साहित्य के नाम पर जाने क्या क्या लिखा जा रहा है रचनाकार चट्पटे, बिक्री योग्य, बाज़ारवाद के प्रभाव में कुछ भी लिख रहे हैं बिना यह देखे कि उसका समाज साहित्य कला , कविता पर क्या प्रभाव होगा। मूलतः कवि गण-विश्व सत्य, दिन मान बन चुके तथ्यों ( मील के पत्थर) को ध्यान में रखेबिना अपना भोगा हुआ लिखने में लगे हैं जो पूर्ण व सर्वकालिक सत्य नहीं होता। अतः साहित्य , पुरा संस्कृति व नवीनता के समन्वित भावों के प्राकट्य हेतु मैंने इस क्षेत्र में कदम रखा। कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित......
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बुधवार, 19 अगस्त 2020
मंगलवार, 29 मार्च 2016
शनिवार, 25 अगस्त 2012
प्रेम-काव्यमोक्षदा एकादश --प्रेम काव्य -एकादश सुमनान्जलि- अमृतत्व--रचना-५ ( अंतिम) ..डा श्याम गुप्त..
कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित
प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है-- इस काव्य-कृति की अंतिम व एकादश सुमनान्जलि- अमृतत्व --जो मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य व सोपान है वह प्रेम, भक्ति, कर्म , योग, ज्ञान चाहे जिस मार्ग से आगे बढे .. ----इस सुमनांजलि में...जीवन-सुख, शाश्वत-सुख, ज्ञानामृत, परमार्थ एवं मोक्षदा एकादश ....अदि पांच रचनाएँ प्रस्तुत की जायेंगी | प्रस्तुत है ..पंचम व इस कृति की अंतिम रचना .....
समझें भेदा-भेद जब, पायें सच्चा ज्ञान ,
मन विषयों से निरत हो, श्याम वही है ध्यान |
चिंतन में लय जो सदा, मन में दृढ़ संकल्प,
यही अवस्था 'धारणा'', यही धर्म संकल्प |
शास्त्रों के अनुकूल जो, करते तर्क विचार ,
सभी प्राप्तियां तुच्छ हों, श्याम'समाधि 'विचार |
फल की जो इच्छा नहीं, धर्माधर्म अलिप्त,
राग द्वेष दुःख से परे, सोई जीवन्मुक्त |
ज्ञाता ज्ञान व ज्ञेय का, भेद रहे नहिं रूप,
वह तो स्वयं प्रकाश है, परमानंद स्वरुप |
नित्यानित्य विचार से, भवसुख सदा अनित्य,
ममता बंधन मुक्त हों, श्याम मोक्ष का सत्य |
ज्ञान और संसार को, जो दोनों को ध्याय ,
माया बंधन पार कर, अमर तत्व सो पाय |
इस संसार असार में, श्याम' प्रेम ही सार ,
प्रेम करे दोनों मिलें, ज्ञान और संसार |
प्रेम बसे भगवान हैं, महिमा प्रेम अपार ,
वो ही परमानंद है, प्रेम मोक्ष का सार |
प्रेम लीन होपाय जो, परम शान्ति सो पाय,
सारे बंधन मुक्त हो, अमरतत्व पाजाय |
प्रेम सभी से कीजिये, सकल शास्त्र का सार ,
ब्रह्मानंद मिले उसे, श्याम' मोक्ष साकार ||
इति ---- प्रेम काव्य - महा काव्य ...

मोक्षदा एकादश ...
समझें भेदा-भेद जब, पायें सच्चा ज्ञान ,
मन विषयों से निरत हो, श्याम वही है ध्यान |
चिंतन में लय जो सदा, मन में दृढ़ संकल्प,
यही अवस्था 'धारणा'', यही धर्म संकल्प |
शास्त्रों के अनुकूल जो, करते तर्क विचार ,
सभी प्राप्तियां तुच्छ हों, श्याम'समाधि 'विचार |
फल की जो इच्छा नहीं, धर्माधर्म अलिप्त,
राग द्वेष दुःख से परे, सोई जीवन्मुक्त |
ज्ञाता ज्ञान व ज्ञेय का, भेद रहे नहिं रूप,
वह तो स्वयं प्रकाश है, परमानंद स्वरुप |
नित्यानित्य विचार से, भवसुख सदा अनित्य,
ममता बंधन मुक्त हों, श्याम मोक्ष का सत्य |
ज्ञान और संसार को, जो दोनों को ध्याय ,
माया बंधन पार कर, अमर तत्व सो पाय |
इस संसार असार में, श्याम' प्रेम ही सार ,
प्रेम करे दोनों मिलें, ज्ञान और संसार |
प्रेम बसे भगवान हैं, महिमा प्रेम अपार ,
वो ही परमानंद है, प्रेम मोक्ष का सार |
प्रेम लीन होपाय जो, परम शान्ति सो पाय,
सारे बंधन मुक्त हो, अमरतत्व पाजाय |
प्रेम सभी से कीजिये, सकल शास्त्र का सार ,
ब्रह्मानंद मिले उसे, श्याम' मोक्ष साकार ||
इति ---- प्रेम काव्य - महा काव्य ...
शुक्रवार, 29 जून 2012
ब्रह्म प्राप्ति ..प्रेम काव्य--दशम सुमनान्जलि- अध्यात्म.....रचना-4.. .. डा श्याम गुप्त ....
कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित
प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है | प्रस्तुत है-- दशम सुमनान्जलि- अध्यात्म ----इस सुमनांजलि में पांच रचनाएँ....तुच्छ बूँद सा जीवन, प्रभु ने जो यह जगत बनाया, अहं-ब्रह्मास्मि ,
ब्रह्म-प्राप्ति तथा परमानंद ...प्रस्तुत की जायंगी | प्रस्तुत है ...चतुर्थ रचना...ब्रह्म-प्राप्ति....
न तस्य प्रतिमा अस्ति ....
ब्रह्म प्राप्ति
चित में जो कुछ प्रीति-युक्त है,
उसे देखकर पहचानें |
शांत शुद्ध चित तेज-युक्त है,
लक्षण उसे सत्व जानें ||
चित्त दुखी अथवा अशांत है,
सदा विषय में खिंचता है|
उस मन में चित अंतर्मन में ,
रज का लक्षण बहता है ||
जो अतर्क्य अज्ञेय मोह से-
युक्त, विषय में रहता है |
वह अंतर, तम से आवृत है,
तम का संभ्रम रहता है |
कर्म करे , लज्जा प्रतीत हो,
तामस लक्षण कहता है |
कर्म करे पर फल की इच्छा,
से राजस गुण बहता है |
आत्म-तुष्टि से कर्म करे नर,
पूर्णकाम उसको कहते |
वही सत्व-गुण का लक्षण है,
श्रेष्ठ जनों में रहता है |
अहंकार के भाव बिना, जो,
शरणागत हो कर्म करे |
वह निर्गुण-कर्ता कहलाता,
प्रभु चरणों में बसता है |
कर्म करे जैसे भावों से ,
वैसा ही फल मिलता है |
सत्य भाव से कार्य करे नर,
उसकी यही सफलता है |
ज्ञानी और तत्वज्ञ भले ही ,
राजा हों या रंक-भिखारी |
कर्म करे पावन होकर, तब-
प्राप्त ब्रह्म को होता है ||
---चित्र -गूगल साभार ....
![]() | ||||
| तस्य लिंग प्रणव |
ब्रह्म प्राप्ति
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| जीव-तत्व |
चित में जो कुछ प्रीति-युक्त है,
उसे देखकर पहचानें |
शांत शुद्ध चित तेज-युक्त है,
लक्षण उसे सत्व जानें ||
चित्त दुखी अथवा अशांत है,
सदा विषय में खिंचता है|
उस मन में चित अंतर्मन में ,
रज का लक्षण बहता है ||
जो अतर्क्य अज्ञेय मोह से-
![]() |
| ज्ञान |
वह अंतर, तम से आवृत है,
तम का संभ्रम रहता है |
कर्म करे , लज्जा प्रतीत हो,
तामस लक्षण कहता है |
![]() |
| विश्व |
से राजस गुण बहता है |
आत्म-तुष्टि से कर्म करे नर,
पूर्णकाम उसको कहते |
वही सत्व-गुण का लक्षण है,
श्रेष्ठ जनों में रहता है |
अहंकार के भाव बिना, जो,
शरणागत हो कर्म करे |
वह निर्गुण-कर्ता कहलाता,
प्रभु चरणों में बसता है |
कर्म करे जैसे भावों से ,
वैसा ही फल मिलता है |
सत्य भाव से कार्य करे नर,
उसकी यही सफलता है |
ज्ञानी और तत्वज्ञ भले ही ,
राजा हों या रंक-भिखारी |
कर्म करे पावन होकर, तब-
प्राप्त ब्रह्म को होता है ||
---चित्र -गूगल साभार ....
शनिवार, 15 अगस्त 2009
काव्य-दूत --आगे .....
मुक्ति
मुझे नहीं चाहिए चिर-मुक्ति ,
मैं चाहता हूँ ,जन्म लेना ;
बार-बार,
अनेक बार।
मृत्यु एक पड़ाव है ,
जीवन की यात्रा का;
जहाँ जीव-
शरीर रूपी वस्त्र बदलता है ।
दास कबीर भले ही,
चदरिया जातां से ओड़कर ,
ज्यों की त्यों धर देते होंगे ;
पर ,चादर मैली कराने का,
बार-बार बदलने का,
आनंद कुछ और ही होता है।
यह धरती कर्मक्षेत्र है,
जहाँ प्रेयसी के कटाक्षों ,भ्रू-भंगों के बीच,
गृहस्थ जीवन के,आटे-दाल के
भावों की गाडी चलती है।
यहाँ सुख है,दुःख है,
संयोग है,वियोग भी,
प्रियतमा के रसीले ओठ हैं,
मदभरी चितवन है,
एवं स्पर्श की रोमांचक अनुभूति भी;
और है ,कर्म करसकने की,
अनोखी तृप्ति भी।
यहाँ हर वस्तु-
एक नया अध्याय खोलती है;
हर दिशा,
जीवन के नए आयाम तोलती है;
और यहाँ पर है, प्रेम-
प्रेम, जिसके ढाई आखर पढ़कर -
लोग कबीर हो जाते हैं।
ऐसी पृथ्वी पर,
ऐसी शान्ति दायिनी
आनंद दायिनी यात्रा पर
पुनः न आने का नाम है -
मुक्ति, तो-
कौन चाहेगा ऐसी मुक्ति ?
मुझे नहीं चाहिए
चिर-मुक्ति,
मैं चाहता हूँ,जन्म लेना-
बार-बार,
हज़ार बार॥
काव्य-दूत ---समाप्त
मुझे नहीं चाहिए चिर-मुक्ति ,
मैं चाहता हूँ ,जन्म लेना ;
बार-बार,
अनेक बार।
मृत्यु एक पड़ाव है ,
जीवन की यात्रा का;
जहाँ जीव-
शरीर रूपी वस्त्र बदलता है ।
दास कबीर भले ही,
चदरिया जातां से ओड़कर ,
ज्यों की त्यों धर देते होंगे ;
पर ,चादर मैली कराने का,
बार-बार बदलने का,
आनंद कुछ और ही होता है।
यह धरती कर्मक्षेत्र है,
जहाँ प्रेयसी के कटाक्षों ,भ्रू-भंगों के बीच,
गृहस्थ जीवन के,आटे-दाल के
भावों की गाडी चलती है।
यहाँ सुख है,दुःख है,
संयोग है,वियोग भी,
प्रियतमा के रसीले ओठ हैं,
मदभरी चितवन है,
एवं स्पर्श की रोमांचक अनुभूति भी;
और है ,कर्म करसकने की,
अनोखी तृप्ति भी।
यहाँ हर वस्तु-
एक नया अध्याय खोलती है;
हर दिशा,
जीवन के नए आयाम तोलती है;
और यहाँ पर है, प्रेम-
प्रेम, जिसके ढाई आखर पढ़कर -
लोग कबीर हो जाते हैं।
ऐसी पृथ्वी पर,
ऐसी शान्ति दायिनी
आनंद दायिनी यात्रा पर
पुनः न आने का नाम है -
मुक्ति, तो-
कौन चाहेगा ऐसी मुक्ति ?
मुझे नहीं चाहिए
चिर-मुक्ति,
मैं चाहता हूँ,जन्म लेना-
बार-बार,
हज़ार बार॥
काव्य-दूत ---समाप्त
सोमवार, 25 मई 2009
बीज कविता का
बीज कविता का सदा मन में बसा होता है
कोई सींचे बनके अंकुर ये हरा होता है।
चाहे हो प्यार या इनकार हो प्रीति खुदा की,
खिलती है पुष्प बनी कालिका कोई कविता की।
उठाती है भीनी महक उमडे हुए भावों की ,
फैलती है तभी खुशबू चमन में ग़ज़लों की।
गीत निर्झर सा तभी दिल में सजा होता है ।
देश की और उठी हों जो निगाहें कोई,
देश द्रोही बना आतंक मचाये कोई।
त्रस्त होजायें सभी जन जो अनाचारों से,
ग्रस्त संस्कृति भी जो होती हो अप-विचारों से।
मन में आक्रोश का जब भाव भरा होता है।
प्रभु की मिलजाए सहज भक्ति कृपा हो जाए,
प्रीति ईश्वर की बने नीति मन में रम जाए।
लीन तन मन, पर -हित में ,प्रभु समर्पण में ,
माँ की होती है कृपा ,मूक मुखर होजाए।
भाव मन में तभी कविता का उदय होता है ॥
कोई सींचे बनके अंकुर ये हरा होता है।
चाहे हो प्यार या इनकार हो प्रीति खुदा की,
खिलती है पुष्प बनी कालिका कोई कविता की।
उठाती है भीनी महक उमडे हुए भावों की ,
फैलती है तभी खुशबू चमन में ग़ज़लों की।
गीत निर्झर सा तभी दिल में सजा होता है ।
देश की और उठी हों जो निगाहें कोई,
देश द्रोही बना आतंक मचाये कोई।
त्रस्त होजायें सभी जन जो अनाचारों से,
ग्रस्त संस्कृति भी जो होती हो अप-विचारों से।
मन में आक्रोश का जब भाव भरा होता है।
प्रभु की मिलजाए सहज भक्ति कृपा हो जाए,
प्रीति ईश्वर की बने नीति मन में रम जाए।
लीन तन मन, पर -हित में ,प्रभु समर्पण में ,
माँ की होती है कृपा ,मूक मुखर होजाए।
भाव मन में तभी कविता का उदय होता है ॥
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