saahityshyamसाहित्य श्याम

यह ब्लॉग खोजें

Powered By Blogger
जल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 27 जून 2009

श्याम लीला --चीर हरण

१।

चीर मांगतीं गोपियाँ ,करें विविध मनुहार ।

क्यों जल में उतरीं सभी ,सारे वस्त्र उतार ?

सारे वस्त्र उतार ,लाज अब कैसी मन में ।

वही आत्मा मुझमें ,तुझमें सकल भुवन में।

कण कण में, मैं ही बसा ,मेरा ही तन नीर ।

मुझसे कैसी लाज ,लें तट पर आकर चीर॥



२.

उचित नहीं व्यवहार यह ,नहीं शास्त्र अनुकूल।

नंगे हो जल में घुसें , मर्यादा प्रतिकूल।

मर्यादा प्रतिकूल, श्याम' ने दिया ज्ञान यह ।

दोनों बांह उठाय , बचन दें सभी आज यह।

करें समर्पण पूर्ण , लगाएं मुझ में ही चित।

कभी न हो यह भूल ,भाव यह समझें समुचित॥



३.

कोई रहा न देख अब , सब है सूना शांत।

चाहे जो मन की करो , चहुँ दिशि है एकांत।

चहुँ दिशि है एकांत,करो सब पाप -पुण्य अब।

पर नर की यह भूल , देखता है ईश्वर सब।

कण -कण बसता ईश , हर जगह देखे सोई।

सोच समझ ,कर कर्म ,न छिपता उससे कोई॥

शनिवार, 30 मई 2009

जल बरसत -एक अमात्रिक घनाक्षरी छन्द--डमरू

पवन बहन लग, सर सर सर सर,
जल बरसत जस झरत सरस रस ।
लहर लहर नद , जलद गरज नभ,
तन मन गद गद ,उर छलकत रस ।
जल थल चर सब जग हलचल कर,
जल थल नभ चर ,मन मनमथ वश।
सजन लसत,धन ,न न न करत पर,
मन मन तरसत ,नयनन मद बस ॥