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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

काव्य-दूत ----भाग -२,..आगे....

पीछे मुड़कर

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
और अब तक के जीवन को सहेजता हूँ ,
की क्या खोया,क्या पाया ।
लगता है, सब कुछ पाया ही पाया है ,
जीवन से,संसार से ।
प्यार,ईर्ष्या ,घृणा,द्वेष
मान-सम्मान ,सुख-दुःख,और-
संपत्ति-विपत्ति ।

विभिन्न सुस्वादु भोजन,और-
छत्तीस व्यंजनों की तरह है,
यह जीवन भी ; और-
खोने को था ही क्या अपना ,अपने पास ।

शरीर , विश्व के रज़ -कणों से प्राप्त ,
पंचतत्व की काया ।
मन, विश्व स्थित आचार-व्यवहार व-
कार्य-कलापों से धीरे-धीरे प्राप्त,महत तत्व।
बुद्धि, जीवन के खट्टे-मीठे -
संसकरणों का संग्रह।
प्राण, कालचक्र द्वारा प्रदत्त
एक काल संगणक ।

और आत्मा ,
'न हन्यते हन्यमाने शरीरे'
उसका क्या खोना क्या पाना,
उस अनंत की एक धरोहर।

सब कुछ दूसरों का ही तो है ,
हमारे पास,
दूसरों के लिए।

फ़िर में और तुम का क्या भेद,
पाने-खोने का संघर्ष ,
मेरा और तेरा का द्वंद्व -
रह ही कहाँ जाता है।

सब कुछ उसी का है,
उसी में समा जाता है ;
यह काल सबको निगला जाता है।

न व्यक्ति कुछ खोता है,
न व्यक्ति कुछ पाता है,
माटी का पुतला -
माटी में समा जाता है॥

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