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गुरुवार, 19 जुलाई 2012

ज्ञानामृत..प्रेम-काव्य--एकादश सुमनान्जलि- अमृतत्व--रचना-३..डा श्याम गुप्त..

                                           कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


                                             
                प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है  | प्रस्तुत है-- इस काव्य-कृति की अंतिम व एकादश  सुमनान्जलि- अमृतत्व --जो मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य व सोपान है  वह प्रेम, भक्ति, कर्म , योग, ज्ञान   चाहे जिस 
 मार्ग से आगे बढे .. ----इस सुमनांजलि में...जीवन-सुख, शाश्वत-सुख, ज्ञानामृत, परमार्थ एवं मोक्षदा एकादश ....अदि पांच रचनाएँ प्रस्तुत की जायेंगी | प्रस्तुत है ..तृतीय  रचना....ज्ञानामृत....                   

        ज्ञानामृत 

जो ग्रंथों का वाचन करते ,
वे  अज्ञानी  से   मानी  हैं |
और ग्रन्थ पाठक से मानी,
नित्य अध्ययन करने वाला |


अध्यायी  से अधिक श्रेष्ठ है,
जो है ज्ञान-तत्वका ज्ञाता |
और ज्ञान को कृति में लाकर,
श्रेष्ठ  कर्म को करने वाला |




आत्म-ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है,
सब विद्याधन देने वाला|
जो निज को पहचान गया है,
वह पाए अमृत मतवाला |


जो सब में निज को ही जाने,
सबमें अपने को पहचाने |
आत्मलीन वह निर्विकार है,
उसको मिले मुक्ति का प्याला |


भेदाभेद फलाफल से जो.
मुक्त उसे अमृत मिलता है |
कैसे प्राप्त उसे कर सकता,
असत कर्म का करने वाला ||



रविवार, 10 जून 2012

प्रभु ने जो यह जगत बनाया ...प्रेम काव्य ..सुमनांजलि दशम...रचना..दो.....

                              कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित
 प्रेम  -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता, किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जा सकता; वह एक विहंगम भाव है  | प्रस्तुत है-- दशम  सुमनान्जलि- अध्यात्म  ----इस सुमनांजलि में पांच  रचनाएँ....तुच्छ बूँद सा जीवन,  प्रभु ने जो यह जगत बनाया, अहं-ब्रह्मास्मि ,  ब्रह्म-प्राप्ति  तथा  परमानंद ...प्रस्तुत की जायंगी | प्रस्तुत है ....द्वितीय रचना... 


प्रभु ने जो यह जगत बनाया

प्रभु  ने जो यह जगत बनाया ,
सो  प्रभु पूजन योग बनाया |
इसकी  पूजा,  प्रभु की पूजा ,
जग  में प्रभु, प्रभु जगत समाया |  ---प्रभु ने जो ....||

प्रभु  को  बंदे  कहाँ  खोजता,
जन -जन के मन बीच समाया |
 जिसने प्रभु के जग को जाना,
सो  प्रभु के मन मांहि  समाना |
सब  जग प्रभु की छाया-माया ,
सो  प्रभु पूजन जोग बनाया |  -----प्रभु ने जो यह....||

कर्म  करे नर, फल की इच्छा -
छोड़े  प्रभु पर, मान ले शिक्षा |
गीता, श्रुति, पुराण सब गाया ,
कर्म  हेतु यह नर तन पाया |
कर्म  हेतु प्रभु जगत बनाया ,
सो प्रभु पूजन जोग बनाया |    ---- प्रभु ने जो यह.....|

                                                     

शनिवार, 15 अगस्त 2009

काव्य-दूत --आगे .....

मुक्ति

मुझे नहीं चाहिए चिर-मुक्ति ,
मैं चाहता हूँ ,जन्म लेना ;
बार-बार,
अनेक बार।

मृत्यु एक पड़ाव है ,
जीवन की यात्रा का;
जहाँ जीव-
शरीर रूपी वस्त्र बदलता है ।

दास कबीर भले ही,
चदरिया जातां से ओड़कर ,
ज्यों की त्यों धर देते होंगे ;
पर ,चादर मैली कराने का,
बार-बार बदलने का,
आनंद कुछ और ही होता है।

यह धरती कर्मक्षेत्र है,
जहाँ प्रेयसी के कटाक्षों ,भ्रू-भंगों के बीच,
गृहस्थ जीवन के,आटे-दाल के
भावों की गाडी चलती है।

यहाँ सुख है,दुःख है,
संयोग है,वियोग भी,
प्रियतमा के रसीले ओठ हैं,
मदभरी चितवन है,
एवं स्पर्श की रोमांचक अनुभूति भी;
और है ,कर्म करसकने की,
अनोखी तृप्ति भी।

यहाँ हर वस्तु-
एक नया अध्याय खोलती है;
हर दिशा,
जीवन के नए आयाम तोलती है;
और यहाँ पर है, प्रेम-
प्रेम, जिसके ढाई आखर पढ़कर -
लोग कबीर हो जाते हैं।

ऐसी पृथ्वी पर,
ऐसी शान्ति दायिनी
आनंद दायिनी यात्रा पर
पुनः न आने का नाम है -
मुक्ति, तो-
कौन चाहेगा ऐसी मुक्ति ?

मुझे नहीं चाहिए
चिर-मुक्ति,
मैं चाहता हूँ,जन्म लेना-
बार-बार,
हज़ार बार॥


काव्य-दूत ---समाप्त

बुधवार, 27 मई 2009

आस्था व रोटी ---अतुकांत कविता

आस्थाएं ,
धर्म की,ज्ञान की या कर्म की;
मानव ही बनाता है।
सम्यगज्ञान,सम्यग दृष्टिकोण ,सम्यग भाव ,
एवं सम्यग व्यवहार से सजाता है।
ताकि ,जीवन चलता रहे ,
प्रगति के पथ पर ,
सहज,सरल,सानंद।
समाज की धारा बहती रहे ,
सतत ,अविरल,गतिरोध रहित ,
बहती नदिया के मानिंद ।
जन जन को उपलब्ध रहे ,एक समान ,
रोटी,कपडा और मकान।

आस्थाएं ही बन जातीं हैं ,
नियम ,कायदे ,क़ानून व उनका सम्मान ,
आस्था बन जाती है,
पूजा और भगवान्।
ताकि मानव हो एक समान ,
इंसान बन कर रहे -इंसान।

आस्था जुडी है ,रोटी से ।
आस्था से यदि utpatti होती है ,
भ्रम की,मिथ्याभिमान की ;
आस्था से यदि उत्पत्ति होती है ,
असमानता की ,सामाजिक विद्रूपता की ,
अशांति की ;
आस्था यदि भंग करती है ,सामाजिक तादाम्य को ,
आस्थाएं यदि असम्प्रक्त हैं ,
जन जन की दैनिक समस्याओं से ,
भावनाओं से,आवश्यकताओं से ;
तो वह रोटी -विहीन आस्था ,
आस्था नहीं है।

रोटी जुडी है ,आस्था से ।
सदियों पहले , जब मानव ने ,
दो पैरों पर चलना सीखा ;
रोटी को दूसरों से बांटकर खाना सीखा ;
भाई भूखा न रहे ,
इस भावना में जीना सीखा ;
आस्था मुखरित हुई ,
रोटी आस्था में समाहित हुई ।
संगठन की आस्था व्यवहारोन्मुखी हुई ,और -
प्रगतोन्मुखी हुआ समाज ।
आस्था प्रगति की कुंजी है ,
सबको समान ,ससम्मान रोटी की ,
गारंटी है ,पूंजी है।।

सिर्फ़ स्वयं के लिए कमाना,खाना ,
व्यक्ति का रोटी के लिए बिक जाना ,
आस्था विहीन रोटी है , जो-
मिथ्या ज्ञान,मिथ्या दृष्टिकोण ,मिथ्या भावःव-
मिथ्या व्यवहार को उत्पन्न करती है ;
असामाजिकता उत्पन्न करती है ,
आस्था हीन रोटी
पतनोन्मुखी है ॥

मंगलवार, 12 मई 2009

गजानन -वन्दना

कर्म प्रधान जगत में जग में ,
प्रथम पूज्य ,हे सिद्धि विनायक !
कृपा करो हे बुद्धि विधाता ,
रिद्धि -सिद्धि दाता गण-नायक ।

श्याम ह्रदय को पुष्पित कर दो ,
प्रेम शक्ति से यह मन भरदो ।
आदि लेख लेखक ,हे गणपति !
लेखन प्रेम पयोनिधि करदो ।

पंथ प्रेम का महा कठिन प्रभु ,
सिद्धि सदन तुम सिद्धि प्रदाता ।
द्वार पडा हे गौरी- नंदन !
भक्ति कृपा वर दो ,हे दाता !