैं महिला चिकित्सकों की भी इमरजेंसी ड्यूटी, नाईट ड्यूटी व बाहर काल ड्यूटी आदि लगाने के पक्ष में था |
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प्रायः महिला चिकित्सक इस प्रकार की ड्यूटियाँ करने में परहेज़ करती थीं, विशेषकर रात्रि ड्यूटी | मुझसे पहले उन्हें इस बात का लाभ दिया जाता रहा था |
------पुरुष चिकित्सक प्रायः इस पर एतराज़ भी किया करते थे | क्योंकि चीफ एक महिला थीं, सभी महिला चिकित्सकों ने प्रतिवेदन किया कि हमें इन ड्यूटियों से मुक्त रखा जाय और उन्होंने सहज भाव से स्वीकार भी कर लिया |
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दूसरे दिन मैंने चीफ को एक पत्र लिखा
---- यदि हमारी महिला-चिकित्सक इस प्रकार की ड्यूटियों एवं अन्य सामान्य प्रशासनिक कार्यों से बचती रहेंगीं तो उन्हें विभिन्न अनुभव कैसे प्राप्त होंगे,
-----वे कार्य-स्थितियां व विशिष्ट परिस्थियों से सामना करने लायक अनुभव कैसे प्राप्त करेंगीं एवं भविष्य की इन्दिरा गांधी व अन्य महान महिलाओं के समान प्रत्येक परिस्थिति से जूझने के योग्य कैसे बनेंगीं |
-------कल उन्हें भी उच्च-प्रशासनिक अधिकारी बनना है | वे स्वयं आपके जैसी कुशल व योग्य, स्वतंत्र, स्पष्ट व उचित सटीक निर्णय लेने वाली अफसर, अस्पताल प्रमुख व प्रशासनिक अधिकारी कैसे बनेंगीं |
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अगले दिन ही चीफ ने सबके सम्मुख मुझे बधाई देते हुए कहा, आपका पत्र मुझे अत्यंत ही अच्छा लगा, सुन्दर, सटीक, उचित तर्क व तथ्यपूर्ण | मैंने उसे अपने व्यक्तिगत रिकार्ड में रख लिया है | आप सभी की ड्यूटी समान रूप से लगायें |

गुरुवार, 30 मई 2019

कांग्रेस की गलती---- या आत्मघात ---डा श्याम गुप्त

                                  कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित



कांग्रेस की गलती---- या आत्मघात --
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एक तप: पूत , प्रत्येक प्रकार के तकनीकी, व मेनेजमेंट ज्ञान, एवं जमीनी अनुभव से संपन्न ....१५ वर्ष सफल मुख्यमंत्री एवं ५ वर्ष सफल प्रधान मंत्री रहे हुए व्यक्ति के मुकाबले में -----
-------दो अनुभव हीन व किसी भी विशिष्ट ज्ञान व शिक्षा के बिना दो बच्चों को खडा करना गलती नहीं अपितु आत्मघात ही है -----
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-----वास्तव में तो सम्पूर्ण कांग्रेस पार्टी में एक भी ऐसा व्यक्ति या नेता नहीं है जो राजनीति में प्रथम स्तर का हो -----
---जो हुआ वह तो होना ही था ---