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बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

खेल के खेल ... डा श्याम गुप्त



सभी राष्ट्रीय,राष्ट्रमंडल ,अन्तर्राष्ट्रीय व व्यवसायिक संस्थानों में खेल आयोजन बंद होने चाहिए.....डा श्याम गुप्त---
----- वस्तुतः खेल हम क्यों खेलते हैं , मूलतः शारीरिक क्षमता वाले ---व्यायाम, स्वास्थ्य के लिए ; व मानसिक खेल मानसिक क्षमता के लिए , न कि प्रतियोगिता के लिए , कमाई के लिए, देश का नाम ऊंचा करने के लिए ( खेल से देश का क्या नाम ऊंचा होता है? अधिकतर तो बदनाम ही होता है; नाम ऊंचा तो प्रगति कारक कृतियों , वैज्ञानिक, सामाजिक उपलब्धियों से होता है |) खेल आदि सिर्फ स्कूल- कालेज स्तर पर होकर वहीं समाप्त होजाने चाहिए |आगे जीवन में खेलों का क्या काम ? सभी व्यवसायिक संस्थानों आदि में खेल कोटा - नौकरी , भव्य खेल आयोजनों को बंद करा देना चाहिए |
---- इतिहास गवाह है जब भी खेल, मनोरंजन आदि को व्यवसायिक-भाव, प्रतियोगिता-भाव, कमाई, धंधा से देखा गया , राष्ट्र व समाज-संस्कृति का विनाश ही हुआ है |हमारे शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि मनोरंजन व्यवसाय नहीं बनना चाहिए |( खेल गाँव में दिन में ६००० कंडोम समाप्त होगये ....क्यों , खेलने आते हैं या कंडोम प्रयोग करने , कौन करता है , क्यों ,किस पर, किस प्रयोजन के लिए , खिलाड़ियों व अधिकारियों के एस्कोर्ट के लिए लड़कियां ही क्यों ...पुरुष क्यों नहीं ????)|
रोम के विनाश में ओलम्पिक आदि खेलों का महत्वपूर्ण योगदान था, अति-खेल प्रियता, प्रतियोगिता -व्यर्थ की अप-संस्कृति, भ्रष्टाचार, भ्रष्ट -आचरण ,राजनीतीकरण , राजनैतिक अपराधीकरण व व्यक्तिगत -सामाजिक कुटिलता को जन्म देती है | 'जब रोम जलरहा था तो नीरो बांसुरी बजारहा था '- -कूट वाक्य का अर्थ यही है कि स्वयम शासक व जनता, अधिकारी सभी मनो-विनोद , आमोद-प्रमोद में , खेल-कूद आदि में मगन थे; शासकीय , सामाजिक , नैतिक कार्यों से विमुख होगये थे | कितने आपराधिक -कार्य , कहानियां , कथाएं व जघन्य क्रिया -कलाप जुड़े हैं रोमन-खेलों से किसी से छिपा नहीं है | और आज भी |
-----हमारे यहाँ गाँवों , कस्बों में सदा से ही ये खेल -कूद आदि होते रहे हैं परन्तु सिर्फ मेलों -सामाजिक उत्सवों आदि में जब सभी इनमें सहज रूप से भाग लेते हैं , कहीं कोई धंधे -पैसे की बात नहीं | अलग से व्यवसाय बनाकर कमाई का जरिया नहीं | सभी वर्ष भर अपने सामान्य दैनिक कार्य में व्यस्त रहते हैं न कि झूठे विज्ञापन आदि की भ्रष्ट कमाई में , जो देश की अर्थ व्यवस्था के समान्तर एक अर्थ व्यवस्था पैदा करती है, और सामाजिक असंतुलन |
 

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

काव्य-दूत ----भाग -२,..आगे....

पीछे मुड़कर

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
और अब तक के जीवन को सहेजता हूँ ,
की क्या खोया,क्या पाया ।
लगता है, सब कुछ पाया ही पाया है ,
जीवन से,संसार से ।
प्यार,ईर्ष्या ,घृणा,द्वेष
मान-सम्मान ,सुख-दुःख,और-
संपत्ति-विपत्ति ।

विभिन्न सुस्वादु भोजन,और-
छत्तीस व्यंजनों की तरह है,
यह जीवन भी ; और-
खोने को था ही क्या अपना ,अपने पास ।

शरीर , विश्व के रज़ -कणों से प्राप्त ,
पंचतत्व की काया ।
मन, विश्व स्थित आचार-व्यवहार व-
कार्य-कलापों से धीरे-धीरे प्राप्त,महत तत्व।
बुद्धि, जीवन के खट्टे-मीठे -
संसकरणों का संग्रह।
प्राण, कालचक्र द्वारा प्रदत्त
एक काल संगणक ।

और आत्मा ,
'न हन्यते हन्यमाने शरीरे'
उसका क्या खोना क्या पाना,
उस अनंत की एक धरोहर।

सब कुछ दूसरों का ही तो है ,
हमारे पास,
दूसरों के लिए।

फ़िर में और तुम का क्या भेद,
पाने-खोने का संघर्ष ,
मेरा और तेरा का द्वंद्व -
रह ही कहाँ जाता है।

सब कुछ उसी का है,
उसी में समा जाता है ;
यह काल सबको निगला जाता है।

न व्यक्ति कुछ खोता है,
न व्यक्ति कुछ पाता है,
माटी का पुतला -
माटी में समा जाता है॥

शनिवार, 23 मई 2009

कवि व कविता

कवि जीवन तो छंद के बंधन सा निर्बंध रहा है ,
तन तो बंधन का भोगी ,पर मन स्वच्छंद रहा है।


कथ्य -तथ्य क्या ,छंद -बंद क्या ,
कविता हो मन भावन ही ।
उमड़ घुमड़ कर रिमझिम बरसे ,
जैसे बर्षा सावन की।

कभी झडीलग जाए ,जैसे -
झर-झर, छंद तुकांत झरें ।
कभी बूँद-बौछार छटा सी ,
रिम-झिम मुक्त छंद बिहरें।

गीत -अगीत, कवित्त सरस रस ,
दोहा चौपाई बरवै ।
कुण्डलिया हो मधुर सवैया ,
हर सिंगार से पुष्प झरें ।

कविता तो जीवन का रस है ,छंद-छंद आनंद बहा है ।
कवि जीवन तो "----"----------"-------------

माँ वाणी की कृपा दृष्टि ,
मानव मन को मिल जाती है।
नवल भाव सुर लय छंदों की ,
भाव धरा बन जाती है ।

छंद -बंद ,नव कथ्य ,भाव स्वर ,
कवि के मानस में निखरें ।
विविध छंद लेते अंगडाई ,
नवल सृजन के पुष्प झरें ।

छंद पुराने या नवीन हों ,
छंद-छंद मुस्कानें हैं ।
छंद ही कविता का जीवन है ,
नित नव पुरा सुहाने हैं

छंद को बाँध सका कब कोई ,छंद -छंद निर्द्वंद्व रहा है ।
तन तो बंधन का भोगी ,पर मन स्वच्छंद रहा है।
कवि जीवन तो छंद के बंधन सा निर्बंध रहा है॥