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शनिवार, 23 मई 2009

कवि व कविता

कवि जीवन तो छंद के बंधन सा निर्बंध रहा है ,
तन तो बंधन का भोगी ,पर मन स्वच्छंद रहा है।


कथ्य -तथ्य क्या ,छंद -बंद क्या ,
कविता हो मन भावन ही ।
उमड़ घुमड़ कर रिमझिम बरसे ,
जैसे बर्षा सावन की।

कभी झडीलग जाए ,जैसे -
झर-झर, छंद तुकांत झरें ।
कभी बूँद-बौछार छटा सी ,
रिम-झिम मुक्त छंद बिहरें।

गीत -अगीत, कवित्त सरस रस ,
दोहा चौपाई बरवै ।
कुण्डलिया हो मधुर सवैया ,
हर सिंगार से पुष्प झरें ।

कविता तो जीवन का रस है ,छंद-छंद आनंद बहा है ।
कवि जीवन तो "----"----------"-------------

माँ वाणी की कृपा दृष्टि ,
मानव मन को मिल जाती है।
नवल भाव सुर लय छंदों की ,
भाव धरा बन जाती है ।

छंद -बंद ,नव कथ्य ,भाव स्वर ,
कवि के मानस में निखरें ।
विविध छंद लेते अंगडाई ,
नवल सृजन के पुष्प झरें ।

छंद पुराने या नवीन हों ,
छंद-छंद मुस्कानें हैं ।
छंद ही कविता का जीवन है ,
नित नव पुरा सुहाने हैं

छंद को बाँध सका कब कोई ,छंद -छंद निर्द्वंद्व रहा है ।
तन तो बंधन का भोगी ,पर मन स्वच्छंद रहा है।
कवि जीवन तो छंद के बंधन सा निर्बंध रहा है॥


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