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रविवार, 24 जनवरी 2016

मेरे ..श्रृंगार व प्रेम गीतों की शीघ्र प्रकाश्य कृति ......"तुम तुम और तुम". का गीत -७ ..-----जब से तुम मेरे गीतों को गाने लगे----

                            कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


नूतन वर्ष में .मेरे ..श्रृंगार व प्रेम गीतों की शीघ्र प्रकाश्य कृति ......"तुम तुम और तुम". के गीतों को यहाँ पोस्ट किया जा रहा है -----प्रस्तुत है गीत -७ ..-----जब से तुम मेरे गीतों को गाने लगे-----

जब से तुम मेरे गीतों को गाने लगे
मेरे मन के सुमन मुस्कुराने लगे |
दिल की दुनिया में इक रोशनी सी हुई,
नित नए भाव मन को सजाने लगे |



मैं ये चाहूँ कि तुम कोई कविता लिखो,
भाव बनके मैं उनमें समाता रहूँ |
तुम रचो गीत मैं उनको गाता रहूँ,
तेरा बासंती मन महमहाने लगे |

 तुम लिखो कोई कविता नए रंग की,
प्रीति की रीति के कुछ नए ढंग की |
तेरी रचना को पढ़ रचयिता स्वयं,
साथ वाणी के वीणा बजाने लगे |

 जब नए रंग की कोई कविता लिखो,
मैं नए रंग उनमें सजाता रहूँ |
खोया खोया सा मन गनगुनाने लगे,
मेरे मन का सुमन मुस्कुराने लगे |

तुम यूंही गीत मेरे जो गाते रहो,
बन के संगीत मन में समाते रहो |
एक सरगम सजे प्रीति रसधार की,
लो बहारों के स्वर चहचहाने लगे ||

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