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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

करवा चौथ -- अर्थशास्त्र और बाज़ार----डा श्याम गुप्त...

करवा चौथ --हमारे पर्व , अर्थशास्त्र और बाज़ार---

उत्सव प्रियः मानवाः --वास्तव में तो सभी भारतीय पर्व, उत्सव , आदि प्राचीन भारतीय समाज के -मनोरंजन केसाथ अर्थशास्त्र - के सैद्दांतिक -व्यवहारिक कृतित्व हैं जो बाज़ार व अर्थशास्त्र की आवश्यकताओं के अनुसार विस्तार भी पाते रहते हैं। । अब करवाचौथ को लीजिये । वास्तव में तो कर्म कांडी व्रतों का वैदिक साहित्य में वर्णन नहीं है , ब्रतों का अर्थ संकल्प होता है और करवा चौथ पर पति-पत्नी दोनों को ही संकल्प लेना होता है कि हम सदा तादाम्य सेरहेंगे, एक दूसरे के प्रति सम्पूर्ण भाव से समर्पित रहेंगे , पाणि ग्रहण के समय लिए हुए बचनों का पालन करेंगे।
------कालान्तर में अर्थशास्त्र बाज़ार की आवश्यकतानुसार( समय परवर्तन ,युग के अनुसार निष्ठा ज्ञान ,कर्तव्य मानवीय विश्वास की कमी से भी ) उसमें करवा, चन्द्रमा, पति की आयु वृद्धि, अर्ध्य , उपवास आदि के भाव जोड़ दिए गए। सामाजिक -पारिवारिक सौहार्द के पहलू हित -सरगी , सास के लिए बायना, बधू से मायके से बधू के घर उपहार आदि भेजना प्रारम्भ किया गया ; जो बाद में कठोर कुप्रथाओं में परिवर्तित होता गया । पहले मिट्टी का करवा अनिवार्य होता था ताकि कुम्भ्कारों का भी काम चलता रहे , और प्रगति होने पर शक्कर - चीनी के, धातु के , चांदी के करवे व अन्य ताम-झाम भी चलने लगे ताकि बाज़ार का अर्थशास्त्र चलता रहे ,हाँ, पीछे दिखावा, अधिक प्राप्ति आदि की मानसिकता भी बढ़ती गयी।
आजकलके वैज्ञानिक युग में भी - समाचार पत्रों, टीवी, आदि में करवा चौथ पर सोना -चांदी के व अन्य सभी के विज्ञापनों , छूट, कैसे करें , क्या पहने, कैसे पूजा करें , किसको किस किस बस्तु से पूजा रानी चाहिए , अपने उन को खुश रखिये आदि की भरमार रहती है क्यों -जबकि वैज्ञानिक युग के नव-युवा,पढेलिखे पुरुष/ महिलाएं इसे आवश्यक/अपरिहार्य नहीं मानते समझते अपितु व्यर्थ की खानापूरी भी मानते हैं |---यह अर्थशास्त्र बाज़ार के ही लिए तो -चाहे स्त्रियों पर कठोरता होती हो या सामाजिक -मानसिक प्रतारणा मानवीय शोषण |
-----हाँ इसके साथ साथ चाहे बाज़ार -भाव के कारण ही सही --पुरुषों के लिए भी विज्ञापन आरहे हैं ----
पत्नी करवा चौथ व्रत रख रही है आपकी लम्बी आयु के लिए अब आपकी बारी है --उपहार देने की ---और यह एक अच्छी बात है।

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

डा श्याम गुप्त की गज़ल.....

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल....

होशियार रहना....

इस शहर् में आगये होशियार रहना।
यह शहर है यार कुछ होशियार रहना।

इस शहर में घूमते हैं हर तरफ ही,
मौत के साए ज़रा होशियार रहना।

घूमते हैं खट-खटाते अर्गलायें,
खोलना मत द्वार बस होशियार रहना ।

एक दर्ज़न श्वान थे और चार चौकीदार,
होगया है क़त्ल यूं होशियार रहना।

अब न बागों में चहल कदमी को जाना,
होरहा व्यभिचार सब होशियार रहना।

सज-संवर के अब न जाना साथ उनके,
खींच लेते हार , तुम होशियार रहना।

चोर की करने शिकायत आप थाने जारहे,
पीचुके सब चाय अब होशियार रहना।

क्षत-विक्षत जो लाश चौराहे पर मिली,
काम आदमखोर सा ,होशियार रहना।

वह नहीं था बाघ आदमखोर यारो,
आदमी था 'श्याम ,सब होशियार रहना॥

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

कुछ कतए ---डा श्याम गुप्त

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित-----


             कुछ कतऐ
पहले खुद को तो, खुदी में निहारो यारो।
सूरते दिल को, आईने में उतारो यारो।
फिर ये कहना मेरे अशआर नहीं हैं काबिल -
अपनी ग़ज़लों के तो पुर अक्स संवारो यारो।

मैं जो कहता हूँ सरे आम कहा करता हूँ।
मैं तो हर आम को भी ख़ास कहा करता हूँ।
हिन्दी औ हिंद पै न आये आंच कोई--
खुद से ये वादा सरे शाम किया करता हूँ।

इंकलाबी हूँ ,इन्कलाब है कलाम मेरा।
ये कलम कहती है सबको ही सलाम मेरा।
मेरे नगमे रहें देश पै भाषा पै कुर्बां --
खुद से ये वादा करता है कलाम मेरा।

हिन्दी साहित्य हो नित नित उन्नत यारो।
दिली इच्छा है यही मेरी तो सदा यारो।
नित नए प्रयोग इसीलिये किया करता हूँ--
समाज के सरोकारों से पर नहीं हटता यारो॥ 

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

डा श्याम गुप्त की कविता.....गांव की गोरी

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


 


डा श्याम गुप्त की कविता....गांव की गोरी.... .

गाँव की गोरी,
लम्बी लम्बी छोरी ।
इमली के तले
काली न गोरी।

'पतिया की जात' में
झूमते गुब्बारे।
मिट्टी की गाड़ी
गड़ गड़ गड़ पुकारे।

इमली के कतारे
और आँख मिचोली।
सरसों के खेत की
वो अठखेली ।

नील कंठ की दांई
और श्यामा की बाँई -
लेने को दौड़ना
खंदक हो या खाई।

गूंजती अमराइयां
नहर के किनारे।
सावन के गीत और
वर्षा की फुहारें ।

झमाझम बरसात में
जी भर नहाती।
खेतों की मेड़ों पर
झूम झूम गाती ।

सावन में जब कभी
कोकिल कहीं बोली।
बहुत याद आती हो
प्यारी हमजोली

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

श्यामांगिनि ! तेरा मुखर लास--डा श्याम गुप्त का गीत----

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित---


श्यामांगिनि ! तेरा मुखर लास--डा श्याम गुप्त का गीत----

कामिनि! तेरा वह मृदुल हास |
श्यामांगिनि ! तेरा मुखर लास |

जाने कितने उपमा रूपक ,
सज जाते बनकर सृष्टि-साज |
हृद तंत्री में अगणित असंख्य ,
बस जाते मधुमय मदिर राग |
मन के उपवन में छाजाता,
सुरभित अनुपम मधुरिम पराग |

वह मुकुलित कुसुमित सा सुहास ,
कामिनी तेरा वह मृदुल हास ||

वह शुभ्र चपल स्मिति तरंग ,
नयनों में घोले विविध रंग |
तन मन को रंग जाते बनकर,
अगणित बसंत रस रंग फाग |
आँखों में सजते इन्द्र-धनुष ,
बनकर चाहत के प्रिय-प्रवास |

रूपसि ! वह मुखरित विमल लास |
कामिनि ! तेरा वह मृदुल हास ||

मद्दम -मद्दम वह मधुरिम स्वर ,
वह मौन मुखरता की प्रतिध्वनि |
आता ऋतुराज स्वयं लेकर ,
कलियों का आमंत्रण सहास |
अणु अणु में छाजाती असीम,
नव तन्मयता उल्लास-लास |

श्यामांगिनि ! तेरा मृदुल हास |
कामिनि ! तेरा वह मुखर लास ||

----महिलाएं-वर्चस्व की सन्स्क्रति व महिलाएं-

’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '......

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति के सेमीनार -'वर्चस्व की संस्कृति और महिलायें ' में मैत्रेयी पुष्पा , मधु गर्ग आदि स्वघोषित तथाकथित महान महिलाओं द्वारा कुछ अविचारशील बातें कही गयी |
.’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '. हर साल नवीनीकरण कराना पड़ता है |---
-----क्या मैत्रेयी समझती हैं कि करवा चौथ व्रत वफादारी के लिए रखा जाता है ? वह तो सिर्फ पति की लम्बी आयु के लिए होता है, ताकि पत्नी सदा सुहागिन रहे और पति की पहले मृत्यु होजाने पर वे तमाम सुखों से बंचित न हों । जिन्हें उस व्रत के उद्देश्य का ही ज्ञान नहीं उसके बारे में उनके कथन का क्या महत्त्व ? फिर क्या मैत्रेयी बताएंगी कि करवा चौथ व्रत रखने से वफादारी कैसे सिद्ध होगी, क्या करवा चौथ व्रत रखकर भी स्त्री / पत्नी वेवफा रहे तो किसी को क्या पता चलेगा , कोई क्या कर लेगा, होता भी है एसा ।

. लड़कियां घरों से बाहर निकलकर भी पुरुषों के बीच बंधी हुई हैं , चिड़िया की तरह आज़ाद नहीं । ----
--------क्या ये महान महिलायें चाहती हैं कि महिलायें सिर्फ महिलाओं से बंधकर , उनके साथ ही कार्य करें , कार्य स्थलों से पुरुषों को हटा दिया जाय , सिर्फ महिलाएं ही रहें ; या घरों से भी पुरुषों को हटा दिया जाय , महिला-राज्य, महिला देश स्थापित किया जाय ?----क्या ये देख कर आयी हैं कि चिड़ियाँ -चिरौटों के बिना रहतीं हैं , आकाश में अकेली उड़ती हैं | कैसे कैसे मूर्खतापूर्ण विचार -कथन एसे लोगों के दिमाग में आते हैं । भाई --अगर गाडी चलानी है तो एक पहिये से कैसे चलेगी , सोचें -विचारें , तब कहें । " अति सर्वत्र वर्ज्ययेत । "
----इतिहास में स्त्री देश का भी ज़िक्र है जहां के अत्याचार एक राजकुमार ने ही जाकर बंद कराये थे | गुरु मत्स्येन्द्र नाथ को भी स्त्री देश से गुरु गोरखनाथ ने आज़ाद कराया था ।
----यदि स्त्री को अपना अलग संसार ही रखना है जहां सब कुछ स्त्रियों का ही हो तो फिर वही भारतीय परम्परा क्या बुरी है जहां महिलायें --महिलाओं में ही उठती बैठती हैं , महिलाओं से ही दोस्ती , नाच-गान , अपना अलग संसार होता है जहां पुरुषों , पुरुष-मित्रों-दोस्तों आदि का कोई दखल-मतलब नहीं होता ।
३- वर्चस्व की संस्कृति-----आखिर वर्चस्व की बात ही क्यों हो , किसी का भी वर्चस्व क्यों हो , युक्ति-युक्त पूर्ण तथ्यों की बात क्यों न हो , नकिसी का वर्चस्व न, किसी का अधिकार हनन अन्यथा फिर पुरुषों द्वारा वर्चस्व हनन की बात उठेगी |
------- एसे व्यर्थ के अतिवादी , अविचारशील, अवैज्ञानिक कथनों व कृत्यों से ही कोई भी अच्छा भाव/ विचार / कार्य आकार लेने से पहले ही विनष्ट होजाता है | इनसे महिलाओं व समाज की हानि हो रही है ।
-----बस्तुतः यह कोई स्त्री-पुरुष का झगड़ा नहीं है अपितु अच्छे -बुरे मानव , मानवीयता , आचरण -शुचिता , चरित्र के अवनति की बात है जिसकी हर जगह बात होनी चाहिए ।
कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '......

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित----

’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '......

अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति के सेमीनार -'वर्चस्व की संस्कृति और महिलायें ' में मैत्रेयी पुष्पा , मधु गर्ग आदि स्वघोषित तथाकथित महान महिलाओं द्वारा कुछ अविचारशील बातें कही गयी |
.’वफदारेी का लाइसेन्स है करवा चौथ '. हर साल नवीनीकरण कराना पड़ता है |---
-----क्या मैत्रेयी समझती हैं कि करवा चौथ व्रत वफादारी के लिए रखा जाता है ? वह तो सिर्फ पति की लम्बी आयु के लिए होता है, ताकि पत्नी सदा सुहागिन रहे और पति की पहले मृत्यु होजाने पर वे तमाम सुखों से बंचित न हों । जिन्हें उस व्रत के उद्देश्य का ही ज्ञान नहीं उसके बारे में उनके कथन का क्या महत्त्व ? फिर क्या मैत्रेयी बताएंगी कि करवा चौथ व्रत रखने से वफादारी कैसे सिद्ध होगी, क्या करवा चौथ व्रत रखकर भी स्त्री / पत्नी वेवफा रहे तो किसी को क्या पता चलेगा , कोई क्या कर लेगा, होता भी है एसा ।

. लड़कियां घरों से बाहर निकलकर भी पुरुषों के बीच बंधी हुई हैं , चिड़िया की तरह आज़ाद नहीं । ----
--------क्या ये महान महिलायें चाहती हैं कि महिलायें सिर्फ महिलाओं से बंधकर , उनके साथ ही कार्य करें , कार्य स्थलों से पुरुषों को हटा दिया जाय , सिर्फ महिलाएं ही रहें ; या घरों से भी पुरुषों को हटा दिया जाय , महिला-राज्य, महिला देश स्थापित किया जाय ?----क्या ये देख कर आयी हैं कि चिड़ियाँ -चिरौटों के बिना रहतीं हैं , आकाश में अकेली उड़ती हैं | कैसे कैसे मूर्खतापूर्ण विचार -कथन एसे लोगों के दिमाग में आते हैं । भाई --अगर गाडी चलानी है तो एक पहिये से कैसे चलेगी , सोचें -विचारें , तब कहें । " अति सर्वत्र वर्ज्ययेत । "
----इतिहास में स्त्री देश का भी ज़िक्र है जहां के अत्याचार एक राजकुमार ने ही जाकर बंद कराये थे | गुरु मत्स्येन्द्र नाथ को भी स्त्री देश से गुरु गोरखनाथ ने आज़ाद कराया था ।
----यदि स्त्री को अपना अलग संसार ही रखना है जहां सब कुछ स्त्रियों का ही हो तो फिर वही भारतीय परम्परा क्या बुरी है जहां महिलायें --महिलाओं में ही उठती बैठती हैं , महिलाओं से ही दोस्ती , नाच-गान , अपना अलग संसार होता है जहां पुरुषों , पुरुष-मित्रों-दोस्तों आदि का कोई दखल-मतलब नहीं होता ।
३- वर्चस्व की संस्कृति-----आखिर वर्चस्व की बात ही क्यों हो , किसी का भी वर्चस्व क्यों हो , युक्ति-युक्त पूर्ण तथ्यों की बात क्यों न हो , नकिसी का वर्चस्व न, किसी का अधिकार हनन अन्यथा फिर पुरुषों द्वारा वर्चस्व हनन की बात उठेगी |
------- एसे व्यर्थ के अतिवादी , अविचारशील, अवैज्ञानिक कथनों व कृत्यों से ही कोई भी अच्छा भाव/ विचार / कार्य आकार लेने से पहले ही विनष्ट होजाता है | इनसे महिलाओं व समाज की हानि हो रही है ।
-----बस्तुतः यह कोई स्त्री-पुरुष का झगड़ा नहीं है अपितु अच्छे -बुरे मानव , मानवीयता , आचरण -शुचिता , चरित्र के अवनति की बात है जिसकी हर जगह बात होनी चाहिए ।