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शनिवार, 15 अगस्त 2009

काव्य-दूत --आगे .....

मुक्ति

मुझे नहीं चाहिए चिर-मुक्ति ,
मैं चाहता हूँ ,जन्म लेना ;
बार-बार,
अनेक बार।

मृत्यु एक पड़ाव है ,
जीवन की यात्रा का;
जहाँ जीव-
शरीर रूपी वस्त्र बदलता है ।

दास कबीर भले ही,
चदरिया जातां से ओड़कर ,
ज्यों की त्यों धर देते होंगे ;
पर ,चादर मैली कराने का,
बार-बार बदलने का,
आनंद कुछ और ही होता है।

यह धरती कर्मक्षेत्र है,
जहाँ प्रेयसी के कटाक्षों ,भ्रू-भंगों के बीच,
गृहस्थ जीवन के,आटे-दाल के
भावों की गाडी चलती है।

यहाँ सुख है,दुःख है,
संयोग है,वियोग भी,
प्रियतमा के रसीले ओठ हैं,
मदभरी चितवन है,
एवं स्पर्श की रोमांचक अनुभूति भी;
और है ,कर्म करसकने की,
अनोखी तृप्ति भी।

यहाँ हर वस्तु-
एक नया अध्याय खोलती है;
हर दिशा,
जीवन के नए आयाम तोलती है;
और यहाँ पर है, प्रेम-
प्रेम, जिसके ढाई आखर पढ़कर -
लोग कबीर हो जाते हैं।

ऐसी पृथ्वी पर,
ऐसी शान्ति दायिनी
आनंद दायिनी यात्रा पर
पुनः न आने का नाम है -
मुक्ति, तो-
कौन चाहेगा ऐसी मुक्ति ?

मुझे नहीं चाहिए
चिर-मुक्ति,
मैं चाहता हूँ,जन्म लेना-
बार-बार,
हज़ार बार॥


काव्य-दूत ---समाप्त

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